Monday, July 30, 2018

पाल से बाल गोपाल तक



वेद प्रकाश भारद्वाज

अखबार खोलकर बैठा हूं। खबर है कि अन्ना हजारे फिर से लोकपाल के लिए अनशन करेंगे। अन्ना बड़े सज्जन व्यक्ति हैं। सज्जनता एक गुण होती थी पर अब नहीं। आजकल सज्जन होना किसी काम का नहीं है। अन्ना सज्जन हैं इसलिए सज्जन रह गये और आज भी लोकपाल के लिए लड़ रहे हैं। केजरीवाल एंड कंपनी कभी उनके साथ लड़ रही थी। वो आज लोकपाल से आगे बढ़ चुकी है। अन्ना की खबर की बगल में जनपाल खड़े हैं। वे जनता के पालक हैं। उन्हें उद्योगपतियों के साथ खड़े होने से डर नहीं लगता। इस बारे में उद्योगपतियों की राय यहां नहीं दी गयी है। पता नहीं किसने उनके डरने की अफवाह फैलायी थी। कभी उनकी पार्टी अन्ना के लोकपाल आंदोलन के साथ थी। अन्ना ने उन्हें अपनी गाड़ी में चढ़ने नहीं दिया फिर भी वे आगे बढ़ गये। अन्ना की गाड़ी वहीं खड़ी रह गयी। वैसे हमारे यहां कई तरह के पाल पाये जाते हैं। इतिहास की खुदाई करें तो एक शासन पाल वंश का था बस उसके साथ लोक नहीं जुड़ा था। एक गोपाल भी हैं जिनके बारे में मौन रहना ही श्रेयष्कर है। आजकल जनतंत्र का युग है। पिछली सदी में बाल, पाल व लाल की तिकड़ी ने अंग्रेजों की नाक में दम कर रखा था। आजकल लोकपाल सितम ढहा रहा है। सरकार चतुर खिलाड़ी है। उसने मसौदा बना दिया है। झुनझुना तैयार है, बजाते रहिये। 

वैसे मुझे इस शब्द लोकपालपर आपत्ति है। इस शब्द से कुछ भ्रम होता है। ऐसा लगता है जैसे लोक यानी जनता को पालने वाले की बात की जा रही है। हमारे नेता यही करते हैं। पहले गुंड़े पालते हैं, चमचे पालते हैं उसके बाद चुनाव जीतने के बाद जनता को पालते हैं, आखिर उनका परिवार भी तो जनता ही है। आखिर एक नेता कितनों को पालेगा। पालने की परंपरा हमारे यहां बहुत पुराने ही। इसे लेकर कई कहावतें भी मशहूर हैं। जैसे पूत के पांव पालने में ही नजर आ जाते हैं। इसीलिए सरकार की सदिच्छाओं पर हमेशा संदेह रहता है। पर हम यहां पालना यानी शिशुओं के झूले की नहीं उस पालने की बात कर रहे हैं जो पशुओं से संबंधित है। कोई गाय पालता है तो कोई भैंस, कोई ऊंट पालता है तो कोई बकरी। नेतागण जनता को पालते हैं। वैसे भी जनता निरीह गाय होती है। पर आजकल गाय को लेकर बड़ा बवाल है। लोग गाय पालने से ही नहीं, उसे चराने ले जाने से भी डरने लगे हैं। बात गाय तक आ गयी है इसलिए यहीं खत्म करता हूं। अब तो गाय की बात करते भी डर लगता है। बात बिगड़े इससे पहले आगे बढ़ना चाहिए।

मैं अखबार का पन्ना पलटता हूं। अच्छी खबर नहीं है। खुले नाले में गिरने से एक व्यक्ति की मौत हो गयी। यह गलत बात है। नाले को खुला नहीं होना चाहिए और यदि वह खुला भी है तो उसमें किसी को गिरना नहीं चाहिए। प्रशासन ने नाले इसलिए थोड़ी खुले छोड़े हैं कि चाहे जो उसमें गिर जाए। इधर केजरीवाल सीसीटीवी कैमरे लगाने पर एलजी से फिर पंगा ले रहे हैं। उन्होंने एलजी की बनायी कमेटी की रिपोर्ट फाड़ते हुए कहा है कि जनता तय करेगी कि सीसीटीवी कैमरे कहां लगेंगे। यदि ऐसा है तो एलजी की समिति की रिपोर्ट भी जनता को सौंप देते कि उसका क्या करना है। पर ऐसे मौकों पर नेता खुद जनता बन जाते हैं। जनता वनता हो गयी, नेता जनता हो गये। इधर एक्ट्रस कंगना रनौत ने खुलासा किया है कि मोदी सही मायने में लोकतंत्र के नेता हैं। चलिए उन्होंने बता दिया वर्ना हमे तो आज तक पता ही नहीं था। उन्होंने कहा है देश को गड्ढ़े से बाहर निकालने के लिए पांच साल बहुत कम हैं।कितना गहन चिंतन है। पिछले 70 साल से देश के गड्ढ़े तक भरे नहीं जा सके, उसमें फंसे देश को पांच साल में कैसे निकाला जा सकता है। 

आगे बढ़ता हूं। खबर है कि दिसम्बर तक निफ्टी 12 हजार पर जा सकता है। मन खुश हो गया। अपन के पास एक भी कंपनी का शेयर नहीं है फिर भी ऐसे खुश हो गया जैसे बुढौती में लल्ला होने की खबर आयी हो। वैसे हम देश की खुशी में खुश हैं। कल एक दम्पत्ति ने आर्थिक तंगी के कारण आत्महत्या कर ली और एक आदमी खुले नाले में गिरकर मर गया तो कोई बात नहीं। निफ्टी बढ़ रहा है और शेयर बाजार भी 40 हजार के पार होने वाला है। सरकार खुश है, सरकार ही देश है इसलिए देश भी खुश है तो फिर किसी के मरने से हमारा भला दुखी होना कहां तक उचित है। ऐसा करना तो देशद्रोह के समतुल्य होगा। मैं ऐसा नहीं करना चाहता। आगे बढ़ता हूं। अखबार का आखरी पन्ना आ गया। यहां कुछ अच्छी खबरे भी हैं। पटना के एक अस्पताल में आईसीयू वार्ड तालाब बन गया है और उसमें मछलियां तैर रही हैं। चलिये मासांहारी मरीजों के भोजन की व्यवस्था हो गयी। यदि अस्पताल में पलंग लोहे की जगह लकड़ी के होते तो मरीजों को नौकायन का आनन्द भी मिल जाता। वार्ड का जो फोटो छपा है उसमें कोई डॉक्टर व अन्य कर्मचारी दिखाई नहीं दे रहा। शायद वे सब मछलियां पकड़ने में मशगूल हैं। मरीजों का क्या है, उनकी स्थिति तो वैसे भी गंभीर है। 

एक और मजेदार खबर पर नजर पड़ती है। हमने आज की बात शुरू की थी पाल से और अंत में आ पहुंची है बाल गोपाल यानी बच्चों तक। खबर है कि सरकार हर जिले में बच्चों के लिए थाने खोलने की योजना पर काम कर रही है। बच्चों से खेल-खेल में होगी पूछताछ। बचपन में चोर-पुलिस खेला करते थे। कुछ लोग बड़े होने पर भी खेलते हैं। अब सरकार ने इस सुविधा का विस्तार करने का मन बनाया है। बच्चों के लिए थाने खुल जाएंगे तो वहां ऐसा माहौल बनाया जाएगा कि बच्चे पुलिस से डरें नहीं। कोई बच्चा यदि बात न माने तो माता-पिता कहते हैं कहना मानो नहीं तो पुलिस आ जाएगी। अब यह कहकर बच्चों को डराना संभव नहीं होगा। माता-पिता को कोई नया तरीका खोजना होगा।

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