Wednesday, July 15, 2020

शिक्षा और हम : अंकों में बदलता जीवन



वेद प्रकाश भारद्वाज

दौड़ते दोनों ही हैं पर उन्हें एक-दूसरे की भूमिका नहीं दी जा सकती। मैं बात कर रहा हूँ दुती चंद और मिताली राज की। दुती चंद ट्रैक पर बहुत तेज दौड़ सकती हैं, मिताली राज से कहीं तेज पर क्या हम उनसे यह उम्मीद कर सकते हैं कि वह मिताली की तरह रन बना सकती हैं? या क्या हम मिताली राज से यह उम्मीद कर सकते हैं कि वह ट्रैक पर कोई रिकॉर्ड कायम करके मैडल जीत सकती हैं? दोनों की अपनी क्षमताएँ हैं और सीमाएँ भी। और दोनों के सपने भी अलग हैं। इसी तरह हर बच्चे की अपनी क्षमता होती है और अलग सपने भी। फिर क्यों हममें से ज्यादातर माता-पिता अपने बच्चों की क्षमता और इच्छा जाने बगैर उनसे एक ही जैसे परिणाम की उम्मीद करते हैं। सीबीएसई के ताजा परीक्षा परिणामों ने सबको चौंका दिया है। अंग्रेजी और संस्कृत सहित सभी विषयों में कोई सौ प्रतिशत अंक ला सकता है इसकी किसी ने कल्पना भी नहीं की होगी।पिछले साल कुछ स्टूडेंट ने 500 में से 499 अंक प्राप्त किये थे। इस बार वह रिकॉर्ड भी टूट गया। अब आगे? क्या सौ प्रतिशत से भी अधिक अंक दिये जाएंगे? यह प्रश्न उठने लगा है। इस बार 90 और 95 प्रतिशत या उससे अधिक अंक पाने वाले विद्यार्थियों का प्रतिशत घट गया है। जिन्होंने इस बार सौ प्रतिशत अंक पाये हैं निश्चित ही वह बधाई के पात्र हैं। यह उनकी मेहनत का नतीजा है। पर क्या यह नहीं लगता कि हमने अपने बच्चों के जीवन को अंकों के खेल में बदल दिया है? बच्चों पर लगातार इस बात का दबाव रहता है कि वह अधिक से अधिक अंक लाएं। किसी कारण से वह अधिक अंक नहीं ला पाते हैं तो वह न चाहते हुए भी मानसिक दबाव महसूस करते हैं। क्या आपको पता है कि ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में अपना परचम लहराने वाले ज्यादातर लोग स्कूल-कॉलेज में औसर छात्र थे? यह सही है कि उस समय इतनी प्रतियोगिता नहीं थी, परंतु यह प्रतियोगिता शुरू किसने की? क्या इसके लिये हम अभिभावक ही जिम्मेदार नहीं हैं?
जारी..........

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