Tuesday, June 18, 2019

कांग्रेस जो एक विचार थी



                               
                                                                  वेद प्रकाश भारद्वाज


जब राजीव विपक्ष में थे तो देश की यात्रा करते थे। रास्ते में कहीं किसी ढाबे पर या ऐसी ही जगह रुककर लोगों से बातचीत करने लगते थे। यह सब उन्होंने उस वक्त भी किया जब चुनाव नहीं थे। यह एक तरह से उनके राजनीतिक जीवन का हिस्सा था। वैसा राजनीतिक जीवन राजीव के बाद कांग्रेस को नसीब नहीं हुआ। यही कारण है कि उनके बाद कांग्रेस कभी भी अपनी पुरानी प्रतिष्ठा को प्राप्त नहीं कर सकी। हालांकि राजीव गाँधी स्वभाव से राजनीतिक नहीं थे बस राजनीति उन्हें खून में मिली थी। वह तो अपनी पायलट की नौकरी में ही खुश थे। संजय गाँधी की 1980 में एरोप्लेन हादसे में मृत्यु के बाद अपनी माँ और तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी की मदद के लिए उन्हें राजनीति में प्रवेश करना पड़ा। परंतु राजनीति में प्रवेश करने के बाद भी वह राजनीति के कुशल खिलाड़ी नहीं रहे और इसीलिए अपनों के ही हाथों छले जाते रहे। फिर भी उन्होंने अपने नाना की तरह सीधे जनता से कैसे जुड़ा जाए यह सीख लिया था, भले ही ऐसा वह हारने के बाद कर पाये थे। पर क्या हम कह सकते हैं कि लगातार हारने के बाद भी कांग्रेस के वर्तमान नियंताओं ने कुछ सीखा है?
आज जब पिछले दो लोकसभा चुनावों में बुरी तरह हार का सामना करने के बाद कांग्रेस एक तरह से सदमे में है तब उसके लिए सबसे ज्यादा जरूरी यह है कि एक संगठन के रूप में वह खुद को व्यवस्थित करे। कांग्रेस का जो वर्तमान स्वरूप है वह हमेशा से नहीं था। अपने शुरूआती दौर में कांग्रेस एक विचार थी, आज़ादी का विचार जिसे महात्मा गांधी ने महात्मा होने से पहले ही देश में चारों दिशाओं में फैला दिया था। 1947 में आज़ादी मिलने के बाद उनका विचार था कि कांग्रेस को समाप्त कर दिया जाए, जो उचित ही था क्योंकि उसका उद्देश्य पूरा हो चुका था। परन्तु एक बने बनाये सांगठनिक ढांचे को छोड़कर एक नया संगठन खड़ा करने का साहस नेहरू या दूसरे कांग्रेसी नेताओं में नहीं था क्योंकि यह तय था कि गांधीजी भावी राजनीतिक परिदृश्य में किसी तरह की भूमिका स्वीकार करने वाले नहीं थे। और उनकी अनुपस्थिति में कम से कम नेहरू के लिए ऐसा संगठन खड़ा कर पाना संभव नहीं था जिसे वह अपनी इच्छा के अनुरूप आकार दे सकें। अपनी अपार लोकप्रियता के बाद भी नेहरू जी की अपनी सीमाएँ थीं जिन्हें वह जानते थे। इसीलिए गाँधीजी के रहते हुए उन्हें अपने विरोधियों से निपटने में बहुत मशक्कत नहीं करनी पड़ती थी।
गांधी जी का ऐसा आभा मंडल था और देशव्यापी स्वीकृति उन्हें प्राप्त थी कि किसी के लिए भी उनकी बात को अस्वीकार करना संभव नहीं था। एक तरह का निर्विवाद अधिकार उनके पास था, अंतिम निर्णय क अधिकार जिसका उन्होंने कई बार प्रयोग किया खासतौर पर नेहरूजी के राजनीतिक हितों की रक्षा के लिए। गाँधीजी को यह निर्णकारी शक्ति ऐसे ही प्राप्त नहीं हुई थी। यह इसलिए संभव हो पाया था क्योंकि वह अकेले नेता थे जो देश के सभी क्षेत्रों में एकजूटता का आधार थे। वह यदि देश को एक जूट कर पाए तो इसलिए कि उन्होंने स्वदेशी और सूत यानी चरखे के माध्यम से देश के लोगों को जोड़ा। उन्होंने अपने विचारों के प्रसार के लिए यंग इंडिया, नौजवान, हरिजन आदि अखबारों का सहारा लिया, शिक्षा और सेवा को अपना आधार बनाया। इसके लिए अलग संस्थान स्थापित किये। उन्होंने दैनिक जीवन और उसकी दैनिक क्रियाओं को महत्व दिया। आज कांग्रेस इन सबसे दूर है। उसका कोई प्रकाशन भी नहीं है। स्टेटमेंट है पर केवल दिखाने के लिए। एक समय कांग्रेस के पास श्रीकांत वर्मा जैसे चिंतक थे। कांग्रेस नेतृत्व साहित्यकारों, कलाकारों और पत्रकारों से संपर्क रखकर बौद्धिक संबंल अर्जित करता था जो अब देखने को नहीं मिलता। कांग्रेस के पास कोई सहयोगी संगठन नहीं है जैसे भाजपा के पास हैं। कांग्रेस के पास एनएसयूआई है पर वह विद्यार्थी परिषद की तरह चुनाव के आधार पर अपना ढांचा नही बनाता ओर पूरी तरह गांधी परिवार पर आश्रित है। कांग्रेस सेवादल का नामलेवा आज कोई नहीं है। महिला कांग्रेस और युवा कांग्रेस अब केवल उपचारिकताएँ हैं।
किसी भी राजनीतिक दल के लिए संगठन बहुत जरूरी होता है और संगठन का आधार होता है विचार और व्यवहार। कांग्रेस के पास आज सत्ता के अलावा कोई विचार नहीं है। यहाँ तक कि बसपा के दलित या सपा के पिछड़ा हित जैसा विचार भी नहीं जो महज एक दिखावा है। कांग्रेस के पास तो आज ऐसा कोई दिखावा यानी मुखौटा भी नहीं है। ऐसे में उसके पास किसी तरह का संगठन हो इसकी आशा भी धूमिल हो जाती है। यही कारण है कि उसमें मूल संगठन और नाममात्र के लिए बचे अनुशांगिक संगठन भी न होने के बराबर हो गये हैं। 1967 में जब पहली बार कांग्रेस का विभाजन हुआ तब इंदिरा गांधी ने संगठन चुनाव में पहले अपनी ताकत दिखाई थी। उसके बाद से पार्टी में संगठन की जगह व्यक्ति यानी इंदिरा गांधी ही सब कुछ हो गई थीं। यहाँ तक कि सहयोगी संगठनों में भी लोकतांत्रिक प्रक्रिया समाप्त कर दी गई थी और सबकुछ आलाकमान यानी कि इंदिरा गाँधी की इच्छा हो गई थी। इसीलिए वह संगठन से लेकर केंद्र व राज्य सरकारों तक को ताश के पत्तों की तरह फेंटती रहीं। वह एक ऐसा खेल था जिसमें सामने कोई खिलाड़ी होता ही नहीं था। यहीं से कांग्रेस एक निजी कम्पनी में बदलती चली गई और आज भी उसी रूप में है।
इंदिरा गाँधी के समय में भी कांग्रेस में ऐसे नेता थे जो उनके लिए चुनौती थे। यही कारण है कि उन्होंने हमेशा पार्टी के मजबूत नेताओं को कभी उभरने का मौका नहीं दिया और यदि कोई अपनी कोशिशों से पार्टी और पार्टी के बाहर अपना आधार बनाने में सफल हो भी गया तो उसे उन्होंने आगे बढ़ने का मौका ही नहीं दिया। राजीव गाँधी के समय में भी ऐसे नेता थे जो उन्हें चुनौती दे सकते थे। अर्जुन सिंह, सीताराम केसरी, नारायण दत्त तिवारी, विश्वनाथ प्रताप सिंह, प्रणव मुखर्जी, नरसिंम्हा राव, शरद पवार जैसे नेता उस समय थे। यह अलग बात थी कि उनमें से किसी में इतना साहस नहीं था कि खुलकर सामने आ सके। फिर भी पार्टी में उनकी उपस्थिति को महसूस किया जाता था। इसका प्रमाण है विश्वनाथ प्रताप सिंह जो पार्टी में जब राजीव गांधी के लिए चुनौती बन गये तो उन्हें निकालने की तैयारी की गयी। वीपी सिंह कांग्रेस से अलग हुए और उन्होंने राजीव गाँधी को सत्ता से बाहर का रास्ता दिखा दिया। 1984 में इंदिरा गाँधी की हत्या के बाद हुए चुनाव में कांग्रेस को जो सफलता मिली थी वह उसे आगे के किसी चुनाव में नहीं मिल सकी। 1989 से लेकर 2014 से पहले तक कांग्रेस हो या भाजपा या जनता दल किसी को भी पूर्ण बहुमत तो क्या उसके आसपास तक सीटें नहीं मिल पायीं। 1991 में राजीव गाँधी की हत्या के समय तक देश में आधे हिस्से में चुनाव हो चुके थे। शेष हिस्सों में उसे सहानुभूति लहर का लाभ मिला पर पूर्ण बहुमत नहीं मिला। यदि देखा जाए तो उसके बाद से कांग्रेस एक पार्टी के रूप में लगातार क्षरण की ओर बढ़ती दिखाई देती है। नेहरूजी के पास यदि भारत के आधुनिक तीर्थ स्थल बांध और पंचवर्षीय योजनाएँ थीं तो साथ ही पंचशील और विश्व बंधुत्व की अवधारणा भी। इंदिरा गाँधी ने इन्हीं अवधारणों को आगे बढ़ाते हुए गरीबी हटाओ का विचार दिया। इसके लिए बीमा कंपनियों और बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया गया। एकीकृत ग्रामीण विकाय योजनाएँ शुरू की गयीं। राजीव गाँधी ने नये भारत के निर्माण के स्वप्न के साथ यात्रा शुरू की। उनके भारत में कंप्यूटर और तकनीक की महत्वपूर्ण भूमिका थी। परंतु उनके बाद से कांग्रेस के पास एक भी ऐसा नेता नहीं हुआ जिसके पास देश के लिए कोई विजन हो, भले ही वह देश को स्वीकार हो या न हो।
राजीव गाँधी के बाद के भारत में कांग्रेस या तो विश्वबैंक और अंरराराष्ट्रीय मुद्राकोष की नीतियों का पालन करती रही है या बहुराष्ट्रीय निगमों का अनुपालन। इंदिरा गाँधी ने कांग्रेस के आंतरिक लोकतंत्र का अपहरण कर लिया था या उसकी हत्या कर दी थी फिर भी उनके पास कम से कम भारत के लिए एक अपनी दृष्टि थी जो उनकी आज की पीढ़ी के पास देखने को नहीं मिलती।
वर्तमान नेतृत्व को देखें तो काफी समय तक सोनिया गांधी को अध्यक्ष के साथ ही प्रधानमंत्री बनाने की कोशिशें भी हुईं पर वे परवान न चढ़ सकीं। नरसिंह राव और उनके बाद मनमोहन सिंह की सरकारों के अपना कार्यकाल पूरा करने के बाद भी कांग्रेस लोकमानस में अपना खोया आभा मंडल वापस स्थापित करने में विफल रही। इसका कारण यही था कि उसके पास उदारीकरण के अलावा ऐसा कुछ नहीं था जिसे वह देश और समाज को सौंप सके। और यह उदारीकरण भी उसका अपना नहीं था, यह तो एक वैश्विक स्थिति थी जिससे भारत का बच पाना संभव नहीं था। इतना ही नहीं इस उदारीकरण की प्रक्रिया में देश की नकेल भारत के हाथों से निकल कर अमेरिका और उसकी संस्थाओं के हाथों में चली गयी, यह बात किसी से छुपी हुई नहीं थी। कांग्रेस सरकार बनाने और चलाने में तो कामयाब रही पर जनता के मन पर ऐसी कोई छाप छोड़ने में विफल रही जिस मिटा पाना उसके विरोधियों के लिए मुश्किल होता।
कांग्रेस का संकट यहीं पर आकर नहीं रूका, वह निरंतर बढ़ता ही गया है। सत्रहवीं लोकसभा के चुनाव में कांग्रेस अपनी तरफ से ऐसा कोई कार्यक्रम जनता के सामन नहीं रख पायी जिसे उसकी मौलिक सोच कहा जा सके। उसकी न्याय योजना की अवधारणा के न्याय की बात भाजपा पहले ही कर चुकी थी। गरीबों के खातों में सीधे पैसे भेजने की योजना भाजपा की पिछली सरकार के समय ही हो गयी थी। कांग्रेस के पास घोषणाएँ तो थीं परंतु उन्हें कैसे पूरा किया जाएगा इसे लेकर कोई कार्ययोजना नहीं थी। यही कारण है कि जनता ने उसकी बातों को बहुत गंभीरता से नहीं लिया। इस चुनाव में कांग्रेस एक तरह से विचार-शून्यता की स्थिति में नज़र आयी। आप केवल सत्ता पक्ष की आलोचना करके चुनाव नहीं जीत सकते। यदि ऐसा होता तो जीत के दावेदार दूसरे दल भी थे। ऐसे में यदि यह बात उठ रही है कि जनता ने भाजपा को उतना नहीं चुना जितना कांग्रेस को चुनने से इनकार कर दिया। इस इनकार का एक बड़ा कारण यही था कि कांग्रेस जो कभी एक पार्टी हुआ करती थी, एक विचार हुआ करती थी आज केवल एक समूह है। और समूह भी ऐसा कि उसमें कोई संगठन, कोई संगति नहीं है। 

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