वेद प्रकाश भारद्वाज
क्या एक बार फिर दुनिया
में अघोषित युद्ध की स्थिति बन रही है? यह प्रश्न अनुचित नहीं है क्योंकि जिस प्रकार
से पिछले कुछ दिनों में अमेरिका ने अपनी अर्थव्यवस्था की मुश्किलों को कम करने के लिए
दूसरे देशों के उत्पादों पर कर बढ़ाये हैं और उसके जवाब में यूरोपीय देशों, चीन तथा
अब भारत में भी जवाबी कार्रवाई की है उससे ऐसा लगता है कि इस बार युद्ध हथियारों की
जगह बाजार में लड़ा जाएगा। अमेरिका के फेडरल रिजर्व सहित कई बड़े बैंकरों ने यूरोपीय
संघ, चीन और भारत के ताजा कदमों के बाद इसकी चेतावनी भी दी है। और यह सब तब हो रहा
है जब अमेरिका की अगुवाई में पूरी दुनिया में मुक्त बाजार की अवधारणा को साकार करने
का काम किया जा रहा है। परंतु अमेरिका की ताजा हरकतों से लगता नहीं है कि दुनिया में
कभी वास्तविक अर्थों में मुक्त बाजार कायम हो पाएगा।
इस व्यापार टकराव की
शुरूआत नौ मार्च को उस समय हुई तब अमेरिका ने इस्पात और एल्यूमीनियम पर क्रमशः 25 तथा
10 प्रतिशत शुल्क बढ़ाने की घोषणा की थी। इसके बाद अगले कदम के तौर पर अमेरिका ने चीन
पर दबाव बनाया कि वह एक निश्चित मूल्य के अमेरिकी उत्पादों का आयात करे। उसने इसी तरह
का दबाव यूरोपीय संघ के देशों पर भी बनाने की कोशिश की। नजीता यह हुआ कि यूरोपीय देशों
और चीन ने जवाबी कार्रवाई करते हुए अमेरिका को कड़ा जवाब दिया। परंतु भारत ने इस मामले
में निर्णय लेने में काफी समय लगा दिया। दरअसल भारत अमेरिका के साथ बातचीत के माध्यम
से इस समस्या का हल निकालना चाहता था परंतु अमेरिका ने इसमें कोई रूचि नहीं दिखाई लिहाजा
भारत को भी अब 29 अमेरिकी उत्पादों पर शुल्क बढ़ाने की घोषणा करनी पड़ी है। इनमें सेब,
दालें, अखरोट और फास्फोरिक एसिड उत्पाद शामिल हैं। इससे
अमेरिका द्वारा स्टील
व एल्युमिनियम पर सीमा शुल्क बढ़ाने के जवाब में भारत 1600 करोड़ रूपये के अमेरिकी उत्पादों
पर जवाबी शुल्क लगाने की तैयारी कर रहा है। इनमें बादाम, सेब, फास्फोरिक एसिड जैसे
उत्पाद शामिल हैं। अमेरिका के शुल्क वृद्धि के कारण भारत पर करीब 24 करोड़ डॉलर का अतिरिक्त
भार पड़ता और उसका व्यापार कम हो जाता। इसके जवाब में भारत को कुछ ऐसा करना ही था जिससे
उसका व्यापार भुगतान संतुलन बना रहे। भारत के साथ ही अमेरिका की अधिनायकवादी व्यापार
नीति के विरोध में चीन और भारत के अलावा यूरोपीय संघ के साथ ही तुर्की, जापान, कनाडा,
आस्ट्रेलिया और मैक्सीको भी कूद पड़े हैं। पिछले ही दिनों रूस ने भी अमेरिका को राजनयिक
क्षेत्र में चुनौती देते हुए उसकी नीतियों का विरोध किया था। चीन पर तो अमेरिका लगातार
आर्थिक दबाव बना रहा है। इसका एक प्रमाण यह है कि 15 जून को अमेरिका ने 50 अर्ब डॉलर
के चीनी उत्पादों पर 25 प्रतिशत आयात शुल्क लगाने की घोषणा की। इसके जवाब में चीन ने
भी 50 अरब डॉलर के 659 अमेरिकी उत्पादों पर 25 प्रतिशत अतिरिक्त शुल्क लगाने की घोषणा
कर दी।
बात यहीं पर खत्म नहीं
हुई है। अमेरिकी सिनेट ने चीन की दूरसंचार कम्पनी जेडटीई पर फिर से पाबंदी लगा दी है
और साथ ही धमकाया है कि वह उसके खिलाफ और कड़े कदम उठा सकता है। यही नहीं अब जब भारत
के साथ ही कई और देश अमेरिका के खिलाफ कमर कस कर खड़े हो गये हैं तब वह नये हथियारों
का इस्तेमाल करने पर उतर आया है। इनमें से एक है दुनिया के बड़े बैंकरों को अपने पक्ष
में खड़ा करना। यही कारण है कि 23 जून को खबर आई कि फेडरल रिजर्व सहित दुनियाभर के केंद्रीय
बैंकरों ने चेतावनी दी है कि अमेरिका के साथ चीन व यूरोपीय संघ सहित कुछ अन्य देशों
का व्यापार युद्ध 2008 जैसी मंदी ला सकता है। इसके साथ ही ट्रंप ने यूरोपीय संघ से
आने वाली कारों पर 20 प्रतिशत शुल्क लगाने की धमकी दी है।
हकीकत यह है कि यह
अब सिर्फ व्यापार का मामला ही नहीं रह गया है। शीत युद्ध की समाप्ति के बाद से अमेरिका
जिस तरह पूरी दुनिया को अपनी सामरिक और आर्थिक शक्ति से दबाने की कोशिश कर रहा है उसके
दूरगामी परिणाम होंगे। अमेरिका लगातार वैश्विक व्यवस्था में अपनी तानाशाही भूमिका को
मजबूत करते हुए विरोध करने वाले या उसकी बात नहीं मानने वाले देशों को धमकाने से पीछे
नहीं रहता है। इसका प्रमाण यह है कि 17 जून को अपने एक वीडियो संदेश में अमेरिकी राष्ट्रपति
डोनाल्ड ट्रंप ने एक तरफ दुनिया में शांति होने की बात कही वहीं जी-7 शिखर सम्मेलन
में व्यापार, आतंकवाद और आव्रजन के मुद्दों पर जापान सहित अधिकतर देशों के अमेरिका
के साथ एक राय न होने यानी उसकी बात न मानने के कारण ट्रंप ने जापान को नष्ट कर देने
की अप्रत्यक्ष धमकी दे डाली। उन्होंने जापान के प्रधानमंत्री शिंजो आबे को धमकी दी
कि यदि अमेरिका ढाई करोड़ मैक्सिको नागरिकों को जापान पहुंचा देगा तो आबे अपदस्थ हो
जाएंगे। यानी अमेरिका की सीधी-सीधी धमकी है कि हमारी हां में हां मिलाओ और हमारी हर
बात मानो नहीं तो आपके देश में हम राजनीतिक अस्थिरता उत्पन्न कर देंगे।
अमेरिका इस बात को
जानता है आज दुनिया में उसे चुनौति देने वाली कोई सामरिक शक्ति नहीं है परंतु दुनिया
पर अपना एकछत्र नियंत्रण कायम करने के लिए उसे दुनिया पर आर्थिक आधिपत्य भी जमाना होगा।
और यह सब चीन, जापान व यूरोपीय संघों के मजबूत रहते संभव नहीं होगा। साथ ही तेजी से
उभरती भारतीय अर्थव्यवस्था भी उसके वर्चस्व के लिए भावी चुनौति है। अमेरिका अपने लिए
मौजूदा चुनौतियों के साथ ही भावी चुनौतियों को भी आकार लेने से पहले ही कुचलना चाहता
है। परंतु जिस तरह से चीन व भारत के साथ ही यूरोपीय संघ और जापान जैसी आर्थिक शक्ति
ने अमेरिकी अधिकारवादी प्रवृŸा को चुनौती दी है उससे
उसके लिए कुछ भी कर पाना आसान नहीं होगा। यह सही है कि आज अमेरिका दुनिया की सबसे बड़ी
शक्ति है परंतु उसे यह नहीं भूलना चाहिए कि यदि व्यापार युद्ध तेज होता है तो उसका
सबसे ज्यादा नुकसान अमेरिका को ही होगा क्योंकि अमेरिका और उसके मित्र देश आज भारत
जैसे बड़े उपभोक्ता बाजारों पर ही निर्भर हैं।
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