Wednesday, July 11, 2018

हिंदी प्रयोग में अराजकता

हिंदुस्तान में काम करने वाले पत्रकार व लेखक सन्त समीर ने 11 जुलाई 2018 के दिन अपनी फेसबुक पर अखबारों में हिंदी के प्रयोग को लेकर अराजकता पर गम्भीर चिंता जतायी है। आज ऐसे पत्रकारों की संख्या कम ही रह गई है जो भाषा की शुध्दता को प्राथमिक मानते हैं। ज्यादातर पत्रकारों का रवैया चलताऊ होता है। हिंदी अखबारों में अंग्रेजी के शब्दों का प्रयोग और उसपर रोमन लिपि का प्रयोग यह कह कर उचित बताया जाता है कि यही आज के युवा वर्ग की भाषा है। यही बाजार की भाषा है।
अपने लम्बे पत्रकारिता जीवन के अंतिम वर्षों में सहयोगियों के साथ बहुत बार भाषा व संपादन को लेकर बहस करता रहा पर एक समय आया जब मैंने पाया कि लोग बस किसी तरह समय पर अख़बार छाप देना चाहते हैं। अख़बार में समय की पाबंदी हमेशा रही है पर आज जैसा लापरवाह रवैया पहले नहीं था। आज की तारीख में नवभारत टाइम्स, हिन्दुस्तान, नई दुनिया, भास्कर, अमर उजाला किसी को भी देख लीजिए भाषा की अराजकता तो है ही, संपादन तो लगता है होता ही नहीं है। समाचारों का अलग-अलग पृष्ठों पर दुहराव, अचानक समाचार का समापन, तथ्यों की गलती आदि आम बात है। इस सम्बन्ध में गत वर्ष मैंने एक शोध लेख भी लिखा था।
इन दिनों एक निजी महाविद्यालय में पत्रकारिता पढ़ाते हुए मैं खासतौर पर हिंदी पढ़ा रहा हूँ तो दुःखद स्थिति का सामना करना पड़ता है। ज्यादातर छात्र टीवी में जाना चाहते हैं और उनका सारा ध्यान अंग्रेजी पर है। हिंदी उनके लिए कोई महत्व नहीं रखती।
वैसे कभी-कभी लगता है कि मैं और मुझ जैसे अन्य लोग व्यर्थ ही हिंदी का राग अलापते हैं। आजादी के बात सात दशक की कोशिशों के बाद भी सरकार हिंदी को इस लायक नहीं बना पायी कि वह राजकीय कार्य की भाषा बन सके। देश में सबसे ज्यादा हिंदी बोलने वाले, सबसे ज्यादा अख़बार हिंदी के, सबसे ज्यादा टीवी चैनल हिंदी के, सबसे ज्यादा फिल्में हिंदी में बनती हैं, आज के अंग्रेजी में ही जीने वाले युवा हिंदी फ़िल्में देखते हैं, हिंदी गाने सुनते-गाते हैं फिर भी उन्हें हिंदी नहीं अंग्रेजी चाहिए। जब मेरी पीढ़ी के लोग जवान थे तब हॉलीवुड की फिल्में अंग्रेजी में ही प्रदर्शित होती थीं पर आज हिंदी सहित कई भारतीय भाषाओं में उनका प्रदर्शन इन भाषाओं की शक्ति को प्रकट करता है, बस हम ही हैं जो अपनी भाषा को महत्वहीन मानते हैं।
12-7-2018

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