वेद प्रकाश भारद्वाज
कांग्रेस में आंतरिक लोकतंत्र की विदाई तो
आज़ादी से पहले ही हो गयी थी जब गांधीजी के दबाव में सुभाष चंद्र बोस को चुने जाने
के बाद भी पद छोड़ना पड़ा और सरदार पटेल को पार्टी सदस्यों की इच्छा के विपरीत भी
खुद को पार्टी अध्यक्ष पद से अलग करना पड़ा। देश में लोकतांत्रिक शासन प्रणाली तो
अपना ली गयी परंतु इस प्रणाली को स्थापित करने और आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी जिन
राजनीतिक दलों पर थी उनमें से ज्यादातर आंतरिक लोकतंत्र को कायम नहीं रख सके। समाजवादी
दल कभी एक संगठन के रूप में व्यवस्थित नहीं रह सके। वह लगातार टूटते और जुड़ते रहे।
और इसीलिए एक संगठन के रूप में वह जनता को बहुत प्रभावित नहीं कर सके। जनसंघ की
बागड़ोर आरएसएस के हाथ में रही। कम्युनिस्ट पार्टी पर सोवियत संघ का नियंत्रण रहा।
इस तरह शुरूआती दौर से ही राजनीतिक दलों में आंतरिक लोकतंत्र केवल दिखाने के लिए
रहा। यही कारण था कि जनता में भी वह किसी तरह की लोकतांत्रिक चेतना जगाने में विफल
रहे। लाल बहादुर शास्त्री की मृत्यु के बाद वरिष्ठ नेताओं को दरकिनार कर इंदिरा
गांधी का प्रधानमंत्री बनना और बाद में पार्टी को विभाजित कर उसकी अघोषित मालकिन
बन जाना यही प्रमाणित करता है कि हमारे नेताओं में भी किसी तरह की लोकतांत्रिक
चेतना नहीं थी, कम से कम कांग्रेस
में तो नहीं ही थी। आज कांग्रेस में जिस तरह से वरिष्ठ और अनुभवी नेताओं को किनारे
कर जिस तरह राहुल और प्रियंका को आगे लाया गया है उसे किसी भी तरह से लोकतांत्रिक
नहीं कहा जा सकता।
आंतरिक लोकतंत्र के इस अभाव का विस्तार आगे
चलकर उन सभी दलों में हुआ जो या तो कांग्रेस की कोख से निकले या कांग्रेस के विरोध
में जिन्होंने जन्म लिया। 1975 का राजनीतिक
परिदृश्य भारतीय राजनीति में एक बड़े परिवर्तन का प्रमाण था। विपक्ष से डर कर
इंदिरा गांधी का आपातकाल लगाना और फिर 1977 के चुनाव में हार जाना बड़ी घटना हो सकती थी जो भारतीय
राजनीति की दिशा बदलने का कारण बनती। दुर्भाग्य से यह सब केवल घटना बनकर रह गये।
जनता पार्टी के झगड़ों के बाद उसका टूटना लोकतंत्र की हार थी। यह हार हमने आगे चलकर
जनता दल में कई बार देखी।
इंदिरा गांधी ने खुद को इतना शक्तिशाली बना
लिया था कि कांग्रेस में उनकी मर्जी के बिना पत्ता भी नहीं हिलता था। इंदिरा इज इंडिया जैसी गर्वोक्तियाँ इसी का परिणाम थीं। वह चाहे जब मंत्रियों, मुख्यमंत्रियों और राज्यपालों को बदल देती थीं। यहाँ तक कि
राष्ट्रपति चुनाव में भी उन्होंने पार्टी के बहुमत की कभी परवाह नहीं की। यह साफ
दिख रहा था कि उन्होंने कांग्रेस को अपनी निजी जागीर बना लिया था। इसीलिए उन्होंने
पहले संजय गांधी को और उनकी मृत्यु के बाद राजीव गांधी को पार्टी का भविष्य बना
दिया। कांग्रेस के कथित बड़े नेता अंदर से एकदम बौने थे और आत्मविश्वास से खाली भी।
इसका प्रमाण राजीव गांधी की मृत्यु के बाद सोनिया गांधी को प्रधानमंत्री बनाने की
कोशिशों के रूप में मिलता है। जब इसमें कामयाबी नहीं मिली तो उन्होंने पार्टी और
सरकार की कमान अघोषित रूप से सोनिया गांधी को सौंप दी। यह एक तहर की राजशाही ही है
कि राजा की पत्नी या उसके बच्चों की तरह कांग्रेस और देश की बागडोर संभालने के लिए
नेहरू-गांधी परिवार को ही सबसे उपयुक्त घोषित किया गया। राजीव गांधी की हत्या
चुनावों के दौरान हुई थी। उस समय तक यह माना जा रहा था कि कांग्रेस सत्ता में नहीं आ पाएगी परंतु उनकी हत्या के बाद लोगों ने
कांग्रेस को विजयी बनाया। यह भारतीय मानस में मौजूद राजशाही संस्कारों का ही
प्रमाण था।
परिवर्तन की हवा लेकर आये दल भी अपवाद नहीं
बने
भारतीय राजनीति लगातार करवट ले रही थी
परंतु यह करवट लेना चेतनावस्था में नहीं बल्कि निंद्रा में था। 1990 के बाद से देश की राजनीति ने कई बार करवट ली। कई नये दल और
राजनीतिक आंदोलन सामने आये। जेपी आंदोलन के बाद जिस तरह बिहार में लालु प्रसाद
यादव,
उत्तर प्रदेश में मुलायम
सिंह यादव उभरे और 1990 के बाद राजनीति के
चमकते सितारे बने, जिस तरह कांशीराम ने
बसपा के माध्यम से दलित राजनीति का ध्रुवीकरण किया, आंध्र प्रदेश में एनटी रामाराव ने जिस तरह कांग्रेस को
हराया वह एक नयी बयार की तरह लग रहा था। एनटी रामाराव ने केंद्रीय राजनीति को भी
प्रभावित किया। कांग्रेस का वर्चस्व समाप्त होने लगा तो लगा कि भारतीय समाज में
राजशाही और वंशवाद की जड़ें समाप्त हो जाएँगी और वास्तविक अर्थो में लोकतांत्रिक
चेतना की स्थापना होगी। लालू प्रसाद यादव ने बिहार में, मुलायम और कांशीराम ने उत्तर प्रदेश में राजनीतिक स्थितियों को बदल दिया। बंगाल व
केरल में वामपंथी दलों का वर्चस्व हो गया। इतना सब होने के बाद भी भारतीय मानस से
राजशाही और वंशवाद को मिटाया नहीं जा सका।
भारतीय लोकदल चरण सिंह की पारिवारिक पार्टी
है। उनके बाद उनके बेटे अजित सिंह और उनके बेटे पार्टी हैं। मुलायम सिंह की सपा
उनकी पारिवारिक संस्था बनकर रह गयी है। बसपा मायावती के अलावा कुछ नहीं है और
इसीलिए वह अपने भतीजे को अब आगे ला रही हैं ताकि उनकी विरासत को बढ़ाने का काम हो
सके। लालू प्रसाद यादव का तो मामला ही अलग है। चारा घोटाले में गिरफ्तार होने के बाद
उन्होंने अपनी पत्नी को बिहार की मुख्यमंत्री बना दिया और आजकल उनका बेटा पार्टी
का सर्वेसर्वा है। एनटी रामाराव की मृत्यु के बाद पार्टी की बागडोर उनकी पत्नी
पार्वती को सौंपी गयी। तमिलनाडु में रामाचंद्रन की मृत्यु के बाद उनकी पत्नी जानकी
रामाचंद्रन को मुख्यमंत्री बना दिया गया। बाद में जयललिता उनकी उत्तराधिकारी बनीं। द्रमुक भी करूणानिधि की निजी संस्था रही।
नेशनल कांफ्रेंस अब्दुल्ला परिवार की संपत्ति है। यही स्थिति अन्य दलों की है। इनेलो चौटाला परिवार की
तो राकांपा शरद परिवार की। भारतीय राजनीति में आज ऐसे दलों का बहुमत है जो खुद एक
लोकतांत्रिक दल की कसौटी पर खरे नहीं उतरते। ऐसे दलों से आप कैसे लोकतांत्रिक
परम्परा व चेतना के विस्तार की आशा कर सकते हैं।
भाजपा और लोकतंत्र
भाजपा (पूर्व में जनसंघ) पर यह आरोप लगाया
जाता है कि उसमें सारे निर्णय आरएसएस मुख्यालय में लिये जाते हैं परंतु इस तरह का
आरोप लगाने वाले और उनपर सहमति जताने वाले यह भूल जाते हैं कि संघ अपने आप में एक
लोकतांत्रिक संगठन है जिसका प्रमुख आम सहमति के आधारा पर चुना जाता है, वंश के आधार पर नहीं। इसी प्रकार भाजपा में आज तक किसी को
अध्यक्ष वंश के आधार पर नहीं बनाया गया। यहाँ तक कि भाजपा में कोई नेता लगातार दो
बार से अधिक अध्यक्ष पद पर नहीं रह सकता। इस तरह की व्यवस्था अन्य किसी दल में
नहीं है, वामपंथियों में भी नहीं। भाजपा पर वंशवाद के आरोप लगाने
वाले कहते हैं कि वह भी अपने नेताओं के बेटों, बहुओं, भाइयों को चुनाव में
टिकट दे रही है। यह सही है परंतु कांग्रेस और अन्य दलों के वंशवाद और भाजपा के
वंशवाद में एक मौलिक अंतर यह है कि कांग्रेस हो या सपा या अन्य दल, उनमें पार्टी व सत्ता का नियंत्रण वंश के पास होता है। इसके
विपरीत भाजपा में किसी नेता के बेटा या बेटी या बहू को टिकट तो दिया पर ऐसा नहीं
हुआ कि उसे पार्टी का स्वाभाविक मालिक और सत्ता का नैसर्गिक उत्तराधिकारी माना गया
हो। भाजपा ने शिवराज सिंह और वसुधरा राजे का विरोध होने पर उनके बेटे या अन्य
संबंधी को मुख्यमंत्री नहीं बनाया। कांग्रेस होती तो यही किया जाता। कांग्रेस से
निकले देवेगौडा के जनता दल सेक्युलर ने क्या किया, कर्नाटक की सत्ता अपने परिवार के पास रखी और पार्टी को अपनी मिलकियत बनाये
रखने के लिए अपने पोतों को भी चुनाव में उतार दिया।
लोकतंत्र का भ्रम और उसका जश्न
इतना सब होने के बाद भी हम इस बात का जश्न
मनाते हैं कि हमारा देश दुनिया का सबसे बड़ा और सफल लोकतांत्रिक देश है। एक ऐसा
लोकतांत्रिक देश जिसमें आज भी ज्यादातर राजनीतिक दल किसी न किसी परिवार की निजी
मिलकियत बने हुए हैं। जो एक व्यक्ति या परिवार के अलावा कुछ और सोच भी नहीं पाते।
और जिस देश की जनता आज भी अपनी सारी परेशानियां, सारी समस्याओं के निदान की उम्मीद उनसे बांधकर ही मतदान का
निर्णय लेती है। इस बार आम चुनाव में जिस तरह मुद्दों और कार्यक्रमों की उपेक्षा
की गयी और व्यक्तिगत विरोध को ही राजनीति का सर्वस्व बना दिया गया क्या वह एक
स्वस्थ लोकतांत्रिक प्रक्रिया कही जा सकती है।
सत्रहवीं लोकसभा चुनावों में भाजपा की जीत एक नयी इबारत लिख रही है। आज कांग्रेस के साथ जो राजनीतिक दल हैं या भाजपा को सरकार से बाहर करने
के लिए जो कांग्रेस का समर्थन कर सकते हैं उनमें ज्यादातर दलों में और कांग्रेस
में कोई मूलभूत अंतर नहीं है। ज्यादातर दल खुद को कितना ही लोकतांत्रिक होने का
नाटक करें, हकीकत तो यही है कि
वह निजी लिमिटेड कंपनी से अधिक कुछ नहीं हैं। लोकतंत्र का यह भ्रम कब तक चलेगा कुछ
कहा नहीं जा सकता। कारण कि अभी भी हमारे यहाँ ऐसे राजनीतिक दल और गैर राजनीतिक
संगठन नहीं हैं जो जनता को लोकतांत्रिक शिक्षा देने का काम कर सकें। इस दिशा में
मीडिया से कुछ आशा की जा सकती थी परंतु वह भी अब इस या उस खेमें में बंटी है। एक
निष्पक्ष नहीं बल्कि जनपक्ष मीडिया ही कुछ कर सकता है। इस दिशा में कुछ लोग प्रयास
कर रहे हैं परंतु उनकी व्यापक जन तक पहुँच नहीं है। फिर झूठ बोलने वाले इतने अधिक
है कि उनके बीच सच बोलने वालों की आवाज सुनाई ही नहीं देती। यह बहुत निराशाजनक
दृश्य है पर इसी में हमें आशा के कुछ संकेत तलाशने होंगे। आज राजनीति यदि एक
व्यापार बन गयी है तो मीडिया भी मालिकों के लिए लाभ देने वाला काम और पत्रकारों के
लिए भी अच्छे वेतन वाला पेशा है। इनके बीच अब भी इंटरनेट पर सोशल मीडिया, ब्लॉग, ऑन लाइन पत्रिकाओं
के रूप में कुछ संभावनाएँ बची हैं और उन छोटे मीडिया समूहों से भी जो स्थानीय स्तर
पर काम कर रहे हैं। ऐसे मीडिया से यह आशा की जा सकती है कि वह छोटे-छोटे समूहों
में ही सही, ऐसे लोगों को खड़ा
करने में सहायक हो सकते हैं जो लोकतंत्र को एक जमीनी हकीकत बनाने का काम कर सकते
हैं।
इन सबके बीच सबसे अधिक आशा मतदाताओं की उस
पीढ़ी से है जो पिछले कुछ सालों में अस्तित्व में आयी है या जो निकट भविष्य में आने
वाली है। इसी मतदाता वर्ग ने पिछले लोकसभा चुनाव में भाजपा को पूर्ण बहुमत के साथ
सŸा सौंपी थी। इसी वर्ग ने बाद में दिल्ली विधानसभा चुनावों
में भाजपा को नकार कर आम आदमी पार्टी को चुना। यही वर्ग है जो एक समय अन्ना हजारे
के आंदोलन को आगे बढ़ाने का काम करता नजर आया था। यह वर्ग शिक्षित भी है और
व्यावहारिक भी। इस वर्ग के लिए परंपराओं का महत्व है परंतु यह वंशवाद के साथ खड़ा
होगा इसकी आशा नहीं की जा सकती। हाँ कुछ समय के लिए इसे जाति या धर्म के नाम पर
गोलबंद किया जा सकता है पर उम्मीद की जानी चाहिए कि यह अधिक विवेकशील होकर सही और
गलत का निर्णय ले सकेगा। मुझे सबसे अधिक इसी वर्ग से आशा है और यही लोकतंत्र के इस
भ्रम को तोड़कर उसे वास्तविकता बनाने का काम कर सकता है।
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