Wednesday, July 1, 2020

रंगभेद यानी सिर्फ एक शब्द नहीं है ‘फेयर’



वेद प्रकाश भारद्वाज

फेयर एंड लवलीसिर्फ तीन शब्द नहीं हैं, एक पूरी संस्कृति उनके पीछे है। एक ऐसी संस्कृति जिसकी आलोचना करने वालों की कमी नहीं है फिर भी वह लगातार फलती-फूलती रही है। यह संस्कृति है बाजार की जो उस समय भी था जब मनुष्य आज की तरह सभ्य और विकसित नहीं हुआ था। इस बाजार ने समय-समय पर अपने लाभ के लिए बहुत सारे शब्दों के अर्थ बदल दिये या उन्हें नये संदर्भ दे दिये। मनुष्य की मूलभूत मानसिकता, दूसरों से बेहतर दिखने और सबसे अच्छे की चाह के साथ ही दूसरों की सफलता से ईष्र्या करने को इस बाजार ने अपने विस्तार का आधार बनाया। इसके लिए उसने मानवीय मानकों में हस्तक्षेप किया और भाषा को बदलते हुए नये मानक तैयार किये। ऐसे मानक जो समाज के नये वर्गीकरणों के आधार भी बने। यह शब्द फेयरभी कुछ ऐसा ही है। पिछले दिनों अमेरिका में एक अश्वेत जार्ज क्लायड की श्वेत पुलिसकर्मी द्वारा हत्या किये जाने के बाद जिस तरह से पूरी दुनिया में रंगभेद के ख़िलाफ जन-असंतोष उमड़ा उसे देखते हुए अचानक यह शब्द फिर से चर्चा में आ गया। गोरेपन का सपना बेचने वाली क्रीम ने फेयर एंड लवलीअपने नाम में से फेयरशब्द हटाने की घोषणा की जिससे इस शब्द को लेकर और चर्चा होने लगी। किसी भी उत्पाद को एक ब्रांड में बदलने के लिए कंपनियों को सालों-साल मेहनत करनी पड़ती है। किसी भी वस्तु का नाम आसानी से ब्रांड नहीं बनता। फेयर एंड लवली, यह नाम सालों की यात्रा करके पीढ़ियों की जुबान पर सवार हुआ और एक उत्पाद से एक संस्कृति में परिवर्तित हो गया।


गोरों और कालों के बीच का द्वंद्व कोई नया नहीं है। अमेरिका में यह कोई पहली बार नहीं हुआ। उसका इतिहास रंगभेद और हिंसा से भरा हुआ है। अन्य यूरोपीय देशों में भी यह होता रहा है। भारत में ऐसा कोई मसला नहीं रहा तो इसलिए कि यहां गोरे और काले का भेद अंग्रेजों के शासन के दौरान सामने आया। उससे पहले चमड़ी का रंग भारत में कोई मायने नहीं रखता था। हमारे यहां राम और कृष्ण को श्यामवर्ण माना गया है। एक फिल्म थी गुमनाम (1965) जिसमें एक गाना था हम काले हैं तो क्या हुआ दिलवाले हैं।इसलिए भारत में उस तरह से रंगभेद नहीं रहा परंतु आजादी के बाद हम देखते हैं कि हमारे देश में भी गोरी चमड़ी के प्रति आकर्षण बढ़ा है। विवाह के लिए दिये जाने वाले विज्ञापनों में अक्सर गोरी लड़की की मांग सामने आती है। फेयर कलरकी यह मांग समाज की मानसिकता में फेयर एंड लवली विज्ञापनों से और पुख्ता हुई थी जिनमें बताया जाता था कि जो फेयर यानी गोरी है वही सुंदर है। सौंदर्य के इस मानक का असर सामाजिक संरचना पर हुआ है। हम देखते हैं कि भारतीय समाज में जो जातीय भेदभाव है उसमें अनेक बार रंग का उल्लेख विशेषरूप से किया जाता है।

बहरहाल, यदि इस शब्द फेयर को देखें तो इसका कोई एक अर्थ नहीं है। आमतौर पर इसका जो अर्थ लिया जाता है वह है साफ और भेदभावरहित। अक्सर सरकार के संदर्भ में यह उम्मीद की जाती है कि वह जनहित में बिना किसी पक्षपात के यानी बिना किसी भेदभाव के निर्णय लेगी। हालांकि वैसा होता नहीं है। सरकार में जो दल होता है वह अपने राजनीतिक लाभ के हिसाब से निर्णय लेता है। आम बोलचाल में अक्सर हम मतभेद होने पर शिकायत करते हुए कहते हैं कि यह फेयरनहीं है यानी उचित या सही नहीं है। इस तरह देखें तो यह एक शब्द अलग-अलग संदर्भ में अलग-अलग अर्थ प्रकट करता है। परंतु जब हम इसे किसी एक अर्थ में बांध देते हैं, जैसा कि सौंदर्य और वह भी स्त्री सौंदर्य के मामले में, तो स्थिति बदल जाती है। हालांकि पिछले सालों में सौंदर्य प्रसाधनों के निर्माताओं ने अपने बाजार का विकास करने के लिए अब तक सिर्फ औरतों को सुंदर बनाने का काम करने का दावा करने वाले उत्पादों को विशेषरूप से आदमियों के लिए भी बनाना शुरू कर दिया है, इस नारे के साथ कि खूबसूरत दिखने पर उनका भी हक है। सुंदरता के बाजार ने मर्द की बलिष्ठ होने की छवि को बदलना शुरू कर दिया है। फेयर का एक नया फ्लेवर सामने आ गया है।

इसलिए यह प्रश्न उठना गलत नहीं है कि क्या फेयर एंड लवली के नाम में से फेयर हटाने से समाज में काली चमड़ी को गोरी बनाने के दावों के असर को क्या समाप्त किया जा सकेगा? अमेरिका सहित यूरोप के तमाम देशों में व्याप्त रंगभेद और भारत में जातीयता का चढ़ता रंग, इसके बीच भले ही फेयर एंड लवली का नाम बदल गया हो परंतु उसने जो सौंदर्य का मानक तय कर दिया है क्या उसे बदला जा सकेगा? और क्या उससे गोरी पत्नी या गोरी बहू के आकांक्षी समाज की मानसिकता को बदला जा सकेगा?



3 comments:

  1. बहुत सही लिखा। मेरी शुभकामनाएं स्वीकारें!!💐

    ReplyDelete
  2. शुभकामनाएं।
    लालित्य ललित

    ReplyDelete