उच्च
शिक्षा: सिर्फ चेहरा न बदले
डॉ. वेद
प्रकाश भारद्वज
उच्च
शिक्षा के क्षेत्र में मोदी सरकार पिछले कुछ समय से बदलाव को लेकर कुछ अधिक गम्भीर
दिखाई दे रही है। शिक्षकों के रिक्त पदों को भरने, सक्षम विश्वविद्यालयों को स्वायत्तता
देने, शोध कार्य के लिए नए मानक बनाने और ऐसे ही प्रयासों से ऐसा लगता है कि सरकार
इस दिशा में गम्भीर है। परन्तु जिस तरह से नई शिक्षा नीति घोषणा दर घोषणा टलती जा रही है उसे देखकरविश्वविद्यालय
अनुदान आयोग (यूजीसी) को समाप्त कर उच्च शिक्षा आयोग बनाने की योजना को लेकर भी संशय
होना स्वाभाविक है। संशय इसलिए भी है कि क्या सिर्फ चेहरा बदलने से उच्च शिक्षा की
आत्मा को भी बदला जा सकेगा? मोदी सरकार ने योजना आयोग को समाप्त कर नीति आयोग बनाया
था। इससे नीति नियोजन के स्तर पर कोई बहुत क्रांतिकारी बदलाव आया हो और उसका आम जीवन
पर बहुत सकारात्मक प्रभाव पड़ा हो, ऐसा अभी तक तो कुछ दिखाई नहीं देता। नीति आयोग में
काम करने वाले और नीतियां बनाने तथा लागू करने वाले वही लोग हैं जो योजना आयोग में
भी थे। सिर्फ शीर्ष पर कुछ लोगों को बदल देने से बड़ा परिवर्तन नहीं लाया जा सकता। इसके
लिए निचले स्तर तक लोगों की सोच में बदलाव जरूरी है। सरकार ने उच्च शिक्षा आयोग के
सन्दर्भ में इसके लिए क्या तैयारी की है, यह तो भविष्य में पता चलेगा। परन्तु ऐसा किये
बिना कोई बड़ा परिवर्तन लाना मुश्किल होगा।
भारत
में यह कोई नई बात नहीं है कि जब भी केंद्र में सत्ता परिवर्तन होता है तो नई सरकार
पिछली सरकारों द्वारा शुरू की गई योजनाओं को या तो खत्म कर देती है या उसमें अपनी राजनीतिक
महत्वाकांक्षाओं के अनुरूप परिवर्तन कर देती है। यह पहली बार हो रहा है जब केंद्र में
पहली बार पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में आयी भाजपा ने कुछ क्षेत्रों की शीर्ष संस्थाओं
के नाम ही नहीं बदल रही है बल्कि पुराने संस्थान को समाप्त कर नया संस्थान बना रही
है। इस कड़ी में नया निर्णय विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) को समाप्त कर उच्च शिक्षा
आयोग बनाने का है।
यूजीसी
और विश्वविद्यालयों को लेकर सरकार ने पिछले दिनों कई ऐसे निर्णय लिए हैं जिन्हें आसानी
से स्वीकार करना थोड़ा मुश्किल है। जैसे यूजीसी द्वारा 62 विश्वविद्यालयों को स्वायत्तता
देने का मामला। इस निर्णय का आमतौर पर स्वागत किया गया क्योंकि इसमें यह दावा किया
गया कि इससे विश्वविद्यालयों के कामकाज में यूजीसी का हस्तक्षेप खत्म हो जाएगा और वे
अधिक सक्षमता के साथ काम कर सकेंगे। यह सही है कि कई बार यूजीसी की नियंत्रकारी भूमिका
के चलते विश्वविद्यालयों को काम करने में परेशानियों का सामना करना पड़ता है। परन्तु
जिस तरह से स्वायत्त घोषित किये गए विश्वविद्यालयों को नए पाठ्यक्रम चलाने, विदेशी
शिक्षकों को नियुक्त करने व उनका वेतन तय करने, फीस तय करने के अधिकार दिए गए हैं उनसे
कुछ दूसरी समस्याओं के जन्म लेने की आशंका है। खासतौर पर शिक्षकों की नियुक्ति, उनके
वेतन व नए पाठ्यक्रमों के सन्दर्भ में। यह परिवर्तन लागू होने के बाद उच्च शिक्षा संस्थान
कहीं राजनीतिक और दलगत तुष्टिकरण का माध्यम भर बन कर न रह जाए। हाल ही में विश्वविद्यालयों
में पीएचडी धारकों को असिस्टेंट प्रौफेसर नियुक्त करने के निर्णय को भी इसी सन्दर्भ
में देखा जाना चाहिए। यह सही है कि पाठ्यक्रमीय योग्यता ही अंतिम नहीं होनी चाहिए।
यदि किसी विषय के विशेषज्ञ को अध्यापन के लिए नियुक्त किया जाता है तो वह स्वागत योग्य
होना चाहिए। इस सन्दर्भ में सरकार की हाल की एक घोषणा को देखा जा सकता है जिसमें उच्च
शासकीय पदों पर निजी क्षेत्र में कार्यरत अनुभवी व सक्षम लोगों नियुक्त करने की बात
कही गई थी।
भारत
में उच्च शिक्षा को लेकर कई तरह की समस्याएँ पहले से मौजूद हैं। पिछले अनुभव बताते
हैं कि जब सरकार ने निजी विश्वविद्यालयों को बढ़ावा देने की नीति अपनाई थी तो बहुत से
ऐसे विश्वविद्यालय खुल गए थे जिनके पास न्यूनतम संसाधन नहीं थे। इतना ही नहीं उनमें
से कुछ ने मनमाने नियम बनाकर काम शुरू कर दिया था। बाद में इनमें से कुछ विश्वविद्यालयों
की यूजीसी ने मान्यता रद्द कर दी और उन्हें अपना कारोबार समेटने पर मजबूर होना पड़ा।
यह सही है कि बहुत से निजी विश्वविद्यालय ऐसे हैं जो सारे मानकों को पूरा करते हुए
बच्चों को समुचित शिक्षा प्रदान कर रहे हैं पर यह वही हैं जो यूजीसी के नियमों का पालन
कर रहे हैं। उच्च शिक्षा के निजीकरण से अलग दूसरी समस्याएं भी हैं। जैसे विश्वविद्यालयों
व महाविद्यालयों में शिक्षकों की कमी। दिल्ली विश्वविद्यालय, इलाहाबाद विश्वविद्यालय
सहित अनेक विश्वविद्यालयों में शिक्षकों के हजारों पद वर्षों से खाली हैं जिन्हें भरने
की कोशिश कहीं दिखाई नहीं देती। बहुत हुआ तो अनुबंध पर भर्ती कर काम चलाया जा रहा है।
अब सरकार कह रही है कि तदर्थ शिक्षकों को स्थायी नियुक्ति देकर पदों को भरा जाएगा।
सवाल है कि अब तक इन पदों पर स्थायी नियुक्ति को कौन रोक रहा था?
पिछले
तीन दशकों में भारत में शिक्षा के प्रति जागरूकता बढ़ी है और दूर-दराज के लोग भी अपने
बच्चों को उच्च शिक्षा के लिए दूर शहरों में भेजने लगे हैं। एक समय था जब केवल सरकारी
विश्वविद्यालय ही उच्च शिक्षा के मुख्य साधन थे। आर्थिक उदारीकरण के साथ ही शिक्षा
के क्षेत्र में निजीकरण को गति मिली। छोटे गांवों-कस्बों तक में निजी स्कूल शुरू होने
के कारण उच्च शिक्षा व्यवस्था पर भार बढ़ गया। आज भी औसत आमदनी वाले अभिभावक सरकारी
कॉलेजों व विश्वविद्यालयों पर अधिक यकीन रखते हैं। ऐसे में उनके विश्वास की रक्षा करना
जरूरी है। इसके लिए यूजीसी को समाप्त कर दूसरा आयोग बनाने भर से काम नहीं चलेगा। इसके
लिए विश्वविद्यालयों की स्थिति में सुधार लाना होगा, शिक्षा की गुणवत्ता को बढ़ाना होगा,
सिर्फ पुस्तकीय ज्ञान की बजाय क्षेत्र विशेष का व्यवहारिक ज्ञान देना होगा, छात्रों
को सिर्फ पाठ पढ़ने वाला बनाने की जगह प्रश्न करने वाल जिज्ञासु और उसका उत्तर खोजने
वाला अन्वेषक बनाने पर भी ध्यान देना होगा।
सरकार
नए आयोग के गठन में इस तरह की बातों का कितना ध्यान रखेगी और उच्च शिक्षा में गुणात्मक
सुधार की दिशा में कितनी ठोस पहल करेगी, यह तो समय ही बताएगा। इतना अवश्य है कि सरकार
को उच्च शिक्षा के क्षेत्र में वास्तव में सुधार करना है तो सिर्फ चेहरा नहीं, पूरी
व्यवस्था की आत्मा को बदलना होगा। और यदि ऐसा नहीं किया जाता है तो नया आयोग कुल मिलाकर
नई बोतल में पुरानी शराब की तरह होगा। नीतियां बनाने वालों से लेकर उनका अनुपालन करने-कराने
वालों में यदि कोई परिवर्तन नहीं हुआ तो बदलाव की कोई भी पहल कामयाब नहीं हो सकेगी।
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