Wednesday, July 4, 2018

मानसिक दासता से कब मुक्त होंगे हम



वेद प्रकाश भारद्वाज

हाल ही में फेसबुक पर एक पोस्ट देखी जिसमें लिखा गया था कि भोजपुरी के शेक्सपियर भिखारी ठाकुर की रचनाओं का मंचन किया गया। भोजपुरी के या हिंदी के शेक्सपियर या गोर्की, भारत के पिकासो या जैक्सन पोलाक, या कि बॉलीवुड के माइकल जैक्सन, और इसी तरह के तुलनात्मक पद अक्सर सुनने-पढ़ने को मिल जाते हैं। हम अपने इतिहास, संस्कृति का बड़ा दंभ भरते हैं पर जैसे ही कोई उपलब्धि की बात आती है तत्काल किसी विदेशी मानक से उसको जोड़ देते हैं। यह हमारी हीनग्रन्थी है या हमारा दास्तवभाव की हम अपने आप को किसी अन्य के सन्दर्भ में ही देखते हैं। और ऐसा करते हुए हम यह भूल जाते हैं कि इससे हम हम नहीं रह जाते। हमारा वजूद, हमारी उपलब्धि हमारे नहीं रह जाते। जब हम अपने किसी नायक को, चाहे वह किसी भी क्षेत्र का हो, किसी दूसरे देश, समाज या भाषा के नायक का विशेषण देते हैं तो हम जाने-अनजाने यह स्वीकार कर लेते हैं कि हम दोयम हैं या किसी और की तरह हैं। 

भारत में कालीदास जैसे महाकवि, भास, दण्डी जैसे नाटककार हुए, भरतमुनि का नाट्यशास्त्र है, सूर, तुलसी से लेकर निराला, जयशंकर प्रसाद, मुक्तिबोध हुए पर हमें अपने कालजयी व्यक्तित्वों की प्रमाणिकता के लिए विदेशी मानक ही याद आते हैं। उनकी महानता से इनकार नहीं है परन्तु खुद को उनके आईने से पहचानने की गुलाम मानसिकता से हम कब मुक्त होंगे। मेरी बात बहुत से लोगों को बुरी लग सकती है। उन सब से क्षमा याचना के साथ कहना चाहता हूँ की शेक्सपियर आम लोगों के नहीं खास बौद्धिक वर्ग के रचनाकार थे जबकि भिखारी ठाकुर आम जन के लिए लिखते थे। मैंने खुद भिखारी ठाकुर को नहीं पढ़ा, केवल उनकी रचना के कुछ अंश एकबार एक मित्र से सुने थे। आज यदि भिखारी ठाकुर लोक मानस में बसे हुए हैं तो इसीलिए कि वह लोक के ही वक्ता थे।

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