Saturday, June 1, 2019

मुनाफे के लिए मौत का कारोबार



वेद प्रकाश भारद्वाज
ज्यादा मुनाफा, अतिरिक्त मुनाफा और जल्दी मुनाफा ऐसी मानवीय प्रवृत्ति है जिसपर अंकुश लगाना किसी भी समाज और शासन के लिए एक चुनौती है। उसपर यदि मुनाफे का यह कारोबार जो वास्तव में मौत का कारोबार होता है, अवैध रूप से किया जा रहा हो तो उसे रोकना और भी मुश्किल हो जाता है क्योंकि इस तरह के मौत के कारोबार को स्थानीय स्तर पर पुलिस प्रशासन और राजनीति का संरक्षण न हो यह माना नहीं जा सकता। एक बात यह भी है कि सरकार हर साल अधिक राजस्व के लिए शराब के नये ठेके खोलती है। यह जानते हुए भी कि शराब स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है सरकार केवल राजस्व के लालच में उसकी बिक्री बढ़ाने का प्रयास करती है। इसके लिए बार एवं रेस्टारेंट को देर रात तक खोलने की अनुमति दी जाती है। सरकार की तरफ से इस तरह का कोई प्रयास नहीं किया जाता जिससे लोग शराब न पीने का संकल्प लें। गुजरात में सालों से शराबबंदी है और बिहार में भी नितीश सरकार ने उसे लागू कर रखा है। क्या यह प्रदेश शराब की बिक्री से मिलने वाले राजस्व के अभाव में कंगाल हो गयी हैं और लोकहितकारी कामों को अंजाम नहीं दे पा रही हैं? यदि ऐसा नहीं है तो अन्य प्रदेशों की सरकारें इसे बंद करने में क्यों हिचक रही हैं। सरकार की इसी हिचक का फायदा उठाते हैं अपराधी जो मुनाफे के लिए मौत का कारोबार करते हैं। उत्तर प्रदेश के बाराबंकी में इन्हीं कारोबारियों की करनी की भेंट चढ़ गये 14 जीवन। उस पर आश्चर्य यह कि जो लोग मारे गये और जो 50 लोग जिंदगी के लिए जूझ रहे हैं उन्होंने शराब अवैध कारोबारियों से नहीं बल्कि सरकारी दुकान से खरीदी थी।
प्रदेश में लगातार हो रही इस तरह की घटनाएं इस बात का प्रमाण हैं कि शासन-प्रशासन मौत के सौदागरों पर अंकुश लगाने में बुरी तरह विफल रहा है। इस तरह की घटनाएं इस बात का प्रमाण हैं कि भारतीय शासन-प्रशासन प्रणाली में ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है जो इस तरह की घटनाओं को होने से रोक सके। ऐसा नहीं है कि सरकार ऐसी घटनाओं को होने देना चाहती है परंतु यह बात कोई महत्व नहीं रखती जब हम पाते हैं कि सरकार ऐसी घटनाओं को रोक पाने में पूरी तरह नाकामयाब रही है। फिर मसला सिर्फ इस सरकार का ही नहीं है। इस तरह की घटनाएं सभी सरकारों में होती रही है और कई प्रदेशों में भी। इसका अर्थ है कि सरकार किसी की भी हो, उसमें जहरीली शराब के कारोबार को रोकने की इच्छा शक्ति का अभाव होता है। प्रत्येक सरकार कानून-व्यवस्था को ठीक रखने का दावा करती है परंतु इस तरह की घटनाएं उन दावों को खोखला साबित कर देती हैं। 
इसी साल फरवरी में सहारनपुर व आसपास के क्षेत्र में जहरीली शराब पीने से 58 लोगों की और उत्तराखंड के हरिद्वार में 17 लोगों की मौत हो गयी थी। इस मामले में दोनों राज्य सरकारों ने जांच के आदेश दिये पर क्या इससे उन जीवनों की भरपाई हो सकती है जो शासन की लापरवाही के कारण समाप्त हो गये? उससे पहले पिछले साल मार्च में नोएडा क्षेत्र के खोड़ा में में भी अवैध जहरीली शराब पीने से चार लोगों की मृत्यु हो गयी थी। इन दोनों प्रकरणों में यह पाया गया था कि लोगों ने अवैध रूप से बिक रही शराब पी थी जो जहरीली थी। सिद्धांतवादियों के लिए यह कहना आसान हो सकता है कि लोग अवैध शराब खरीदते ही क्यों है? परंतु इससे शासन-प्रशासन की जिम्मेदारी कम नहीं हो जाती है। कारण कि यदि किसी क्षेत्र में अवैध रूप से शराब बेची जा रही है तो उसे रोकना पुलिस प्रशासन का काम है। जिन जगहों पर शराब का अवैध कारोबार हो रहा होता है वहां की पुलिस उससे अनजान हो इस पर यकीन करना मुश्किल है। और यदि मान लिया जाए कि पुलिस को इस बात की खबर नहीं होती तो इसका अर्थ यह है कि हमारी पुलिस नाकारा है जो अपनी नाक के नीचे हो रहे अपराध को देख तक नहीं पाती। इसलिए जब यह आरोप लगाया जाता है कि शराब का अवैध कारोबार पुलिस के संरक्षण में ही चलता है तो उसे नकारना आसान नहीं होता।
एक चौंकाने वाली बात यह है कि उत्तर प्रदेश के हरियाणा-दिल्ली से लगते इलाकों में शराब का अवैध कारोबार खूब फल-फूल रहा है। गौतमबुद्ध नगर जिले में जिसमें नोएडा भी आता है, एक संस्था क्राइम फ्री इंडिया फोर्स ने कई साल के अध्ययन के बाद पाया कि जिसे के ग्रामीण क्षेत्रों में करीब दो हजार लोग हर साल अवैध शराब के कारण मर जाते हैं। इस जिले के अलावा अन्य जिलों में भी सीमावर्ती क्षेत्रों में एक राज्य से दूसरे में शराब लाकर बेचना आम है। ज्यादातर हरियाणा से शराब उत्तर प्रदेश लायी जाती है क्योंकि वहां शराब सस्ती है। इसकी आड़ में वहां से कच्ची शराब की भी आपूर्ति हो जाती है जो जानलेवा हो सकती है। इसके बावजूद लोग सस्ती होने के कारण उसका उपयोग करते हैं।
इसमें कोई संदेह नहीं कि इसके लिए लोग खुद भी जिम्मेदार हैं परंतु इतने भर से सरकार और पुलिस प्रशासन अपनी जिम्मेदारी से मुक्त नहीं हो सकते। सरकार हर बार इस तरह के हादसे होने के बाद त्वरित कार्रवाई के नाम पर कुछ पुलिसवालों को निलंबित कर देती है। मृतकों के परिजनों को मुआवजा दे देती है और कुछ दिन बाद मामला भुला दिया जाता है। सरकार हर बार कहती है कि वह शराब के अवैध कारोबार के खिलाफ कड़े कदम उठाएगी। वह उठाती भी है परंतु वह हर बार खोखले साबित होते हैं। इस तरह के अपराधों के लिए जब तक पुलिस प्रशासन की पूर्ण जवाबदेही तय नहीं की जाएगी इसे रोकना असंभव है। कारण कि यह कोई अचानक होने वाला अपराध नहीं है। अवैध शराब का कारोबार बहुत ही संगठित और बड़े पैमाने पर किया जाने वाला कारोबार है जो बिना स्थानीय पुलिस प्रशासन के संरक्षण के संभव नहीं है।   

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