दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश में संवैधानिक उत्सव का एक और आयोजन लगभग समाप्त हुआ। यह कितना सफल हुआ और कितना विफल , इस बारे में जल्दी ही सबको पता चल जाएगा। मार्च में चुनाव की घोषणा के साथ ही पर्दा उठा था और 23 मई को पर्दा गिर जाएगा। इस पर्दा उठाने और गिरने के बीच मंच पर जो कुछ होता रहा वह किसी भी तरह से तार्किक, अर्थपूर्ण और सभ्य नहीं कहा जा सकता। आप चाहें तो उसे प्रहसन कह सकते हैं परंतु प्रहसन की भी अपनी मर्यादा होती है। राष्ट्रीय मंच पर जो कुछ होता रहा, वह किसी भी तरह मर्यादित तो नहीं ही कहा जा सकता। हमारे यहाँ होली के अवसर पर कई शहरों में मूर्ख सम्मेलन या इसी के जैसे कार्यक्रमों की सुदीर्घ परम्परा रही है। उसमें जो कुछ होता रहा है उसके बारे में सब जानते हैं कि यह सब बनावटी और केवल हास-परिहास के लिए होता रहा है। पर संसदीय चुनाव के राष्ट्रीय मंच पर इस बार जो कुछ हुआ क्या उसे भी हम होली के आयोजनों की तरह हल्के में ले सकते हैं? और यह भी कि जिस तरह से चुनाव-दर-चुनाव लोकतांत्रिक व्यवहार को तार-तार किया जाने लगा है, उसे देखते हुए क्या विश्व गुरु होने का दम भरने वाले इस देश की नियति 'नँगे राजा' की नहीं होने वाली है? मैं जानता हूँ कि इस देश में आशावादियों की कमीं नहीं है। सदियों तक दुश्मनों ने इस देश को मिटाने की कोशिश की फिर भी हमारी हस्ती मिटी नहीं, यह विश्वास दोहराने वाले कम नहीं हैं। मैं भी उनमें शामिल हूँ परंतु, इसके बावजूद भविष्य को लेकर यदि भय लगता है तो उसका कारण हमारा वर्तमान ही है जिसके प्रति हम आँखें मूंदे बैठे हैं।
उम्मीदों की इबारत लिखने की कोशिशों के बीच कब हमारे नेता वर्तमान की रेखाओं को मिटाने लगे, उन्हें खुद नहीं पता। देश, जो एक भौगोलिक और राजनीतिक इकाई से पहले एक सामाजिक इकाई होना चाहिए था, आज जैसे कबीलाई संस्कृतियों की पहचान का संघर्ष बन कर रह गया है। अनेकता में एकता के सुर उलटे पड़ गए हैं। और इतने उलटे पड़ गए हैं कि एकता में अनेकता का कोरस भी सम्भव नहीं रहा। वह अनेकता में भी अनेकता के कोलाहल में बदल गया है।
कोलाहल चारों ओर है। अपनी-अपनी डफली, अपना- अपना राग की विविधता भी अब नहीं है। सभी दल कहने को तो अपना अलग राग साध रहे हैं परंतु यह अलग राग तो केवल आवरण है। अंदर से देखें-सुनें तो गीत वही बेढंगा है सब का। सुर चाहे पंचम हो या सप्तम, बात सबकी बेढंगी ही है। घर में नहीं दाने और अम्मा चली भुनाने, जिसे देखो वही गरीबों की जेब काजू-किशमिश से भरने का दावा कर रहा था। उधर गरीब आदमी अपनी फटी जेब की चिंता में डूबा रहा, गलती से उन्होंने जेब में कुछ डाल दिया तो छेद और बड़ा हो जाएगा। पर गरीब आदमी थोड़ा आश्वस्त रहा, क्योंकि नेता जो कहते हैं करते नहीं और जो करते हैं उसकी भनक भी नहीं लगने देते। सत्तर साल का अनुभव है।
इसीलिए आदमी जब तक गरीब है निश्चिंत है। जैसे ही वो हिंदू-मुसलमान हो जाता है, अगड़ा-पिछड़ा हो जाता है, सवर्ण-दलित बन जाता है, अपनी फटी जेब की चिंता छोड़ देता है। वह जूतियों में दाल की तरह बंटने लगता है। राष्ट्रीय प्रहसन में मंचासीन यह देख खुश होते हैं। उनकी कोशिशें रंग लाने लगती हैं तो वे और नई कोशिशों में जुट जाते हैं। अमीर और गरीब कभी लड़ते नहीं हैं। दोनों अपनी-अपनी सीमा में डरे-दुबके रहते हैं। एक के पास लड़ने की फुरसत नहीं होती तो दूसरे के पास साधन नहीं। पर जैसे ही आदमी धर्म और जाति में बदलता है, उस धर्म और जाति के लिए जान देने को तैयार हो जाता है जो उसे जीने का कोई सुभीता नहीं देते।
मंचासीन इस बात को जानते हैं। चुनाव से बढ़िया व असरदार मौका रोज-रोज नहीं मिलता। इसबार तो मौके भी अधिक थे। दो महीने से अधिक की चुनाव अवधि में कुंलाचे भरने का भरपूर मौका था। फिर इस बार मंच भी बढ़ गए। सोशल मीडिया ने कलाकारी दिखाने के अवसर बढ़ा दिए। अभी खेल कुछ दिन और चलेगा। सोशल मीडिया पर विशेष लोग लगातार सक्रिय हैं। हर कोई अपने विश्लेषण के साथ अपने निष्कर्ष लेकर मैदान में है। चुनाव नतीज़ों की घोषणा के बाद यदि किसी को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला तो खेल कुछ दिन और रोचक बना रह सकता है।
20-5-2019
JOURNALIST VED PRAKASH BHARDWAJ SHARING HIS VIEWS ON SOCIAL ISSUES, LITERATURE, ART, AND POLITICS. पत्रकार वेद प्रकाश भारद्वाज के सामाजिक, साहित्य, कला, राजनीति आदि पर विचार
Tuesday, May 21, 2019
लोकतंत्र का प्रहसन : वेद प्रकाश भारद्वाज
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बहुत ही सारगर्भित लेख है। विशेषकर यह पंक्ति कि अमीर और गरीब कभी लड़ते नहीं हैं । दोनों ही अपनी सीमा में डरे-दुबके रहते हैं। एक के पास लड़ने के साधन नहीं दूसरे के पास समय नही है।
ReplyDeleteभविष्य को देखकर अगर हमें भय लगता है तो उसका कारण वर्तमान है। बहुत प्रसंगिके है सर जी।
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