वेद प्रकाश भारद्वाज
डीयू में नान कॉलेजएट वुमन एजुकेशन बोर्ड (एनसीवेब) में दाखिले के लिए छात्राओं के पास दिल्ली का आवासीय पता होना जरूरी है। इस आवासीय प्रमाणपत्र के रूप में आधार कार्ड, पासपोर्ट आदि मान्य हैं। इसका अर्थ है कि एनसीवेब में वही छात्राएं प्रवेश ले सकेंगी जो दिल्ली की मूल निवासी हैं या जिनके पास यहां रहने के प्रमाण हैं। यह पहली बार नहीं हुआ है कि दिल्ली में दिल्ली से बाहर के लोगों को रोकने का प्रयास किया गया है।
पिछले दिनों दिल्ली सरकार ने घोषणा की थी कि सरकारी अस्पतालों में केवल दिल्ली
के निवासियों का इलाज होगा। हालांकि बाद में उपराज्यपाल ने यह निर्णय
अमान्य कर दिया। कुछ साल पहले भी केजरीवाल सरकार ने अस्पतालों को लेकर ऐसा ही
निर्णय लिया था जो वापस लेना पड़ा था। यह सिर्फ दिल्ली का ही मामला नहीं है।
विभिन्न राज्यों में परीक्षाओें और नौकरियों के लिए राज्य के निवासी होने का
प्रमाणपत्र मांगा जाता है। आश्चर्य की बात यह है कि आज तक कहीं भी भारत के निवासी
होने का प्रमाणपत्र नहीं मांगा जाता। जनता को हर बार यह साबित करना होता है कि वह
संबंधित राज्य की निवासी है और उसके पास इसके लिए प्रमाणपत्र भी है।
वैसे देखने में यह बात साधारण लगती है परंतु है बहुत बड़ी बात। कहने को तो हम भारत के नागरिक हैं यानी भारत में रहते हैं। हमारा जन्म यहां हुआ है। इसके बाद भी हमें ऐसी स्थितियों का सामना करना पड़ता है। आज भी एक संवैधानिक देश की जगह हम पुराने जमाने की रियासतों में बंटे हुए हैं। भारत पर जब भी विदेशी आक्रमण हुए, हम हर बार हारे व लुटे गये क्योंकि यहां अलग-अलग देश और उनके शासक थे जो कभी एकसाथ नहीं हुए। जैसे वो केवल अपने देश की बात करते थे उसी तरह आज शि़क्षा और रोजगार जैसे मामलों में केवल राज्य की बात की जाती है। सवाल है कि हम एक देश से निवासी हैं या वैसा होना केवल एक संवैधानिक व्यवस्था है।
यदि राज्प का निवासी होने का नियम इतना ही आवश्यक है तो यह नेताओं पर लागू क्योे नहीं होता है? नरेंद्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री रहे। सब जानते हैं कि वह गुजरात के रहने वाले हैं परंतु वह वाराणसी से चुनाव लड़ सकते हैं। वह दो जगहों के निवासी होकर दो जगहों से चुनाव लड़ सकते हैं। अरविंद केजरीवाल उत्तर प्रदेश के कौशांबी में रहते हुए दिल्ली में चुनाव लड़ते हैं और मुख्यमंत्री बन जाते हैं। इसी तरह बहुत से नेता हैं जो दूसरे राज्यों से लोकसभा चुनाव लड़ते हैं या वहां से राज्यसभा में पहुंच जाते हैं। निश्चित ही लोकसभा व विधानसभ चुनाव में प्रत्याशियों को स्थानीय आवासीय पता देना होता है। वे स्थानीय पता देते भी हैं पर कोई नहीं पूछता कि आप अचानक इस क्षेत्र के निवासी कैसे हो गये? एक व्यक्ति एक बार लोकसभा या विधानसभा का प्रतिनिधित्व एक क्षेत्र से करता है और अगली बार दूसरे क्षेत्र में चुनाव लड़ने पहुंच जाता है।
इसी प्रकार आईएएस और ऐसी दूसरी सेवाओं में
लोग दूसरे राज्यों के कैडर से चुने जाते हैं। यानी देश पर राज करने वाले, नेता और उच्च
प्रशासनिक अधिकारी, यह दोनों स्थानीय
नागरिक होने के नियम से मुक्त हैं। सवाल है कि हमने यह कैसा देश बनाया है जिसमें
अलग-अलग मामलों में हमें अलग-अलग पहचान को साथ लेकर चलना पड़ता है। जिसमें हमें एक
राज्य में कुछ नागरिक अधिकारों से वंचित किया जाता है क्योंकि हम दूसरे राज्य
में रहते हैं। क्या हम एक देश के नागरिक
हैं या फिर अलग-अलग राज्यों के?


विचारणीय
ReplyDeleteविचारणीय
ReplyDeleteदेश के नागरिक ही देश ही ताकत होते है
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