Friday, July 27, 2018

बारिश का एक दिन

व्यंग्य
बारिश का एक दिन

वेद प्रकाश भारद्वाज

बाहर बारिश हो रही है और अंदर मैं सूखा बैठा हूँ। श्रीमतीजी कीचन में व्यस्त हैं। कुछ पकने की उम्मीद है। देश की सरकार अच्छे दिन लाने वाली है, अपनी सरकार भी शायद कुछ ले आए। रेडियो चालू करता हूँ तो आह निकलती है। कैसे-कैसे जालिम गाने सुनाते हैं ये रेडियो वाले। आज रपट जाएं तो हमें ना उठइयों’, अब जालिम को कौन समझाए कि रपटने के दिन अब नहीं रहे। अगर गलती से रपट गए तो सड़क पर ही रहेंगे या किसी खुले मेनहोल में अंतर्ध्यान हो जाएंगे, कहा नहीं जा सकता। अगर सड़क पर ही रह गए तब भी उठाना सम्भव होगा कि नहीं कहना मुश्किल है। हो सकता है स्ट्रेचर व एम्बुलनेंस मंगाने पड़ें। जब हम जवाँ होंगेतो अब अतीत की याद भर है। इसलिए रपटने का इरादा गर्म तवे पर पड़ी पानी की बूंद की तरह छन्न से उड़ जाता है।

मैं चैनल बदलता हूँ। कोई फायदा नहीं। वहां भी कोई बारिश का पिटारा खोले बैठा है। रिमझिम के गीत सावन गायेकानों में रस घोलता है जो दिल तक आते आते करेले का जूस बन जाता है। इधर रिमझिम शुरू होती है, उधर नदी नाले तो नहीं, कालोनी की नालियां उफान पर आ जाती हैं। खिड़की से बाहर झांकता हूँ तो छायावादी मन जनवादी हो जाता है। बारिश की टपटप की जगह बाहर कारों, बाइकों की कर्णभेदी पी पी सुनाई देती है। जिसके भी पास दुपहिया या चौपहिया है, लेकर सड़क पर आ गया है। हर कोई जल्दी में है। सब भाग रहे हैं। मैं कमरे में बैठा बाहर झाँक रहा हूँ। दो टकिया की नौकरी में लाखों का सावनजाने की शिकायत करने वाली नायिकाएँ तो अब ढूंढे भी न मिलेंगी। हाँ किसी मॉल में बारिश बोनान्ज़ा में छूट की लूट के लिए नवोढ़ाएँ और प्रेमिकाएँ अपने प्रियतमों के साथ बरामद की जा सकती हैं। प्रौढ़ाएं तो अब पकोड़ी तलने से भी डरती हैं। बीपी, शुगर, कोलेस्ट्रोल बारिश के रोमांच पर पानी फेर देते हैं। ऐसे में फीकी ही सही एक कप चाय तो बनती है। मैं कीचन की तरफ फरियाद उछालता हूं। कोई जवाब नहीं, मतलब फरियाद सुन ली गयी है और पूरी होने की आशा है। सरकार जब कुछ नहीं कहती है तो काम हो जाता है। जब काम करने का वादा करती है तो वो वादा ही रह जाता है। जैसे नालियों की सफाई का दावा किया गया था जो अब केवल वादा साबित हो रहा है। वैसे इसमें सरकार का भी क्या दोष। उसने से नालियां का कीचड़ निकाल दिया था पर वो नालायक वापस अपने घर में चला गया।

मैं अखबार उठाता हूं, फिर वापस पटक देता हूं। महापौर का जल भराव न होने के प्रबंध पूरे होने का वादा है। रेडियो का चैनल बदलता हूं। कोई दिन-दहाड़े भीगी-भीगी रातों मेंका राग अलाप रहा है। इधर पूरा दिन भीग रहा है, शहर भीग रहा है। राज कपूर-नरगिस याद आते हैं, कैसे बारिश में एक छतरी के नीचे खड़े थे। मैं आवाज लगाता हूं, छाता कहां रखा है? तत्काल अंदर से निषेधाज्ञा जारी हो जाती है, ‘बाहर बिलकुल नहीं जाना है। बीमार पड़ जाओगे तो मेरी मुसीबत होगी।मैं वापस कुर्सी में धंस जाता हूं। अच्छा चाय ही पिला दोमैं फिर अर्जी लगाता हूं। अभी बनाती हूं, और भी काम हैंअंदर से जवाब आता है। यही तो सरकार की अदा है। वह पहले कामों की प्राथ्मिकता तय करती है। अपने जरूरी काम पहले निपटाती है, फिर जनता के कामों की बारी आती है। मैं चुप हो जाता हूं। जनता यही कर सकती है।

खिड़की से बाहर झांकता हूं। बगल के खाली प्लॉट में पानी भर गया है। उसमें कुछ चिड़ियाएं नहा रही हैं। तभी एक कुत्ता पानी में कूदता है। चिड़ियाएं उड़ जाती हैं। मैं शरीफ आदमी की तरह नजर फेर लेता हूं। बिजली आ रही होती तो टीवी चलाता। तभी चाय ले जाओका आदेश आता है। मैं चुनाव परिणामों से उत्साहित मतदाता की तरफ कीचन की तरफ लपकता हूं। क्या देखता हूं कि वहां तो वेतन के साथ बोनस भी है। चाय के साथ प्लेट में पकौड़ियां भी हैं। सरकार कई बार बिना मांगे भी जनता को कुछ दे देती है, फिर भी संशय होता है। पूछता हूं क्या यह मेरे लिए है।सरकार उदारता से जवाब देती है आज खा लो पर ज्यादा नहीं, बीपी बढ़ जाएगा।इससे पहले कि सरकार का निर्णय बदले मैं चाय का कप और पकौड़ी की प्लेट लेकर फिर खिड़की के पास आकर बैठ जाता हूं। एक प्याली चाय और चंद पकौड़ियां, कितना सामान है खुश होने के लिए। मन शायराना होने लगता है। तभी बाहर से शोर सुनाई देता है। मैं झांक कर देखता हूं। दो सूरमा वहां आगे निकलने की होड़ में अब एक-दूसरे के हाड़ तोड़ने पर आमादा हैं। जाम में फंसी पब्लिक दूर से मजा ले रही है। मैं फिर अपनी पकौड़ियों और चाय की तरफ रूख करता हूं। अचानक मैं सामंतवादी होने लगता हूं। बाहर शोर बढ़ रहा है। मैं खिड़की बंद कर देता हूं। अब के सजन सावन मेंगाना खत्म हो गया है और बैक टू बैक रिमझिम गिरे सावनशुरू हो गया है। मैं पकौड़ियों को निपटाता हूं। चाय पीते हुए फिर कीचन की तरफ हसरत भरी नजर से देखता हूं। भारतीय जनता की यही परेशानी है, सरकार थोड़ी उदार होकर कुछ दे दे तो बहुत कुछ की आशा करने लगती है। 

4 comments:

  1. सरकार के क्या कहने ये किसी पार्टी की नहीं पर जब ये चाहें पार्टी तभी हो सकती है

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    1. बहुत खूब राजकुमार, बढिया बात कही है।

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  2. बहुत उम्दा लेख हैं

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