व्यंग्य
बारिश का एक दिन
वेद प्रकाश भारद्वाज
बाहर बारिश हो रही है और अंदर मैं सूखा
बैठा हूँ। श्रीमतीजी कीचन में व्यस्त हैं। कुछ पकने की उम्मीद है। देश की सरकार
अच्छे दिन लाने वाली है, अपनी सरकार भी शायद
कुछ ले आए। रेडियो चालू करता हूँ तो आह निकलती है। कैसे-कैसे जालिम गाने सुनाते
हैं ये रेडियो वाले। ‘आज रपट जाएं तो हमें ना उठइयों’, अब जालिम को कौन समझाए कि रपटने के दिन अब नहीं रहे। अगर गलती से रपट गए
तो सड़क पर ही रहेंगे या किसी खुले मेनहोल में अंतर्ध्यान हो जाएंगे, कहा नहीं जा सकता। अगर सड़क पर ही रह गए तब भी उठाना सम्भव होगा कि नहीं
कहना मुश्किल है। हो सकता है स्ट्रेचर व एम्बुलनेंस मंगाने पड़ें। ‘जब हम जवाँ होंगे’ तो अब अतीत की याद
भर है। इसलिए रपटने का इरादा गर्म तवे पर पड़ी पानी की बूंद की तरह छन्न से उड़ जाता
है।
मैं चैनल बदलता हूँ। कोई फायदा नहीं। वहां
भी कोई बारिश का पिटारा खोले बैठा है। ‘रिमझिम के गीत सावन
गाये’ कानों में रस घोलता है जो दिल तक आते आते करेले का
जूस बन जाता है। इधर रिमझिम शुरू होती है, उधर नदी नाले तो
नहीं, कालोनी की नालियां उफान पर आ जाती हैं। खिड़की से
बाहर झांकता हूँ तो छायावादी मन जनवादी हो जाता है। बारिश की टपटप की जगह बाहर
कारों, बाइकों की कर्णभेदी पी पी सुनाई देती है। जिसके भी
पास दुपहिया या चौपहिया है, लेकर सड़क पर आ गया
है। हर कोई जल्दी में है। सब भाग रहे हैं। मैं कमरे में बैठा बाहर झाँक रहा हूँ। ‘दो टकिया की नौकरी में लाखों का सावन’ जाने
की शिकायत करने वाली नायिकाएँ तो अब ढूंढे भी न मिलेंगी। हाँ किसी मॉल में बारिश
बोनान्ज़ा में छूट की लूट के लिए नवोढ़ाएँ और प्रेमिकाएँ अपने प्रियतमों के साथ
बरामद की जा सकती हैं। प्रौढ़ाएं तो अब पकोड़ी तलने से भी डरती हैं। बीपी, शुगर, कोलेस्ट्रोल बारिश के रोमांच पर पानी फेर
देते हैं। ऐसे में फीकी ही सही एक कप चाय तो बनती है। मैं कीचन की तरफ फरियाद
उछालता हूं। कोई जवाब नहीं, मतलब फरियाद सुन ली
गयी है और पूरी होने की आशा है। सरकार जब कुछ नहीं कहती है तो काम हो जाता है। जब
काम करने का वादा करती है तो वो वादा ही रह जाता है। जैसे नालियों की सफाई का दावा
किया गया था जो अब केवल वादा साबित हो रहा है। वैसे इसमें सरकार का भी क्या दोष।
उसने से नालियां का कीचड़ निकाल दिया था पर वो नालायक वापस अपने घर में चला गया।
मैं अखबार उठाता हूं, फिर वापस पटक देता हूं। महापौर का जल भराव न होने के प्रबंध पूरे होने का
वादा है। रेडियो का चैनल बदलता हूं। कोई दिन-दहाड़े ‘भीगी-भीगी
रातों में’ का राग अलाप रहा है। इधर पूरा दिन भीग रहा
है, शहर भीग रहा है। राज कपूर-नरगिस याद आते हैं,
कैसे बारिश में एक छतरी के नीचे खड़े थे। मैं आवाज लगाता हूं, छाता कहां रखा है? तत्काल अंदर से
निषेधाज्ञा जारी हो जाती है, ‘बाहर बिलकुल नहीं
जाना है। बीमार पड़ जाओगे तो मेरी मुसीबत होगी।’ मैं
वापस कुर्सी में धंस जाता हूं। ‘अच्छा चाय ही पिला
दो’ मैं फिर अर्जी लगाता हूं। ‘अभी
बनाती हूं, और भी काम हैं’ अंदर
से जवाब आता है। यही तो सरकार की अदा है। वह पहले कामों की प्राथ्मिकता तय करती
है। अपने जरूरी काम पहले निपटाती है, फिर जनता के कामों
की बारी आती है। मैं चुप हो जाता हूं। जनता यही कर सकती है।
सरकार के क्या कहने ये किसी पार्टी की नहीं पर जब ये चाहें पार्टी तभी हो सकती है
ReplyDeleteबहुत खूब राजकुमार, बढिया बात कही है।
DeleteWaaaaaaah
ReplyDeleteबहुत उम्दा लेख हैं
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