Thursday, July 19, 2018

An interview with artist surendra pal joshi अब केवल स्थानीय बनकर नहीं रह सकते



सुरेंद्रपाल जोशी से यह बातचीत  फरवरी २००५ में हुई बातचीत थी और उसी साल कलादीर्घा में प्रकाशित हुआ था। गत 12 जून को वे हमें छोड़ कर चले गये। उनका जाना कला जगत की बड़ी क्षति है। 


कला के क्षेत्र में आपका आना कैसे हुआ?
पेंटिंग का शौक मुझे बचपन से ही रहा है। उस समय मैं किसी चित्र की नकल बना लिया करता था या वैसे ही कागज पर कोई चेहरा बना दिया करता था।  जब मैं कोई सात-आठ साल का था तभी मेरे पिताजी ने मेरे अंदर के कलाकार को पहचान लिया था। वे सेना में थे। उनके बाल जब सफेद हो गये तो वो मुझे और मेरी बहनों को सफेद बाल उखाड़ने के लिए कहते थे। एक बाल उखाड़ने पर वो हमें पांच पैसे देते थे। मैं उनके सफेद के साथ-साथ काले बाल भी उखाड़ दिया करता था। तब वो कहते कि यह तुम्हारे बस का काम नहीं है। तुम तो उगाड़ (पशुओं को बांधने की जगह) जाओ और गाय का चित्र बनाओ। जब मैं बारहवीं में पढ़ रहा था तब मंगलेशजी (वरिष्ठ हिंदी कवि मंगलेश डबराल जो सुरेंद्रपाल जोशी के बहनोई हैं) ऋषिकेश आते तो कहते कि सुरेंद्र तुम्हारे काम में जबरदस्त ड्राफ्टमेनशिप है। तुम्हें कला के क्षेत्र में जाना चाहिए। मंगलेशजी ने ही मुझे बताया कि कला क्या होती है और कला महाविद्यालय क्या होता है। उनके कहने पर मैंने लखनऊ आर्ट कॉलेज में आवेदन किया और मुझे प्रवेश मिल गया। कॉलेज जाने से पहले मैंने साइनबोर्ड और रामलीलाओं के पर्दे खूब बनाये थे। लखनऊ पहुंचकर जब समाकालीन आधुनिक कला से मेरा साक्षात्कार हुआ तो लगा कि अब तक जो कुछ देखा, जो किया वह तो कुछ भी नहीं है। मेरे सामने कला की एकदम नयी दुनिया थी।

जब आप लखनऊ में पढ़ रहे थे तब आपने एक दुर्घटना को लेकर पेंटिंग बनायी थी। उस समय और बाद के काम में भी सामाजिक यथार्थ प्रमुख था परंतु बाद में उसमें फंतासी अधिक गयी और आप एक तरह के कल्पनालोक में प्रवेश करने लगे। ऐसा क्यों हुआ?
दरअसल, लखनऊ में मैं जिस उम्र और परिवेश में था उसमें मुझे मेहनत करने वाले मजदूर, रिक्शा चालक और इसी तरह के लोगों की पेंटिंग बनाना बहुत अच्छा लगता था। दिन-रात उनको देखता रहता था। उसी समय की एक घटना थी। मैं लखनऊ के बादशाह नगर में चौरोहे पर स्थित एक ढाबे पर रोज शाम को खाना खाने जाता था। उस ढाबे के मालिक से मेरे बड़े आत्मीय संबंध हो गये थे। होता क्या था कि कई बार मैं महीने भर के खाने के पैसे तक नहीं दे पाता था। उस स्थिति में वो पैसे मांगता तो उसे कोई पेंटिंग बनाकर दे देता। पर ऐसा कब तक चलता? एक बार उसने कह ही दिया कि अब पेंटिंग से काम नहीं चलेगा। उसे पैसे चाहिएं क्योंकि उसे भी तो आटा-दाल और अन्य सामान खरीदकर लाना होता है। मैं इस चिंता में वहां बैठा था कि उसे देने के लिए पैसे कहां से आएंगे। उसी समय एक  हादसा हुआ। उस ढाबे पर एक हाथ ठेले वाला रोज आता था। जब मैं वहां बैठा पैसों कि चिंता कर रहा था उसी समय एक तेज गति से रहे ट्रक ने उसके ठेले को टक्कर मार दी। ठेले वाला तो छिटक कर दूर जा गिरा और बच गया परंतु उसका ठेला टूट गया। एक पहिये के दो टुकड़े हो गये। लोगों ने दौड़ कर ठेले वाले को उठाया। ठेले वाला उस वक्त टूटे ठेले को ऐसे देख रहा था जैसे उसका इकलौता बेटा दुनिया से चला गया हो। तब उस आदमी और उसके टूटे ठेले को लेकर कार्बन पेपर से एक पेंटिंग बनायी थी १९८४ में, जिसका नाम मैंने काठ होते लोग रखा था। उसके बाद कुछ साल मैं उसी विषय पर काम करता रहा। बाद में उसकी एक प्रदर्शनी लखनऊ के हजरतगंज में फुटपाथ पर लगायी जिसमें पेंटिंगों को रेलिंग पर टांगा था क्योंकि अकादमी ने गैलरी देने से मना कर दिया था। वह प्रदर्शनी काफी चर्चित रही।
उसके बाद आपने उस श्रृंखला को छोड़ दिया और अलग तरह का काम करने लगे। इसका क्या कारण रहा?
लखनऊ से कला की शिक्षा पूरी करने के बाद मुझे एक छात्रवृत्ति मिल गयी जिसके तहत मुझे किसी एक क्षेत्र का चुनाव कर वहां जाकर काम करना था। मैंने उसके लिए जयपुर को चुना। जब जयपुर और राजस्थान की अन्य जगहों पर मैंने रेत के टीले, महिलाओं का रंग-बिरंगा पहनावा, हरियाली, जमीन की रंगत, जैसलमेर का पीला पत्थर आदि देखा  तो उनके साथ लखनऊ में उपजे द्वंद्व कुछ दिन तक चलते रहे। मेरे सामने एक अलग दुनिया थी। इसका नतीजा यह हुआ कि श्काठ होते लोग्य का जो फॉर्म था, जो विषय था, वह कुछ-कुछ बदलने लगा। फिर मेरे कैनवस अधिकाधिक रंगीन होने लगे। फॉर्म के साथ-साथ मेरे चिंतन में भी बदलाव आने लगा। पहले मैं बहुत साफ-साफ आकृतिमूलक काम किया करता था जो अब धीरे-धीरे अमूर्तन की तरफ बढ़ने लगा। इसका परिणाम यह हुआ कि जब मैंने १९९४ में बियांड सिटीज सीरिज बनायी तो मेरा काम एकदम बदला हुआ था। परंतु इसका अर्थ यह नहीं कि इस सीरिज की कृतियां जीवन से एकदम कटी हुईं और केवल कल्पना पर आधारित थीं। उसमें जीवन हमेशा से रहा है, बस उसका रूप बदलता रहा है। बियांड सिटीज सीरिज के काम में मेर बचपन की स्मृतियां भी थीं। बचपन में जब मैं ऋषिकेश में पढ़ता था तो वहां के मंदिर, धर्मशालाएं, घाट और उनके बीच चोगा पहने लंबी दाड़ी वाले साधू मुझे हमेशा आकर्षित करते थे। जब मैं बियांड सिटीज सीरिज बनाने लगा तो वो सब उसमें गये। लंबे कालम की तरह की इन आकृतियों में कहीं आपको दाढ़ी नजर आएगी तो कहीं वह गणेशजी की सूंड में तब्दील होती दिखाई देगी। इस सीरिज के काम में रंग संयोजन पर आपको राजस्थान का स्पष्ट प्रभाव दिखाई देगा। बचपन की स्मृतियों और राजस्थान की रंग-परंपरा के साथ-साथ उसमें लोककला के कुछ प्रतीक भी आने लगे क्योंकि गांव से मेरा शुरू से जुड़ाव रहा है। इसीलिए मैंने उसका नाम रखा था बियांद सिटीज यानी शहर से परे। इस सीरिज ने मुझे कला के क्षेत्र में स्थापित किया। उसने मुझे कई पुरस्कार दिलाये। इसी दौरान मैंने बियांद सिटीज श्रृंखला के कुछ म्यूरल भी बनाये।

आपके हाल के काम में म्यूरल का प्रभाव तो स्पष्ट है ही। दो भिन्न चरित्रों के कला माध्यमों में एक साथ काम करने और  दोनों को मिलाकर काम करने का क्या कोई खास कारण है? और क्या आपको नहीं लगता कि पेंटिंग जहां पूरी तरह सृजन है वहीं म्यूरल एक व्यावसायिक काम होता है जिसके अपने दबाव होते है?
यह कुछ उसी तरह हो गया जैसे कोई व्यक्ति कविता लिखते-लिखते उपन्यास लिखने लगे। म्यूरल को लोग भले ही अलग नजर से देखते हों परंतु मैं सोचता हूं कि यदि पेंटिंग कविता है तो म्यूरल को हम महाकाव्य या उपन्यास कह सकते हैं। इन दोनों में एक साथ काम करने या दोनों को मिलाकार काम करने का कोई विशेष कारण नहीं था। यह शायद इसलिए हो गया कि जब मैं दोनों माध्यमों में काम करने लगा तो दोनों माध्यम जाने-अनजाने इतने नजदीक गये कि कब दोनों एक हुए मुझे पता ही नहीं चला। जहां तक म्यूरल के व्यावसायिक होने की बात है तो यह कलाकार पर निर्भर करता है कि वह उसे कला ही रहने दे या एक व्यावसायिक कार्य बना दे। वैसे म्यूरल चूंकि एक प्रायोजित कार्य होता है इसलिए जो उसे बनवाता है वह उसमें अपने कुछ विषय-विचार या मोटिफ भी डलवाना चाहता है। पर ऐसे हमेशा नहीं होता। मैं खुद को इस मामले में सौभाग्यशाली समझता हूं कि मैंने जितने भी प्रायोजित म्यूरल बनाये उनमें मुझे काम करने की पूरी स्वतंत्रता मिली। यही वजह है कि मैंने आकृतिमूलक म्यूरल बनाये हैं तो अमूर्त म्यूरल भी बनाये हैं।
म्यूरल को पेंटिंग में लाने का आपको क्या कोई विशेष फायदा हुआ?
इसमें संदेह नहीं कि म्यूरल को पेंटिंग में लाने के मुझे कई फायदे मिले। पेंटिंग में आपको काम करने के लिए सीमित जगह मिलती है जबकि म्यूरल में आपके पास ज्यादा जगह होती है। जब एक कलाकार लगातार म्यूरल में काम करता है तो बड़ी जगह को संभालने, उसमें काम करने में वह सक्षम हो जाता है। इसका अपना मजा है। एक बार इस काम को साध लेने के कारण अब जब कभी मैं पेंटिंग करने बैठता हूं, चाहे वो किसी भी आकार की हो, उसमें मुझे किसी भी विषय को पूर्णता में चित्रित करने में कठिनाई महसूस नहीं होती। अब मेरे लिए पेंटिंग करना और आसान हो गयी है। इसके अलावा म्यूरल में आपको बहुत सी सामग्रियों को लेकर काम करना पड़ता है। इससे विभिन्न सामग्रियों को बरतने का आत्मविश्वास आपको मिल जाता है। दरअसल कोई भी माध्यम शुरू में आपको काम करने में आसानी नहीं देता। पहले आपको किसी भी माध्यम को, उसकी सामग्रियों को समझना पड़ता है, उनसे दोस्ती करनी पड़ती है। और जब एक बार दोस्ती हो जाती है तो आपको उनके साथ काम करने में आनंद आने लगता है। तब वे आपके लिए बहुत आसान हो जाते हैं और एक तरह से आपके इशारे पर नाचने लगते हैं। म्यूरल में यह कर पाने की सफलता के कारण मुझे केवल पेंटिंग करने में आसानी होने लगी बल्कि पेंटिंग में भी विभिन्न सामग्रियों के प्रयोग में सरलता होने लगी। नये-नये माध्यमों और सामग्रियों के अपने खतरे होते हैं। यह कुछ वैसे ही होता है जैसे कोई नया-नया घुड़सवार जब सवारी करने की कोशिश करता है तो घोड़ा उसे पटक देता है परंतु यदि वह ठान ले तो एक दिन उसी घोड़े पर सवारी करने में सफल भी हो जाता है। मेरे साथ भी कुछ ऐसा ही है। मैं यदि एक बार ठान लेता हूं कि किसी विशेष माध्यम या सामग्री में काम करना है तो शुरुआती विफलताओं के बाद भी हार नहीं मानता हूं और एक दिन उसमें सफला पाकर ही दम लेता हूं। नये-नये माध्यमों और सामग्रियों में काम करने का अपना एक अलग मजा है। इससे आपको काम करने में कभी ऊब महसूस नहीं होती। हमेशा एक ताजगी रहती है और चुनौती भी कि कुछ नया करना है। इस तरह से आपका अनुभव और समृद्ध होता जाता है।

आपके शुरुआत के काम में मानव आकृतियां प्रमुख हुआ करती थीं। आप उनके माध्यम से ही अपनी बात कहते दिखाई देते थे परंतु इधर के काम में मानव आकृतियां लुप्त हो गयी हैं और उनकी जगह अमूर्तन गया है। इसका राज क्या है?
पहली बात तो मैं यह नहीं मानता कि मेरा काम पूरी तरह अमूर्त हो गया है हालांकि अमूर्तन में जाने को लेकर मुझे कोई संकोच नहीं है और कभी होगा। यदि मेरे नये काम को गहराई से देखा जाए तो मैंने चीजों को, आकृतियों को रिफाइन जरूर किया है परंतु वे गायब नहीं हो गयी हैं। भारतीय लघु चित्रशैली का जो रूप है वह एकदम अलग है। मैंने उसे ही अपने नये काम में पकड़ा है परंतु जस का तस नहीं, मैंने उसे नये रूप में प्रयोग किया है।
एक बात यह भी है कि बचपन का मेरा काफी हिस्सा पहाड़ पर बीता। वहां के जौनपुर आदिवासी इलाके में मैंने पुरुषों को ऊन कातते देखा है जिसके कपड़े बनाकर वे पहनते थे। उस वक्त उनकी कताई के जो धागे मैंने देखे वे कहीं कहीं मेरे दिमाग में थे जो मेरी पेंटिंग में गये। इसी प्रकार मैंने कपड़े का, उसकी सुंदरता का इस्तेमाल किया है। वह इस रूप में कि बचपन में मैं देखता था कि जब कभी कोई कपड़ा फट जाता था तो मेरी मां या नानी उसमें सुंदर सा पेच लगा देती थी। वो इतना सुंदर होता था कि वैसा काम आज की पढ़ी-लिखी लड़कियां नहीं कर सकतीं। तो मैं उस पेच को भी अपनी पेंटिंग में ले आया। फिर उसपर में रेखांकन करता हूं जो राजस्थान की ब्लॉक प्रिंटिंग से आया है। तो इस तरह मेरे काम में लोककला और उसके तत्व तो हैं ही, इसलिए आप उन्हें पूरी तरह अमूर्तन नहीं कह सकते। हां, इतना जरूर है कि उनका पूरा दृश्यबंध अमूर्तन का सा होता है।
जहां तक मेरे आकृतिमूलक काम से अमूर्तन में आने की बात है तो यह स्वाभाविक रूप से होता गया। दरअसल, कला एक साधना की तरह होती है। जब कोई ड्ढसाधना शुरू करता है तो उसके सामने बहुत सी चीजें होती हैं, फूल, फल, दीपक आदि। जैसे-जैसे  वो अपनी साधना में ऊंचा उठता जाता है उसके सामने की चीजें गायब होने लगती हैं और एक अवस्था वह आती है जब उसे अपने ईष्टड्ढ से तार जोडने के लिए किसी अन्य सामग्री की जरूरत नहीं पड़ती। पेंटिंग में मेरे साथ ऐसा ही हुआ। धीरे-धीरे मेरे काम से स्थूल चीजें छुपती चली गयीं। परंतु इसका अर्थ यह नहीं कि मैंने अपने सामाजिक सरोकार छोड़ दिये हैं। मैं अपने सामाजिक सरोकारों को अन्य रूप में आज भी निभाता हूं।
आपकी कला में परिर्वतन एक अन्य रूप में भी दिखाई देता है। आपके नये काम में सामग्री बाहर से ली गयी लगती है...
मुझे ऐसा नहीं लगता। मैं बाहर से कोई चीज नहीं लाया। बहुत से कलाकार विदेश जाते हैं और वहां से बहुत सी चीजें सीखकर आते हैं और भारत में उनका प्रयोग करते हैं। मैंने ऐसा कभी नहीं किया। विदेश से लौटकर भी मैं भारतीय ही रहा हूं।
चीजें बाहर से लाने से मेरा आशय यह नहीं है कि आप दूसरे देशों से कला सामग्रियां ला रहे हैं या नयी सामग्रियों का प्रयोग कर रहे हैं। मेरा आशय यह है कि एक पेंटिंग में रंगों-रेखाओं के माध्यम से एक फॉर्म अंदर से बाहर की तरफ निकलता है। आपने जिस तरह धागों और पैचों का इस्तेमाल किया है है वे बाहर से कैनवस में जा रहे हैं। इस संदर्भ में देखें तो चीजें बाहर से अंदर की तरफ जा रही हैं। इससे पेंटिंग में जो एक धागा है वह अलग केंद्र बन जाता है और जो पैच है वह अलग केंद्र, पेंटिंग का अपना केंद्र इससे खत्म हो जाता है और उसका एक समग्र प्रभाव बनना चाहिए वह नहीं बन पाता, ऐसा मुझे लगता है।
नहीं, मैं इसको इसलिए स्वीकार नहीं कर सकता क्योंकि आप जो बात कर रहे हैं, अंदर से निकलने की तो वो तो हमेशा से होता आया है। मैं खुद ऐसा ही करता रहा हूं। सब वैसा ही करते हैं। मैं तो जानबूझ कर ऐसा कर रहा हूं क्योंकि मैं बताना चाहता हूं कि पेंटिंग यही नहीं होती कि उसमें रंगों या रेखाओं के माध्यम से फॉर्म निकल रहे हैं। आप उसमें बाहर से लाकर भी चीजों को उसका हिस्सा बनाकर एक नया फॉर्म रच सकते हैं। यह मैं इसलिए भी कर रहा हूं कि यदि हम ऐसा नहीं करेंगे तो नया सृजन करने का जो खतरा है, वह हम कैसे उठाएंगे। नयी चीजें कहां से आएंगी? मैं तो यह मानता हूं कि जो आज की दुनिया है और जो उसकी कला है, उसमें आपको इन सब चीजों के बारे में सकारात्मक तरीके से सोचना होगा वर्ना आप पुराने रूप से बाहर नहीं निकल पाएंगे। आप देखिए कि ग्यारहवें त्रिनाले में, जिसमें मेरा काम भी शामिल था, उसमें कलाकारों ने तकनीक से लेकर सामग्री और विषय तक के स्तर पर एक से बढकर एक प्रयोग किये हैं। मेरा प्रयोग तो बहुत छोटा है। मुझसे बहुत अच्छे-अच्छे काम उसमें शामिल हैं। वो इसीलिए अच्छे हैं क्योंकि उनमें चीजें भीतर के साथ-साथ बाहर से भी आयी हैं। उसमें दुनिया भर से कलाकृतियां आयी हैं। फिर मुझे आज के समय में बहुत आंचलिक या देशज कलाकार बना रहना पसंद नहीं है। भूमंडलीकरण के इस दौर में एक कलाकार के रूप में आप केवल स्थानीय बनकर नहीं रह सकते। आपको कला की विश्वधारा से जुड४ना ही होगा। चित्रकला हो या कविता, भले ही उसकी अपनी देशज और क्षेत्रीय पहचानें हों, उसका वैश्विक मुहावरा तो एक ही रहेगा और उसे पाने के लिए आपको नये-नये प्रयोग तो करने ही पड़ेंगे, नयी-नयी चीजों का इस्तेमाल करना ही पड़ेगा। यदि आप ऐसा नहीं करते हैं तो आपके काम में वही बासीपन वहीड्ढउबाऊपन रहेगा।
पर क्या आपको नहीं लगता कि आज कलाकार अभिव्यक्ति के लिए आंतरिक सामग्री, विचार, भाव आदि की जगह बाहरी सामग्रियों पर ज्यादा निर्भर होता जा रहा है? 
ये दौर कोई स्थाई तो है नहीं। प्रत्येक कलाकार की सामग्रियों की अपनी पसंद होती है। एक व्यक्ति को खाने की कोई चीज अच्छी लगती है तो वह उसे लंबे समय तक खाता रहता है और जब उससे मन ऊब जाता है तो उसे छोड़ देता है। इसी तरह मेरा कुछ पता नहीं कि जिन माध्यमों में जिन सामग्रियों के साथ मैं काम कर रहा हूं वह कब तक चलेगा। जब मेरा मन भर जाएगा तो मैं उसे छोड़ कर किसी अन्य माध्यम में, अन्य सामग्रियों के साथ काम करने लगूंगा। क्या करूंगा यह कह पाना तो अभी संभव नहीं है, पर उसमें परिवर्तन की पूरी संभावना है।
प्रत्येक कलाकार का अपना एक मुहावरा होता है जो उसकी पहचान बनता है। वह किसी खास तकनीक, माध्यम या विषय से पहचाना जाता है। क्या एक कलाकार को एक ही मुहावरे में लगातार काम करते रहना चाहिए या उसे विभिन्न मुहावरों में काम करना चाहिए?
मैं समझता हूं कि एक कलाकार को अपने मुहावरे को बदलते रहना चाहिए, उसे विभिन्न मुहावरों से गुजरते रहना चाहिए। आप देखें कि मेरे अब तक के काम में श्काठ होते लोग्य से नये काम तक के दौर में फॉर्म तीन-चार बार बदला है। फॉर्म बदलना कोई आसान काम नहीं है। इसमें बहुत ज्यादा खतरे रहते हैं। इससे पहले का मेरा जो फॉर्म था, उसकी पेंटिंग बहुत बिकती थी पर अब जो काम कर रहा हूं उस तरह की पेंटिंग तो हर आदमी लेता ही नहीं है। इसमें बिकाऊ तत्व कुछ है ही नहीं। तो पहला खतरा तो खुद को बचाने का है। दूसरा खतरा ये कि आप अचानक अपनी बनी बनायी पहचान को छोडकर एक नयी पहचान के साथ सामने आना चाहते हैं। आप अपना नाम बदलकर एक नये नाम के साथ लोगों के सामने आयें तो यह एक बहुत बड़ी चुनौती है। लोग यह जानकर कि आपने अपना नाम बदल लिया है, हंसेंगे। इस हंसी को झेलना बहुत बड़ी चुनौती है। जो लोग शुरू में आपके नये नाम पर हंसेंगे, वही कुछ दिन बाद आपको नये नाम से जानने भी लगेंगे।
परिवर्तन के संदर्भ में मुझे अशोक वाजपेयी की एक बात याद आती है कि जिस तरह संगीत में बढ़त होती है, एक गायक जब किसी राग को अलग-अलग समयों में गाता है तो मूल राग भले ही वही रहता है परंतु उसमें बढ़त होती है, उसमें विकास होता है उसी प्रकार पेंटिंग में भी निरंतर कुछ नया होता जाता है। कलाकार भले ही एक ही फॉर्म में जिंदगी भर काम करता रहे परंतु उसकी हर अगली पेंटिंग में कुछ कुछ विकास होता रहता है। उसमें वह कुछ कुछ नया जोड़ता रहता है। आपने अपने काम में परिवर्तन के जरिये खुद को एक तरह तो तोड़ा और नये फॉर्म के रूप में नयी पहचान की तरफ बढ़े। तो क्या इसके पीछे कहीं यह सोच थी कि आप एक फॉर्म में लंबे समय तक काम करने के बाद महसूस करने लगे थे कि अब उसमें नया कुछ नहीं पर पा रहे थे या कि नये समय को अभिव्यक्त करने के लिए आपको अपना पुराना फॉर्म नाकाफी लगने लगा था?
ऐसा नहीं है कि मैंने अपने फॉर्म को पूरी तरह से बदल दिया है या कि पुराने फॉर्म को पूरी तरह छोड़ दिया है। मेरे नये काम में यदि बहुत गहराई से जाकर देखा जाए तो आपको लगेगा कि उसमें मेरे पुराने फॉर्म, मेरे म्यूरल के प्रभाव उसमें हैं। लेकिन आप जो बात कह रहे हैं वो भी सही है कि बहुत से कलाकार एक ही फॉर्म में लगातार काम करते रहते हैं, उसी को मांजते रहते हैं, उसी में कुछ कुछ नया जोड़ते रहते हैं। मैं क्या करता हूं कि पुराने फॉर्म से कुछ बहुत ही खास किस्म की चीजें लेता हूं और उनको जोड़ते हुए एक नया फॉर्म बनाता हूं। तो बात कुल मिलकार वही है, आप एक रास्ते से जा रहे हैं तो भी मंजिल वही है और दूसरे रास्ते से जा रहे हैं तो भी मंजिल वही है। फिर रचना ही एक ऐसी चीज है जिसमें कभी कोई एक फार्मूला बना है कभी बनेगा। सब अपने-अपने तरीके, मिजाज से चलते जाते हैं। और रही बात अंतिम मंजिल की तो वो उसमें होती नहीं है।
आपकी पेंटिंग और म्यूरल में जो रिश्ता बनता है, वो किस तरह का है?
आपसी रिश्ता तो है ही। आपके पास क्राफ्टमेनशिप तो होती ही है। बस आपको बड़ा स्पेस मिल जाता है जिसमें आप और अच्छी तरह काम कर सकते हैं। इसका एक फायदा ये भी होता है कि आपको बड़े स्पेस को हैंडल करना जाता है जिससे बाद में आपके लिए छोटे स्पेस यानी पेंटिंग में भी उतनी ही चीजों को रचने की ताकत हासिल हो जाती है।
आपने सुनामी पीडि़तों की मदद के लिए एक शो किया था। एक समाज सजग रचना और रचनाकार में क्या संबंध पाते हैं?
मेरी सामाजिक प्रतिबद्धताएं आज भी वही हैं जो लखनऊ में कला की शिक्षा प्राप्त करने के दौरान थीं। उस समय किसी दुर्घटना, दंगों आदि से मैं विचलित हो जाता था। उनको पेंट करता था। हां, यदि मैं अमूर्त कलाकार होता तो संभव है कि मेरी सामाजिक प्रतिबद्धताएं और सामाजिक चेतना किसी अलग रूप में व्यक्त हुई होतीं। पर मैं तो शुरू से आकृतिमूलक काम करता रहा जिसके कारण मुझे सामाजिक विषयों को पेंट करना आसान रहा। इसीलिए मैं दंगों से लेकर राजस्थान के अकाल तक पर पेंटिंग बना सका। दरअसल, सामाजिक रूप से सजग और प्रतिबद्ध होता कलाकार का बहुत कुछ निजी मामला होता है। कलाकार संवेदनशील तो होता ही है परंतु उसकी संवेदना किस दिशा में जाएगी और वह वैचारिक रूप से कितना जागृत होगा ये कह पाना मुश्किल होता है।
कला का समाज पर क्या प्रभाव होता है? क्या कला के माध्यम से समाज को बदला जा सकता है?
कला से समाज में चेतना तो आती है परंतु वह समाज को बदलने का काम करती हो ऐसा मैं नहीं मानता। कलाएं मानवीय संवेदनाओं को जगाती हैं। आप देखें कि जिन देशों में या समाजों में ज्यादा कला होती है वहां का आदमी ज्यादा संवेदनशील भी होता है। क्योंकि कला आपको एक बहुत ही आवेगी, क्रोधी और हिंसक होने से बचाती है। और जब वो आपको हिंसक होने से बचाती है तो कहीं कहीं आपकी चेतना को प्रभाविक तो करती ही है। क्योंकि बिना उस प्रभाव के वह मनुष्य जगा नहीं सकती।
पर हमारे यहां कला के जितने भी रूप हैं, चाहे वो पेंटिंग हो, म्यूरल शिल्प हो या नाटक अन्य कलाएं, वे आम आदमी तक पहुंच नहीं पाती हैं। वे केवल एक सीमित वर्ग तक ही पहुंच पाती हैं। इस बारे में आप क्या सोचते हैं?
वह तो बड़े वर्ग तक तब पहुंचेगी जब जो सामाजिक संगठन हैं, अन्य लोग हैं, सरकारी विभाग हैं वे सब कला के प्रचार-प्रसार के लिए आगे आयेंगे। कलाकार से यह उम्मीद करना तो बेमानी है कि पहले तो वो पैसा खर्च करके पेंटिंग बनाये फिर उसे लोगों तक पहुंचाने का काम भी करे। यह तो कलाकार का काम नहीं है। उसका काम तो सृजन है। उसके बाद की भूमिका समाज, सरकार, मीडिया और अन्य संगठनों की है। यह उनका दायित्व है कि वे कला को गांव-गांव तक ले जाएं। कलाकार से आपको इसकी आशा नहीं करना चाहिए क्योंकि वो अपने समाज, अपने परिवार से अपनी ऊर्जा बचा-बचा कर उसे कला में लगाता है। यदि वो अपनी ऊर्जा कला को लोगों तक पहुंचाने में भी खर्च करेगा तो उससे उसकी कला प्रभावित हो जाएगी।
एक समस्या संवादहीनता की भी है। कला के क्षेत्र में इधर नयी सामग्रियों से लेकर तकनीक तक, विभिन्न रूपों में प्रयोगशीलता तो बढ़ी है परंतु कला का यह आधुनिक रूप लोगों की समझ में नहीं पाता। भारतीय समाज में वैसे भी किसी तरह का कला संस्कार तो है नहीं, विशेषरूप से आधुनिक कला के संदर्भ में। जो संस्कार है वो केवल लोक कला के स्तर पर ही है। ऐसे में हमारी आधुनिक कला कहां तक लोगों तक पहुंच पाएगी और कैसे प्रभावित कर पाएंगी?
इसकी जिम्मेदार तो हमारी सरकार है। हो क्या रहा है कि आपने स्कूलों में कंप्यूटरीकरण कर दिया है, गणित का पाठ्यक्रम बदल दिया है। अन्य विषयों का पाठ्यक्रम बदल दिया है परंतु कला का पाठ्यक्रम आज भी वही है जो पचास साल पहले था। दुर्भाग्य यह भी है कि प्राथमिक से हाई स्कूल तक जो शिक्षक कला पढ़ाते हैं, वे कोई कलाकार नहीं होते और ही उनके पास कला की शिक्षा होती है। होता यह है कि किसी भी विषय के शिक्षक से कह दिया जाता है कि वह कला की कक्षा भी पढ़ा ले। तो उन्होंने जिस तरह का भी अपने जीवन में सीखा था, वही बच्चों को पढ़ाते हैं। एक बात और भी है कि इधर बच्चों की पेंटिंग प्रतियोगिता कराने का फैशन चल पड़ा है। जिसे देखो वो यही करा रहा है, क्या स्कूल क्या सामाजिक और व्यावसायिक संगठन। क्योंकि इससे अखबारों में थोड़ा नाम छप जाता है, प्रचार हो जाता है। बच्चों को पुरस्कार देने के लिए जिन लोगों को बुलाया जाता है आमतौर पर वो सामाजिक कार्यकर्ता, नेता या कोई बड़ा अधिकारी होता है जो बच्चों के काम का मूल्यांकन करता है। अब उनकी कला की जो समझ होती है बहुत ही अधकचरी, वो उसी के हिसाब से वैसे ही बच्चों को पुरस्कृत कर देते हैं। तो इस तरह से जब समाज चलता है तो उसमें कला का संस्कार आने का कोई सवाल ही नहीं उठता।
जहां तक लोक कलाओं का सवाल है तो वो लोक जीवन का अभिन्न अंग होती है। वो लोक जीवन पद्धति होती है। चाहे वो लोक चित्रकला हो या शिल्प हो या अन्य कला रूप। आधुनिक नागर समाज की कलाएं जीवन शैली की उपज नहीं हैं। बल्कि वह विशिष्टड्ढ कला है जिसे विशेष लोग बनाते हैं और विशेष लोग ही खरीदते हैं। आधुनिक समाज और कला के बीच की खाई का क्या यह कारण नहीं है?
मैं ऐसा नहीं मानता क्योंकि पूरी दुनिया में लोग गांवों से ही निकले हैं, लोक से ही निकले हैं इसलिए उनके काम में भी वह तत्त्व किसी किसी रूप में तो रहेंगे ही। फर्क हमारे देखने में है। जैसे आज कोई कलाकार कपड़ों को फाड़कर कुछ बना दे तो सब कहेंगे कि यह बिल्कुल अनोखी चीज है। लेकिन वो जो फटे हुए कपड़े हैं, वो भी तो लोक का ही हिस्सा हैं।

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