Friday, July 17, 2020

शिक्षा और हम : निजी बनाम सरकारी स्कूल Private Vs Government School


वेद प्रकाश भारद्वाज

सीबीएसई के ताजा नतीजों से एक बार फिर यह प्रमाणित हो गया है कि शिक्षा के स्तर और बच्चों के परिक्षा परिणाम का स्कूलों की भव्य इमारतों, एसी क्लासरूम, अंग्रेजी माध्यम, ऊँची फीस आदि से कोई संबंध नहीं है। टॉपर बच्चों में से ज्यादातर सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले हैं और उनमें भी कई ग्रामीण क्षेत्र के हैं। इतना ही नहीं, ऐसे बच्चे भी सामने आये हैं जिनके अभिभावक मजदूरी करते हैं, सब्जी बेचते हैं या इसी तरह का कोई काम करते हैं। ऐसे बच्चों ने यह साबित कर दिया है कि स्ट्रीट लैम्प के नीचे पढ़कर आगे बढ़ने की कहानियां केवल कल्पनाएं नहीं थीं। पर इससे निजी स्कूलों का आकर्षण कम नहीं होगा, यह तय है। हमारे समाज में ज्यादातर लोगों के दिमाग में निजी स्कूलों की जो छवि है उसे मिटाया नहीं जा सकता। निजी स्कूल बुरे नहीं होते परंतु वह गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की गारंटी भी नहीं होते। वह बच्चों को केवल अच्छा साफ-सुथरा वातावरण और एक हद तक अनुशासन देने का काम करते हैं जो सरकारी स्कूलों में नहीं होता। विडंबना यह है कि हमारे सरकारी स्कूलों में नियमों के इतने अधिक बंधन हैं और औपचारिकताएं भी कि उनमें आसानी से सुधान नहीं हो पाता। फिर भी यदि राजा के बेटा को ही राजा नहीं बनाना है तो हमें सरकारी स्कूलों को निजी स्कूलों के स्तर पर लाना होगा। शैक्षिक सफलता में तो सरकारी स्कूल आगे दिख ही रहे हैं यदि वह सुविधाओं के मामले में भी निजी स्कूलों का मुकाबला कर सकें तो बेहतर होगा। दिल्ली सरकार ने काफी हद तक इसमें सफलता पायी है। हालांकि अभी दिल्ली के सरकारी स्कूलों में भी बहुत कुछ किया जाना बाकी है।



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