डॉ. वेद प्रकाश भारद्वाज
दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र होने का दम भरते हुए
पिछले 70 साल में हम लगातार सामंतशाही को अपनी नियति बनाते रहे हैं। संसदीय व्यवस्था, संविधान और कानून व्यवस्था के साथ ही मानवाधिकारों और लोकतांत्रिक अधिकारों, प्रातिनिधिक शासन व्यवस्था के बाद भी यदि यह कहना पड़ रहा है कि हमारा लोकतंत्र
केवल प्रतिकात्मक है या केवल भ्रम है तो इसके कुछ ठोस कारण हैं। दुनिया के अनेक
लोकतांत्रिक देशों में आज भी राजशाही है, ब्रिटेन में हैं, जापान में है, और भी जगहों पर है परंतु वहाँ राजशाही केवल प्रतिकात्मक है। भारत में राजशाही
नहीं है, प्रतिकात्मक भी नहीं,
घोषित रूप से यही स्थिति है। परंतु क्या यह वास्तविक स्थिति है? नहीं, वास्तविक स्थिति यही है कि हम अप्रत्यक्ष रूप से आज भी राजशाही की स्थिति में
जी रहे हैं। कारण कि आज़ादी के बाद भले ही हमने लोकतांत्रिक शासन प्रणाली को अपना
लिया परंतु अपनी मानसिकता को हम राजशाही से मुक्त नहीं कर सके। पिछले दिनों जब
प्रियंका गांधी वाड्रा को कांग्रेस का महासचिव बनाया गया तब कांग्रेसियों और
कांग्रेस समर्थकों के अलावा मीडिया में भी जिस तरह उनका स्वागत किया और उनमें
भविष्य देखना शुरू किया वह एक लोकतांत्रिक अभिव्यक्ति थी या कि राजशाही वाली
मानसिकता का प्रदर्शन? कांग्रेस, सपा, बसपा, राजद, जदएस, नेशनल कांफ्रेंस, द्रमुक, तेलुगु देशम, राष्ट्रीय कांग्रेस पार्टी, शिवसेना और इसी तरह के अन्य दल क्या लोकतांत्रिक
राजनीतिक दल हैं या कि पारिवारिक संस्थान?
वंशवाद की बढ़ती बेल
भारतीय मानस 70 साल की लोकतांत्रिक यात्रा के बाद भी यदि
सामन्तवादी मानसिकता का शिकार है तो इसके एक तरफ ऐतिहासिक कारण हैं तो दूसरी तरफ
वर्तमान राजनीतिक दुरभिसंधि भी है। सवाल उठता है कि यह वंशवाद क्यों फलता-फूलता है? इसका एक ऐतिहासिक कारण तो यह कि 1947 के पहले तक भारतीय मानस किसी न किसी सत्ता की
अनुकंपा पर जीवन को सम्भव मानता रहा है, चाहे वह राजा हो या ईश्वर। दूसरा यह कि कोई भी
सत्ता हो, राजा या ईश्वर,
आम जनता के लिए असंदिग्ध रही है। तीसरे यह कि भारतीय मानस सामाजिक स्थितियों
की शास्त्रसम्मत व्यवस्था को अनुलंघनीय मानता आया है। इसी से जन्म से जाति और धर्म
के निर्धारण के साथ ही कर्म और सत्ता का निर्धारण होता आया है, हो रहा है। भारतीय समाज कभी भी उस तरह का संघर्षशील समाज नहीं रहा है जैसा
यूरोपीय समाज रहा है या जापान और चीन रहा है जिन्होंने अपनी समस्याओं के हल के लिए
राजा या ईश्वर की तरफ देखने की बजाय अपने बाजुओं पर और अपनी मेहनत पर विश्वास
किया। यदि महात्मा गांधी ने नेतृत्व न किया होता तो सारा देश अंग्रेजी शासन के खिलाफ़
न हुआ होता। गांधी से पहले और बाद की स्थितियाँ इसका प्रमाण हैं। 1857 की क्रांति की विफलता का कारण भी यही था कि अलग-अलग रियासतों में लोग अलग-अलग
नेतृत्व में लड़ रहे थे और सबके आराध्य व आदर्श अलग-अलग थे। उस समय सभी राजा-रानी
केवल अपनी सत्ता को कायम रखने या उसे वापस हांसिल करने के लिए लड़ रहे थे।
महात्मा गांधी का आभामंडल
यह एक सर्वविदित सत्य है कि कांग्रेस की स्थापना
आज़ादी के लिए नहीं हुई थी बल्कि आम जनता और अंग्रेज सरकार के बीच तालमेल बनाये
रखने और भारतीयों के लिए शासन से कुछ रियायतें प्राप्त करने के लिए की गयी थी।
रियायतों के इन हकदार भारतीयों में पूरा भारतीय समाज शामिल नहीं था। यह वह भारतीय
लोग थे जो अंग्रेजी शिक्षा के कारण प्रशासन का हिस्सा थे, जिनके हाथ में आर्थिक शक्ति थी। यह लोग भारतीय समाज का एक छोटा सा हिस्सा थे
और उच्च वर्ग के थे। महात्मा गांधी के आने के बाद कांग्रेस में इन सुधारवादियों की
जगह समाप्त हो गयी। गांधीजी ने खुद को आम भारतीय से जोड़ा और उसे आज़ादी के लिए लड़ने
को तैयार किया। लोगों ने गांधी में संत देखा और उन्हें महात्मा मान लिया। गांधीजी
देश की आज़ादी को लेकर लड़ रहे थे। उनके पास भी भविष्य के लोकतांत्रिक देश का कोई
नक्शा नहीं था और न ही उनके प्रिय नेताओं के पास ही। गांधीजी के आभामंडल का यह लाभ
तो हुआ कि देश की आम जनता भी आज़ादी के लिए लड़ने को आगे आयी परंतु उससे जनता में
किसी तरह का लोकतांत्रिक संस्कार जागृत नहीं हो पाया। गांधीजी का अपना जीवन चाहे
जितना लोकतांत्रिक रहा हो,
वह लोगों को लोकतांत्रिक संस्कार देने में विफल रहे। उनके कुछ निर्णय ऐसे भी
रहे जिन्हें देखते हुए उनकी लोकतांत्रिक आस्थाएँ संदिग्ध बनी रहीं। उदाहरण के लिए
हम सुभाषचंद्र बोस के कांग्रेस अध्यक्ष बनने के बाद की स्थितियों में गांधीजी की
भूमिका को देख सकते हैं। कांग्रेस के अंदर लोकतांत्रिक प्रक्रिया को कुंद करने का
वह पहला प्रकरण था जब एक निर्वाचित अध्यक्ष को गांधीजी की इच्छा के कारण पद
त्यागना पड़ा। वैसे तो यह एक बहुत छोटी घटना थी और बाद में इसे इसी रूप में समझा भी
गया परंतु यह थी बहुत बड़ी बात। यह संकेत था कि इस बात का कि आने वाली राजनीति कैसी
होगी। यही नहीं, जिस तरह बहुमत की पसंद सरदार पटेल को अध्यक्ष बनने से गांधीजी ने रोका और
नेहरू को अध्यक्ष बनवाया वह भी कांग्रेस में लोकतांत्रिक प्रक्रिया के अंत का एक
पड़ाव था। यह एक निर्विवाद सत्य है कि संगठन में तमाम निर्णयों को लेकर गांधीजी को अंतिम
अधिकार प्राप्त था। यह अधिकार इसलिए था क्योंकि भारतीय जनता उनमें एक महात्मा को
देखती थी और उनसे हर तरह के चमत्कार की आशा करती थी। गांधीजी ने अपने स्तर पर समाज
को सुधारने के कुछ काम किये परंतु उन्हें जो काम सबसे अधिक करना चाहिए था, वह नहीं किया। देश को एकता के सूत्र में बांधने के चक्कर में वह उसे
लोकतांत्रिक बनाने से चूक गये।
उधार का लोकतंत्र
दुनियाभर में जिन देशों में हम आज लोकतांत्रिक
व्यवस्था देखते हैं उनका इतिहास इस बात का प्रमाण है कि वहाँ की जनता ने उसे
अर्जित किया। अमेरिका हो या इंग्लैंड, फ्रांस हो या जर्मनी या कि जापान, इन देशों में जनता ने देश में लोकतांत्रिक व्यवस्था कायम करने के लिए संघर्ष
किया। ठीक उसी प्रकार सोविय संध के देशों और चीन ने साम्यवादी व्यवस्था के लिए
संघर्ष किया। इसके विपरीत हम भारत में देखते हैं कि लोगों ने लोकतंत्र के लिए किसी
तरह का संघर्ष नहीं किया। उसका सारा संघर्ष सिर्फ विदेशी शासन से मुक्ति ही रहा।
यही कारण है कि जब अंग्रेजों को लगा कि अब इस देश पर आगे शासन संभव नहीं है तो
उन्होंने सत्ता हस्तांतरण की नीति पर काम किया। इस नीति के तहत अंग्रेजों ने सत्ता
तो कांग्रेस को सौंप दी परंतु साथ ही शासन करने का तरीका भी निर्धारित कर दिया। और
यह तरीका वही था जो इंग्लैंड में चल रहा था। भारत ने अपना संविधान बनाया, संसदीय प्रणाली को अपनाया, अन्य बातों को भी अपनाया परंतु क्या इस लोकतांत्रिक
व्यवस्था को बनाने में जनता की किसी तरह की प्रत्यक्ष भागीदारी थी? जो कुछ नेताओं को सही लगा उसे अपना लिया गया और जनता ने उसे स्वीकार कर लिया।
यह स्वीकार किया जा सकता है कि उस समय देश
की 20 प्रतिशत जनता ही शिक्षित थी पर उस समय इसका भी प्रयोग नहीं किया गया। और फिर
यह कैसे मान लिया गया कि जो शिक्षित नहीं थे वह कैसा देश व शासन चाहते हैं इसे
अभिव्यक्त नहीं कर सकते थे।
नेहरू और उसके बाद
आज़ादी के बाद नेहरूजी प्रधानमंत्री बने तो वह एक
तरह से राजा ही बने थे। भले ही बाद में चुनाव की प्रक्रिया अपनायी गयी परंतु वह
एकमात्र निर्विकल्पिक विकल्प थे। सामने ऐसी कोई दूसरी पार्टी थी ही नहीं जो उन्हें
टक्कर दे सके, और जो थे उनके पास नेहरूजी जैसे आभामंडल वाला कोई नेता नहीं था। आज़ादी
से पहले कांग्रेस में सरदार पटेल विकल्प थे परंतु वह गांधीजी की पसंद नहीं थे
इसीलिए उनके पक्ष में बहुमत होने के बाद भी आज़ादी से पहले उन्हें कांग्रेस अध्यक्ष
नहीं बनने दिया गया। कारण कि अंग्रेजों द्वारा भारत की शासन व्यवस्था कांग्रेस
अध्यक्ष को ही सौंपी जानी थी। यदि पटेल उस समय कांग्रेस अध्यक्ष होते तो
प्रधानमंत्री उन्हें ही बनाना पड़ता। इसीलिए गांधीजी ने दबाव डालकर पटेल को चुनाव
से हटने और नेहरू को अध्यक्ष स्वीकार करने को बाध्य किया।
बहरहाल, जब तक नेहरूजी जिंदा रहे कांग्रेस और देश में वह
अकेली और अंतिम अथॉरिटी रहे। उनकी मृत्यु के बाद लाल बहादुर शास्त्री को
प्रधानमंत्री बनाया गया। जब लाल बहादुर शास्त्री की मृत्यु हुई उस समय कांग्रेस
में कई वरिष्ठ नेता थे परंतु इंदिरा गांधी
को प्रधानमंत्री बनाया गया। यहीं से कांग्रेस का एक परिवार की संस्था बनने का दौर
शुरू हुआ। इंदिरा गांधी ने योग्य वरिष्ठ नेताओं के होते हुए भी कांग्रेस में अपना
ऐसा गुट बना लिया था कि उनके मुकाबले में कोई सामने न आ सके। इसके लिए उन्होंने कुछ
वरिष्ठ नेताओं को भी अपने प्रभाव में ले रखा था। इसके बाद की कहानी सबके सामने है
कि किस तरह इंदिरा गांधी के बाद संजय गांधी की पर्दे के पीछे की सरकार रही और
इंदिराजी की हत्या के बाद किस तरह राजीव गांधी को प्रधानमंत्री बनाया गया। उनकी
हत्या के बाद कांग्रेस को बहुत मिला तो आवाज उठी की सोनिया गांधी को प्रधानमंत्री
बनाया जाए परंतु पार्टी के अंदर और बाहर उनके विदेशी होने को लेकर विवाद के कारण
यह संभव नहीं हुआ। उसके बाद से कांग्रेस ने कई बार केंद्र में शासन किया। पहले
नरसिंह राव और बाद में मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री रहे परंतु शासन की डोर सोनिया
गांधी के हाथ में रही। अब राहुल गांधी देश के भावी प्रधानमंत्री हैं और प्रियंका
में लोग इंदिरा गांधी की छवि देख रहे हैं।
कई बार यह सवाल उठता है कि जब कांग्रेस में
इंदिराजी के मुकाबले में मोरारजी देसाई, गुलजारी लाल नंदा, कामराज, देवकांत बरूआ जैसे वरिष्ठ और अनुभवी नेता थे तब जनता ने इंदिरा गांधी को ही
क्यों पसंद किया। इनमें से देवकांत बरूआ ने तो बाद में कांग्रेस डी की स्थापना की
परंतु उनका राजनीतिक जीवन ही समाप्त हो गया। मोरारजी देसाई 1977 में जनता पार्टी
की जीत के बाद बड़े विवाद के बाद ही प्रधानमंत्री बन पाये। कामराज तो इंदिराजी के
साथ ही रहे। हेमवती नंदन बहुगुणा और कमलापति त्रिपाठी के साथ ही जगजीवन राम जैसे
नेता हमेशा हाशिये पर रखे गये। इनमें से कुछ का कांग्रेस से अलग होने पर इन्हें
जनता का समर्थन नहीं मिलना इस बात का प्रमाण है कि जनता राजभक्ति वाली मानसिकता को
छोड़ने को तैयार नहीं थी क्योंकि वह लोकतंत्र का वास्तविक अर्थ जानती ही नहीं थी।
यही वजह है कि नारायण दत्त तिवारी, अर्जुन सिंह, शरद पवार जैसे बड़े नेता कांग्रेस से अलग होकर
महत्वहीन हो गये और फिर से कांग्रेस में लौटने को मजबूर हुए। भारतीय राजनीति में
वंशवाद और राजशाही के साथ ही गुलाम मानसिकता का इससे बड़ा प्रमाण मिलना मुश्किल
है।
गैर कांग्रेसी दलों की भूमिका
आज़ादी से पहले ही एक तरफ कांग्रेस के अंदर ही
समाजवादी नेताओं का एक गुट था तो दूसरी तरफ वामपंथी दल आकार लेने का प्रयास कर रहे
थे। हिंदू महासभा पहले से मौजूद थी और वामपंथी दल भी आकार लेने की कोशिश कर रहे
थे। देश में पहला आम चुनाव 1952 में हुआ। इतिहासकार रामचंद्र गुहा का मत है कि जिस
देश को आजाद हुए केवल पाँच साल हुए हों, जहाँ सदियों से राजशाही रही हो और जहाँ शिक्षित
जनता केवल 20 प्रतिशत हो वहाँ सबको मताधिकार प्राप्त होना बड़ी बात थी। इसमें कोई शक नहीं
कि यह मताधिकार एक बड़ी उपलब्धि थी परंतु केवल मताधिकार मिलने से लोकतंत्र पूर्ण
नहीं हो जाता। यह भी देखना चाहिए कि लोग इस मताधिकार का प्रयोग किस तरह करते हैं। 1951-52 के आम चुनाव में जनता ने नेहरू को वोट दिया, किसी विचार या कार्यक्रम को
नहीं। उस समय यह सब प्रासंगिक था भी नहीं। सामने कोई सशक्त विपक्ष भी नहीं था।
आचार्य जे बी कृपलानी कांग्रेस में समाजवादी विचारधारा वाले गुट का नेतृत्व करते
थे। 1950 के कांग्रेस अध्यक्ष के चुनाव में वह कांग्रेस के हिंदूवादी गुट के नेता
पुरूषोत्तम दास टंडन के मुकाबले हार गये जबकि कृपलानी को नेहरू का समर्थन प्राप्त
था। कृपलानी ने कांग्रेस छोड़ दी और किसान मजदूर प्रजा पार्टी की स्थापना की। जय
प्रकाश नारायण की सोशलिस्ट पार्टी उन दिनों तेजी से उभर रही थी। कांग्रेस से
त्यागपत्र देकर श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने जनसंघ की स्थापना की और चुनाव में
दावेदारी की। कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया श्रीपाद अमृत डांगे के नेतृत्व में
मैदान में थी। भीमराव अम्बेडकर ने भी कांग्रेस छोड़ कर शिड्यूल कास्ट फेडरेशन बनाया
जो बाद में रिपब्लिकन पार्टी बना। अम्बेडकर और आचार्य कृपलानी चुनाव हार गये।
कांग्रेस ने लोकसभा और विधानसभाओं में प्रचंड बहुमत प्राप्त किया। लोकतंत्र का एक
अध्याय पूरा हुआ परंतु इसे लोकतंत्र का साकार होना नहीं माना जा सकता था। सरदार
पटेल की मृत्यु के बाद कांग्रेस में नेहरूजी के लिए कोई चुनौती नहीं बची थी। यही
कारण था कि 1950 के पार्टी चुनाव में उनके समर्थित आचार्य कृपलानी को हराने के बाद भी पुरूषोत्तम
दास टंडन को नेहरूजी के विरोध और पार्टी में चलते मदभेदों के कारण पद से त्यागपत्र
देना पड़ा। इसे उस समय बहुत गंभीरता से नहीं लिया गया परंतु यह कांग्रेस में आंतरिक
लोकतंत्र के समाप्त होने का एक और पड़ाव था। कांग्रेस के एक व्यक्ति पर केंद्रित
होने की यह शुरूआत आगे चल कर कांग्रेस का ही चरित्र नहीं बनी, अन्य दलों का चरित्र भी बन गयी। इस चरित्र से समाजवादी दल, जनसंघ और कम्युनिष्ट पार्टी बचे रहे परंतु भारतीय मानस में व्यक्ति पूजा इतनी
गहरी रची-बसी थी कि उसे मिटाना किसी भी दल के लिए संभव नहीं हुआ।
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