Saturday, June 29, 2019

Story of democracy

Story of democracy

Out of the circumference
Stuck something
Hawkish
Do not know what hesitation
Open Doors from Seventy Years
Stoic to himself
And by having anyone else.

Doors
Whether open or closed
Stops
To those
No habit to enter anywhere
And do not even have permission.

After the reception of the chain of flowers
Move the steps
The eternal fear
Cannot be destroyed
Between paper and sticks
Hindsome
They do not have a sticks
And the paper is very weak
In front of the blackjack

Tuesday, June 18, 2019

कांग्रेस जो एक विचार थी



                               
                                                                  वेद प्रकाश भारद्वाज


जब राजीव विपक्ष में थे तो देश की यात्रा करते थे। रास्ते में कहीं किसी ढाबे पर या ऐसी ही जगह रुककर लोगों से बातचीत करने लगते थे। यह सब उन्होंने उस वक्त भी किया जब चुनाव नहीं थे। यह एक तरह से उनके राजनीतिक जीवन का हिस्सा था। वैसा राजनीतिक जीवन राजीव के बाद कांग्रेस को नसीब नहीं हुआ। यही कारण है कि उनके बाद कांग्रेस कभी भी अपनी पुरानी प्रतिष्ठा को प्राप्त नहीं कर सकी। हालांकि राजीव गाँधी स्वभाव से राजनीतिक नहीं थे बस राजनीति उन्हें खून में मिली थी। वह तो अपनी पायलट की नौकरी में ही खुश थे। संजय गाँधी की 1980 में एरोप्लेन हादसे में मृत्यु के बाद अपनी माँ और तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी की मदद के लिए उन्हें राजनीति में प्रवेश करना पड़ा। परंतु राजनीति में प्रवेश करने के बाद भी वह राजनीति के कुशल खिलाड़ी नहीं रहे और इसीलिए अपनों के ही हाथों छले जाते रहे। फिर भी उन्होंने अपने नाना की तरह सीधे जनता से कैसे जुड़ा जाए यह सीख लिया था, भले ही ऐसा वह हारने के बाद कर पाये थे। पर क्या हम कह सकते हैं कि लगातार हारने के बाद भी कांग्रेस के वर्तमान नियंताओं ने कुछ सीखा है?
आज जब पिछले दो लोकसभा चुनावों में बुरी तरह हार का सामना करने के बाद कांग्रेस एक तरह से सदमे में है तब उसके लिए सबसे ज्यादा जरूरी यह है कि एक संगठन के रूप में वह खुद को व्यवस्थित करे। कांग्रेस का जो वर्तमान स्वरूप है वह हमेशा से नहीं था। अपने शुरूआती दौर में कांग्रेस एक विचार थी, आज़ादी का विचार जिसे महात्मा गांधी ने महात्मा होने से पहले ही देश में चारों दिशाओं में फैला दिया था। 1947 में आज़ादी मिलने के बाद उनका विचार था कि कांग्रेस को समाप्त कर दिया जाए, जो उचित ही था क्योंकि उसका उद्देश्य पूरा हो चुका था। परन्तु एक बने बनाये सांगठनिक ढांचे को छोड़कर एक नया संगठन खड़ा करने का साहस नेहरू या दूसरे कांग्रेसी नेताओं में नहीं था क्योंकि यह तय था कि गांधीजी भावी राजनीतिक परिदृश्य में किसी तरह की भूमिका स्वीकार करने वाले नहीं थे। और उनकी अनुपस्थिति में कम से कम नेहरू के लिए ऐसा संगठन खड़ा कर पाना संभव नहीं था जिसे वह अपनी इच्छा के अनुरूप आकार दे सकें। अपनी अपार लोकप्रियता के बाद भी नेहरू जी की अपनी सीमाएँ थीं जिन्हें वह जानते थे। इसीलिए गाँधीजी के रहते हुए उन्हें अपने विरोधियों से निपटने में बहुत मशक्कत नहीं करनी पड़ती थी।
गांधी जी का ऐसा आभा मंडल था और देशव्यापी स्वीकृति उन्हें प्राप्त थी कि किसी के लिए भी उनकी बात को अस्वीकार करना संभव नहीं था। एक तरह का निर्विवाद अधिकार उनके पास था, अंतिम निर्णय क अधिकार जिसका उन्होंने कई बार प्रयोग किया खासतौर पर नेहरूजी के राजनीतिक हितों की रक्षा के लिए। गाँधीजी को यह निर्णकारी शक्ति ऐसे ही प्राप्त नहीं हुई थी। यह इसलिए संभव हो पाया था क्योंकि वह अकेले नेता थे जो देश के सभी क्षेत्रों में एकजूटता का आधार थे। वह यदि देश को एक जूट कर पाए तो इसलिए कि उन्होंने स्वदेशी और सूत यानी चरखे के माध्यम से देश के लोगों को जोड़ा। उन्होंने अपने विचारों के प्रसार के लिए यंग इंडिया, नौजवान, हरिजन आदि अखबारों का सहारा लिया, शिक्षा और सेवा को अपना आधार बनाया। इसके लिए अलग संस्थान स्थापित किये। उन्होंने दैनिक जीवन और उसकी दैनिक क्रियाओं को महत्व दिया। आज कांग्रेस इन सबसे दूर है। उसका कोई प्रकाशन भी नहीं है। स्टेटमेंट है पर केवल दिखाने के लिए। एक समय कांग्रेस के पास श्रीकांत वर्मा जैसे चिंतक थे। कांग्रेस नेतृत्व साहित्यकारों, कलाकारों और पत्रकारों से संपर्क रखकर बौद्धिक संबंल अर्जित करता था जो अब देखने को नहीं मिलता। कांग्रेस के पास कोई सहयोगी संगठन नहीं है जैसे भाजपा के पास हैं। कांग्रेस के पास एनएसयूआई है पर वह विद्यार्थी परिषद की तरह चुनाव के आधार पर अपना ढांचा नही बनाता ओर पूरी तरह गांधी परिवार पर आश्रित है। कांग्रेस सेवादल का नामलेवा आज कोई नहीं है। महिला कांग्रेस और युवा कांग्रेस अब केवल उपचारिकताएँ हैं।
किसी भी राजनीतिक दल के लिए संगठन बहुत जरूरी होता है और संगठन का आधार होता है विचार और व्यवहार। कांग्रेस के पास आज सत्ता के अलावा कोई विचार नहीं है। यहाँ तक कि बसपा के दलित या सपा के पिछड़ा हित जैसा विचार भी नहीं जो महज एक दिखावा है। कांग्रेस के पास तो आज ऐसा कोई दिखावा यानी मुखौटा भी नहीं है। ऐसे में उसके पास किसी तरह का संगठन हो इसकी आशा भी धूमिल हो जाती है। यही कारण है कि उसमें मूल संगठन और नाममात्र के लिए बचे अनुशांगिक संगठन भी न होने के बराबर हो गये हैं। 1967 में जब पहली बार कांग्रेस का विभाजन हुआ तब इंदिरा गांधी ने संगठन चुनाव में पहले अपनी ताकत दिखाई थी। उसके बाद से पार्टी में संगठन की जगह व्यक्ति यानी इंदिरा गांधी ही सब कुछ हो गई थीं। यहाँ तक कि सहयोगी संगठनों में भी लोकतांत्रिक प्रक्रिया समाप्त कर दी गई थी और सबकुछ आलाकमान यानी कि इंदिरा गाँधी की इच्छा हो गई थी। इसीलिए वह संगठन से लेकर केंद्र व राज्य सरकारों तक को ताश के पत्तों की तरह फेंटती रहीं। वह एक ऐसा खेल था जिसमें सामने कोई खिलाड़ी होता ही नहीं था। यहीं से कांग्रेस एक निजी कम्पनी में बदलती चली गई और आज भी उसी रूप में है।
इंदिरा गाँधी के समय में भी कांग्रेस में ऐसे नेता थे जो उनके लिए चुनौती थे। यही कारण है कि उन्होंने हमेशा पार्टी के मजबूत नेताओं को कभी उभरने का मौका नहीं दिया और यदि कोई अपनी कोशिशों से पार्टी और पार्टी के बाहर अपना आधार बनाने में सफल हो भी गया तो उसे उन्होंने आगे बढ़ने का मौका ही नहीं दिया। राजीव गाँधी के समय में भी ऐसे नेता थे जो उन्हें चुनौती दे सकते थे। अर्जुन सिंह, सीताराम केसरी, नारायण दत्त तिवारी, विश्वनाथ प्रताप सिंह, प्रणव मुखर्जी, नरसिंम्हा राव, शरद पवार जैसे नेता उस समय थे। यह अलग बात थी कि उनमें से किसी में इतना साहस नहीं था कि खुलकर सामने आ सके। फिर भी पार्टी में उनकी उपस्थिति को महसूस किया जाता था। इसका प्रमाण है विश्वनाथ प्रताप सिंह जो पार्टी में जब राजीव गांधी के लिए चुनौती बन गये तो उन्हें निकालने की तैयारी की गयी। वीपी सिंह कांग्रेस से अलग हुए और उन्होंने राजीव गाँधी को सत्ता से बाहर का रास्ता दिखा दिया। 1984 में इंदिरा गाँधी की हत्या के बाद हुए चुनाव में कांग्रेस को जो सफलता मिली थी वह उसे आगे के किसी चुनाव में नहीं मिल सकी। 1989 से लेकर 2014 से पहले तक कांग्रेस हो या भाजपा या जनता दल किसी को भी पूर्ण बहुमत तो क्या उसके आसपास तक सीटें नहीं मिल पायीं। 1991 में राजीव गाँधी की हत्या के समय तक देश में आधे हिस्से में चुनाव हो चुके थे। शेष हिस्सों में उसे सहानुभूति लहर का लाभ मिला पर पूर्ण बहुमत नहीं मिला। यदि देखा जाए तो उसके बाद से कांग्रेस एक पार्टी के रूप में लगातार क्षरण की ओर बढ़ती दिखाई देती है। नेहरूजी के पास यदि भारत के आधुनिक तीर्थ स्थल बांध और पंचवर्षीय योजनाएँ थीं तो साथ ही पंचशील और विश्व बंधुत्व की अवधारणा भी। इंदिरा गाँधी ने इन्हीं अवधारणों को आगे बढ़ाते हुए गरीबी हटाओ का विचार दिया। इसके लिए बीमा कंपनियों और बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया गया। एकीकृत ग्रामीण विकाय योजनाएँ शुरू की गयीं। राजीव गाँधी ने नये भारत के निर्माण के स्वप्न के साथ यात्रा शुरू की। उनके भारत में कंप्यूटर और तकनीक की महत्वपूर्ण भूमिका थी। परंतु उनके बाद से कांग्रेस के पास एक भी ऐसा नेता नहीं हुआ जिसके पास देश के लिए कोई विजन हो, भले ही वह देश को स्वीकार हो या न हो।
राजीव गाँधी के बाद के भारत में कांग्रेस या तो विश्वबैंक और अंरराराष्ट्रीय मुद्राकोष की नीतियों का पालन करती रही है या बहुराष्ट्रीय निगमों का अनुपालन। इंदिरा गाँधी ने कांग्रेस के आंतरिक लोकतंत्र का अपहरण कर लिया था या उसकी हत्या कर दी थी फिर भी उनके पास कम से कम भारत के लिए एक अपनी दृष्टि थी जो उनकी आज की पीढ़ी के पास देखने को नहीं मिलती।
वर्तमान नेतृत्व को देखें तो काफी समय तक सोनिया गांधी को अध्यक्ष के साथ ही प्रधानमंत्री बनाने की कोशिशें भी हुईं पर वे परवान न चढ़ सकीं। नरसिंह राव और उनके बाद मनमोहन सिंह की सरकारों के अपना कार्यकाल पूरा करने के बाद भी कांग्रेस लोकमानस में अपना खोया आभा मंडल वापस स्थापित करने में विफल रही। इसका कारण यही था कि उसके पास उदारीकरण के अलावा ऐसा कुछ नहीं था जिसे वह देश और समाज को सौंप सके। और यह उदारीकरण भी उसका अपना नहीं था, यह तो एक वैश्विक स्थिति थी जिससे भारत का बच पाना संभव नहीं था। इतना ही नहीं इस उदारीकरण की प्रक्रिया में देश की नकेल भारत के हाथों से निकल कर अमेरिका और उसकी संस्थाओं के हाथों में चली गयी, यह बात किसी से छुपी हुई नहीं थी। कांग्रेस सरकार बनाने और चलाने में तो कामयाब रही पर जनता के मन पर ऐसी कोई छाप छोड़ने में विफल रही जिस मिटा पाना उसके विरोधियों के लिए मुश्किल होता।
कांग्रेस का संकट यहीं पर आकर नहीं रूका, वह निरंतर बढ़ता ही गया है। सत्रहवीं लोकसभा के चुनाव में कांग्रेस अपनी तरफ से ऐसा कोई कार्यक्रम जनता के सामन नहीं रख पायी जिसे उसकी मौलिक सोच कहा जा सके। उसकी न्याय योजना की अवधारणा के न्याय की बात भाजपा पहले ही कर चुकी थी। गरीबों के खातों में सीधे पैसे भेजने की योजना भाजपा की पिछली सरकार के समय ही हो गयी थी। कांग्रेस के पास घोषणाएँ तो थीं परंतु उन्हें कैसे पूरा किया जाएगा इसे लेकर कोई कार्ययोजना नहीं थी। यही कारण है कि जनता ने उसकी बातों को बहुत गंभीरता से नहीं लिया। इस चुनाव में कांग्रेस एक तरह से विचार-शून्यता की स्थिति में नज़र आयी। आप केवल सत्ता पक्ष की आलोचना करके चुनाव नहीं जीत सकते। यदि ऐसा होता तो जीत के दावेदार दूसरे दल भी थे। ऐसे में यदि यह बात उठ रही है कि जनता ने भाजपा को उतना नहीं चुना जितना कांग्रेस को चुनने से इनकार कर दिया। इस इनकार का एक बड़ा कारण यही था कि कांग्रेस जो कभी एक पार्टी हुआ करती थी, एक विचार हुआ करती थी आज केवल एक समूह है। और समूह भी ऐसा कि उसमें कोई संगठन, कोई संगति नहीं है। 

Saturday, June 1, 2019

आंतरिक लोकतंत्र की विदाई - वंशवाद और लोकतंत्र का भ्रम-2



वेद प्रकाश भारद्वाज

कांग्रेस में आंतरिक लोकतंत्र की विदाई तो आज़ादी से पहले ही हो गयी थी जब गांधीजी के दबाव में सुभाष चंद्र बोस को चुने जाने के बाद भी पद छोड़ना पड़ा और सरदार पटेल को पार्टी सदस्यों की इच्छा के विपरीत भी खुद को पार्टी अध्यक्ष पद से अलग करना पड़ा। देश में लोकतांत्रिक शासन प्रणाली तो अपना ली गयी परंतु इस प्रणाली को स्थापित करने और आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी जिन राजनीतिक दलों पर थी उनमें से ज्यादातर आंतरिक लोकतंत्र को कायम नहीं रख सके। समाजवादी दल कभी एक संगठन के रूप में व्यवस्थित नहीं रह सके। वह लगातार टूटते और जुड़ते रहे। और इसीलिए एक संगठन के रूप में वह जनता को बहुत प्रभावित नहीं कर सके। जनसंघ की बागड़ोर आरएसएस के हाथ में रही। कम्युनिस्ट पार्टी पर सोवियत संघ का नियंत्रण रहा। इस तरह शुरूआती दौर से ही राजनीतिक दलों में आंतरिक लोकतंत्र केवल दिखाने के लिए रहा। यही कारण था कि जनता में भी वह किसी तरह की लोकतांत्रिक चेतना जगाने में विफल रहे। लाल बहादुर शास्त्री की मृत्यु के बाद वरिष्ठ नेताओं को दरकिनार कर इंदिरा गांधी का प्रधानमंत्री बनना और बाद में पार्टी को विभाजित कर उसकी अघोषित मालकिन बन जाना यही प्रमाणित करता है कि हमारे नेताओं में भी किसी तरह की लोकतांत्रिक चेतना नहीं थी, कम से कम कांग्रेस में तो नहीं ही थी। आज कांग्रेस में जिस तरह से वरिष्ठ और अनुभवी नेताओं को किनारे कर जिस तरह राहुल और प्रियंका को आगे लाया गया है उसे किसी भी तरह से लोकतांत्रिक नहीं कहा जा सकता।

आंतरिक लोकतंत्र के इस अभाव का विस्तार आगे चलकर उन सभी दलों में हुआ जो या तो कांग्रेस की कोख से निकले या कांग्रेस के विरोध में जिन्होंने जन्म लिया। 1975 का राजनीतिक परिदृश्य भारतीय राजनीति में एक बड़े परिवर्तन का प्रमाण था। विपक्ष से डर कर इंदिरा गांधी का आपातकाल लगाना और फिर 1977 के चुनाव में हार जाना बड़ी घटना हो सकती थी जो भारतीय राजनीति की दिशा बदलने का कारण बनती। दुर्भाग्य से यह सब केवल घटना बनकर रह गये। जनता पार्टी के झगड़ों के बाद उसका टूटना लोकतंत्र की हार थी। यह हार हमने आगे चलकर जनता दल में कई बार देखी।
इंदिरा गांधी ने खुद को इतना शक्तिशाली बना लिया था कि कांग्रेस में उनकी मर्जी के बिना पत्ता भी नहीं हिलता था। इंदिरा इज इंडिया जैसी गर्वोक्तियाँ इसी का परिणाम थीं। वह चाहे जब मंत्रियों, मुख्यमंत्रियों और राज्यपालों को बदल देती थीं। यहाँ तक कि राष्ट्रपति चुनाव में भी उन्होंने पार्टी के बहुमत की कभी परवाह नहीं की। यह साफ दिख रहा था कि उन्होंने कांग्रेस को अपनी निजी जागीर बना लिया था। इसीलिए उन्होंने पहले संजय गांधी को और उनकी मृत्यु के बाद राजीव गांधी को पार्टी का भविष्य बना दिया। कांग्रेस के कथित बड़े नेता अंदर से एकदम बौने थे और आत्मविश्वास से खाली भी। इसका प्रमाण राजीव गांधी की मृत्यु के बाद सोनिया गांधी को प्रधानमंत्री बनाने की कोशिशों के रूप में मिलता है। जब इसमें कामयाबी नहीं मिली तो उन्होंने पार्टी और सरकार की कमान अघोषित रूप से सोनिया गांधी को सौंप दी। यह एक तहर की राजशाही ही है कि राजा की पत्नी या उसके बच्चों की तरह कांग्रेस और देश की बागडोर संभालने के लिए नेहरू-गांधी परिवार को ही सबसे उपयुक्त घोषित किया गया। राजीव गांधी की हत्या चुनावों के दौरान हुई थी। उस समय तक यह माना जा रहा था कि कांग्रेस सत्ता में नहीं आ पाएगी परंतु उनकी हत्या के बाद लोगों ने कांग्रेस को विजयी बनाया। यह भारतीय मानस में मौजूद राजशाही संस्कारों का ही प्रमाण था।

परिवर्तन की हवा लेकर आये दल भी अपवाद नहीं बने
भारतीय राजनीति लगातार करवट ले रही थी परंतु यह करवट लेना चेतनावस्था में नहीं बल्कि निंद्रा में था। 1990 के बाद से देश की राजनीति ने कई बार करवट ली। कई नये दल और राजनीतिक आंदोलन सामने आये। जेपी आंदोलन के बाद जिस तरह बिहार में लालु प्रसाद यादव, त्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव उभरे और 1990 के बाद राजनीति के चमकते सितारे बने, जिस तरह कांशीराम ने बसपा के माध्यम से दलित राजनीति का ध्रुवीकरण किया, आंध्र प्रदेश में एनटी रामाराव ने जिस तरह कांग्रेस को हराया वह एक नयी बयार की तरह लग रहा था। एनटी रामाराव ने केंद्रीय राजनीति को भी प्रभावित किया। कांग्रेस का वर्चस्व समाप्त होने लगा तो लगा कि भारतीय समाज में राजशाही और वंशवाद की जड़ें समाप्त हो जाएँगी और वास्तविक अर्थो में लोकतांत्रिक चेतना की स्थापना होगी। लालू प्रसाद यादव ने बिहार में, मुलायम और कांशीराम ने उत्तर प्रदेश में राजनीतिक स्थितियों को बदल दिया। बंगाल व केरल में वामपंथी दलों का वर्चस्व हो गया। इतना सब होने के बाद भी भारतीय मानस से राजशाही और वंशवाद को मिटाया नहीं जा सका।

भारतीय लोकदल चरण सिंह की पारिवारिक पार्टी है। उनके बाद उनके बेटे अजित सिंह और उनके बेटे पार्टी हैं। मुलायम सिंह की सपा उनकी पारिवारिक संस्था बनकर रह गयी है। बसपा मायावती के अलावा कुछ नहीं है और इसीलिए वह अपने भतीजे को अब आगे ला रही हैं ताकि उनकी विरासत को बढ़ाने का काम हो सके। लालू प्रसाद यादव का तो मामला ही अलग है। चारा घोटाले में गिरफ्तार होने के बाद उन्होंने अपनी पत्नी को बिहार की मुख्यमंत्री बना दिया और आजकल उनका बेटा पार्टी का सर्वेसर्वा है। एनटी रामाराव की मृत्यु के बाद पार्टी की बागडोर उनकी पत्नी पार्वती को सौंपी गयी। तमिलनाडु में रामाचंद्रन की मृत्यु के बाद उनकी पत्नी जानकी रामाचंद्रन को मुख्यमंत्री बना दिया गया। बाद में जयललिता उनकी उत्तराधिकारी बनीं। द्रमुक भी करूणानिधि की निजी संस्था रही। नेशनल कांफ्रेंस अब्दुल्ला परिवार की संपत्ति है। यही स्थिति अन्य दलों की है। इनेलो चौटाला परिवार की तो राकांपा शरद परिवार की। भारतीय राजनीति में आज ऐसे दलों का बहुमत है जो खुद एक लोकतांत्रिक दल की कसौटी पर खरे नहीं उतरते। ऐसे दलों से आप कैसे लोकतांत्रिक परम्परा व चेतना के विस्तार की आशा कर सकते हैं।

भाजपा और लोकतंत्र
भाजपा (पूर्व में जनसंघ) पर यह आरोप लगाया जाता है कि उसमें सारे निर्णय आरएसएस मुख्यालय में लिये जाते हैं परंतु इस तरह का आरोप लगाने वाले और उनपर सहमति जताने वाले यह भूल जाते हैं कि संघ अपने आप में एक लोकतांत्रिक संगठन है जिसका प्रमुख आम सहमति के आधारा पर चुना जाता है, वंश के आधार पर नहीं। इसी प्रकार भाजपा में आज तक किसी को अध्यक्ष वंश के आधार पर नहीं बनाया गया। यहाँ तक कि भाजपा में कोई नेता लगातार दो बार से अधिक अध्यक्ष पद पर नहीं रह सकता। इस तरह की व्यवस्था अन्य किसी दल में नहीं है, वामपंथियों में भी नहीं। भाजपा पर वंशवाद के आरोप लगाने वाले कहते हैं कि वह भी अपने नेताओं के बेटों, बहुओं, भाइयों को चुनाव में टिकट दे रही है। यह सही है परंतु कांग्रेस और अन्य दलों के वंशवाद और भाजपा के वंशवाद में एक मौलिक अंतर यह है कि कांग्रेस हो या सपा या अन्य दल, उनमें पार्टी व सत्ता का नियंत्रण वंश के पास होता है। इसके विपरीत भाजपा में किसी नेता के बेटा या बेटी या बहू को टिकट तो दिया पर ऐसा नहीं हुआ कि उसे पार्टी का स्वाभाविक मालिक और सत्ता का नैसर्गिक उत्तराधिकारी माना गया हो। भाजपा ने शिवराज सिंह और वसुधरा राजे का विरोध होने पर उनके बेटे या अन्य संबंधी को मुख्यमंत्री नहीं बनाया। कांग्रेस होती तो यही किया जाता। कांग्रेस से निकले देवेगौडा के जनता दल सेक्युलर ने क्या किया, कर्नाटक की सत्ता अपने परिवार के पास रखी और पार्टी को अपनी मिलकियत बनाये रखने के लिए अपने पोतों को भी चुनाव में उतार दिया।

लोकतंत्र का भ्रम और उसका जश्न
इतना सब होने के बाद भी हम इस बात का जश्न मनाते हैं कि हमारा देश दुनिया का सबसे बड़ा और सफल लोकतांत्रिक देश है। एक ऐसा लोकतांत्रिक देश जिसमें आज भी ज्यादातर राजनीतिक दल किसी न किसी परिवार की निजी मिलकियत बने हुए हैं। जो एक व्यक्ति या परिवार के अलावा कुछ और सोच भी नहीं पाते। और जिस देश की जनता आज भी अपनी सारी परेशानियां, सारी समस्याओं के निदान की उम्मीद उनसे बांधकर ही मतदान का निर्णय लेती है। इस बार आम चुनाव में जिस तरह मुद्दों और कार्यक्रमों की उपेक्षा की गयी और व्यक्तिगत विरोध को ही राजनीति का सर्वस्व बना दिया गया क्या वह एक स्वस्थ लोकतांत्रिक प्रक्रिया कही जा सकती है

सत्रहवीं लोकसभा चुनावों में भाजपा की जीत एक नयी इबारत लिख रही है।  आज कांग्रेस के साथ जो राजनीतिक दल हैं या भाजपा को सरकार से बाहर करने के लिए जो कांग्रेस का समर्थन कर सकते हैं उनमें ज्यादातर दलों में और कांग्रेस में कोई मूलभूत अंतर नहीं है। ज्यादातर दल खुद को कितना ही लोकतांत्रिक होने का नाटक करें, हकीकत तो यही है कि वह निजी लिमिटेड कंपनी से अधिक कुछ नहीं हैं। लोकतंत्र का यह भ्रम कब तक चलेगा कुछ कहा नहीं जा सकता। कारण कि अभी भी हमारे यहाँ ऐसे राजनीतिक दल और गैर राजनीतिक संगठन नहीं हैं जो जनता को लोकतांत्रिक शिक्षा देने का काम कर सकें। इस दिशा में मीडिया से कुछ आशा की जा सकती थी परंतु वह भी अब इस या उस खेमें में बंटी है। एक निष्पक्ष नहीं बल्कि जनपक्ष मीडिया ही कुछ कर सकता है। इस दिशा में कुछ लोग प्रयास कर रहे हैं परंतु उनकी व्यापक जन तक पहुँच नहीं है। फिर झूठ बोलने वाले इतने अधिक है कि उनके बीच सच बोलने वालों की आवाज सुनाई ही नहीं देती। यह बहुत निराशाजनक दृश्य है पर इसी में हमें आशा के कुछ संकेत तलाशने होंगे। आज राजनीति यदि एक व्यापार बन गयी है तो मीडिया भी मालिकों के लिए लाभ देने वाला काम और पत्रकारों के लिए भी अच्छे वेतन वाला पेशा है। इनके बीच अब भी इंटरनेट पर सोशल मीडिया, ब्लॉग, ऑन लाइन पत्रिकाओं के रूप में कुछ संभावनाएँ बची हैं और उन छोटे मीडिया समूहों से भी जो स्थानीय स्तर पर काम कर रहे हैं। ऐसे मीडिया से यह आशा की जा सकती है कि वह छोटे-छोटे समूहों में ही सही, ऐसे लोगों को खड़ा करने में सहायक हो सकते हैं जो लोकतंत्र को एक जमीनी हकीकत बनाने का काम कर सकते हैं।
इन सबके बीच सबसे अधिक आशा मतदाताओं की उस पीढ़ी से है जो पिछले कुछ सालों में अस्तित्व में आयी है या जो निकट भविष्य में आने वाली है। इसी मतदाता वर्ग ने पिछले लोकसभा चुनाव में भाजपा को पूर्ण बहुमत के साथ सŸा सौंपी थी। इसी वर्ग ने बाद में दिल्ली विधानसभा चुनावों में भाजपा को नकार कर आम आदमी पार्टी को चुना। यही वर्ग है जो एक समय अन्ना हजारे के आंदोलन को आगे बढ़ाने का काम करता नजर आया था। यह वर्ग शिक्षित भी है और व्यावहारिक भी। इस वर्ग के लिए परंपराओं का महत्व है परंतु यह वंशवाद के साथ खड़ा होगा इसकी आशा नहीं की जा सकती। हाँ कुछ समय के लिए इसे जाति या धर्म के नाम पर गोलबंद किया जा सकता है पर उम्मीद की जानी चाहिए कि यह अधिक विवेकशील होकर सही और गलत का निर्णय ले सकेगा। मुझे सबसे अधिक इसी वर्ग से आशा है और यही लोकतंत्र के इस भ्रम को तोड़कर उसे वास्तविकता बनाने का काम कर सकता है।



मुनाफे के लिए मौत का कारोबार



वेद प्रकाश भारद्वाज
ज्यादा मुनाफा, अतिरिक्त मुनाफा और जल्दी मुनाफा ऐसी मानवीय प्रवृत्ति है जिसपर अंकुश लगाना किसी भी समाज और शासन के लिए एक चुनौती है। उसपर यदि मुनाफे का यह कारोबार जो वास्तव में मौत का कारोबार होता है, अवैध रूप से किया जा रहा हो तो उसे रोकना और भी मुश्किल हो जाता है क्योंकि इस तरह के मौत के कारोबार को स्थानीय स्तर पर पुलिस प्रशासन और राजनीति का संरक्षण न हो यह माना नहीं जा सकता। एक बात यह भी है कि सरकार हर साल अधिक राजस्व के लिए शराब के नये ठेके खोलती है। यह जानते हुए भी कि शराब स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है सरकार केवल राजस्व के लालच में उसकी बिक्री बढ़ाने का प्रयास करती है। इसके लिए बार एवं रेस्टारेंट को देर रात तक खोलने की अनुमति दी जाती है। सरकार की तरफ से इस तरह का कोई प्रयास नहीं किया जाता जिससे लोग शराब न पीने का संकल्प लें। गुजरात में सालों से शराबबंदी है और बिहार में भी नितीश सरकार ने उसे लागू कर रखा है। क्या यह प्रदेश शराब की बिक्री से मिलने वाले राजस्व के अभाव में कंगाल हो गयी हैं और लोकहितकारी कामों को अंजाम नहीं दे पा रही हैं? यदि ऐसा नहीं है तो अन्य प्रदेशों की सरकारें इसे बंद करने में क्यों हिचक रही हैं। सरकार की इसी हिचक का फायदा उठाते हैं अपराधी जो मुनाफे के लिए मौत का कारोबार करते हैं। उत्तर प्रदेश के बाराबंकी में इन्हीं कारोबारियों की करनी की भेंट चढ़ गये 14 जीवन। उस पर आश्चर्य यह कि जो लोग मारे गये और जो 50 लोग जिंदगी के लिए जूझ रहे हैं उन्होंने शराब अवैध कारोबारियों से नहीं बल्कि सरकारी दुकान से खरीदी थी।
प्रदेश में लगातार हो रही इस तरह की घटनाएं इस बात का प्रमाण हैं कि शासन-प्रशासन मौत के सौदागरों पर अंकुश लगाने में बुरी तरह विफल रहा है। इस तरह की घटनाएं इस बात का प्रमाण हैं कि भारतीय शासन-प्रशासन प्रणाली में ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है जो इस तरह की घटनाओं को होने से रोक सके। ऐसा नहीं है कि सरकार ऐसी घटनाओं को होने देना चाहती है परंतु यह बात कोई महत्व नहीं रखती जब हम पाते हैं कि सरकार ऐसी घटनाओं को रोक पाने में पूरी तरह नाकामयाब रही है। फिर मसला सिर्फ इस सरकार का ही नहीं है। इस तरह की घटनाएं सभी सरकारों में होती रही है और कई प्रदेशों में भी। इसका अर्थ है कि सरकार किसी की भी हो, उसमें जहरीली शराब के कारोबार को रोकने की इच्छा शक्ति का अभाव होता है। प्रत्येक सरकार कानून-व्यवस्था को ठीक रखने का दावा करती है परंतु इस तरह की घटनाएं उन दावों को खोखला साबित कर देती हैं। 
इसी साल फरवरी में सहारनपुर व आसपास के क्षेत्र में जहरीली शराब पीने से 58 लोगों की और उत्तराखंड के हरिद्वार में 17 लोगों की मौत हो गयी थी। इस मामले में दोनों राज्य सरकारों ने जांच के आदेश दिये पर क्या इससे उन जीवनों की भरपाई हो सकती है जो शासन की लापरवाही के कारण समाप्त हो गये? उससे पहले पिछले साल मार्च में नोएडा क्षेत्र के खोड़ा में में भी अवैध जहरीली शराब पीने से चार लोगों की मृत्यु हो गयी थी। इन दोनों प्रकरणों में यह पाया गया था कि लोगों ने अवैध रूप से बिक रही शराब पी थी जो जहरीली थी। सिद्धांतवादियों के लिए यह कहना आसान हो सकता है कि लोग अवैध शराब खरीदते ही क्यों है? परंतु इससे शासन-प्रशासन की जिम्मेदारी कम नहीं हो जाती है। कारण कि यदि किसी क्षेत्र में अवैध रूप से शराब बेची जा रही है तो उसे रोकना पुलिस प्रशासन का काम है। जिन जगहों पर शराब का अवैध कारोबार हो रहा होता है वहां की पुलिस उससे अनजान हो इस पर यकीन करना मुश्किल है। और यदि मान लिया जाए कि पुलिस को इस बात की खबर नहीं होती तो इसका अर्थ यह है कि हमारी पुलिस नाकारा है जो अपनी नाक के नीचे हो रहे अपराध को देख तक नहीं पाती। इसलिए जब यह आरोप लगाया जाता है कि शराब का अवैध कारोबार पुलिस के संरक्षण में ही चलता है तो उसे नकारना आसान नहीं होता।
एक चौंकाने वाली बात यह है कि उत्तर प्रदेश के हरियाणा-दिल्ली से लगते इलाकों में शराब का अवैध कारोबार खूब फल-फूल रहा है। गौतमबुद्ध नगर जिले में जिसमें नोएडा भी आता है, एक संस्था क्राइम फ्री इंडिया फोर्स ने कई साल के अध्ययन के बाद पाया कि जिसे के ग्रामीण क्षेत्रों में करीब दो हजार लोग हर साल अवैध शराब के कारण मर जाते हैं। इस जिले के अलावा अन्य जिलों में भी सीमावर्ती क्षेत्रों में एक राज्य से दूसरे में शराब लाकर बेचना आम है। ज्यादातर हरियाणा से शराब उत्तर प्रदेश लायी जाती है क्योंकि वहां शराब सस्ती है। इसकी आड़ में वहां से कच्ची शराब की भी आपूर्ति हो जाती है जो जानलेवा हो सकती है। इसके बावजूद लोग सस्ती होने के कारण उसका उपयोग करते हैं।
इसमें कोई संदेह नहीं कि इसके लिए लोग खुद भी जिम्मेदार हैं परंतु इतने भर से सरकार और पुलिस प्रशासन अपनी जिम्मेदारी से मुक्त नहीं हो सकते। सरकार हर बार इस तरह के हादसे होने के बाद त्वरित कार्रवाई के नाम पर कुछ पुलिसवालों को निलंबित कर देती है। मृतकों के परिजनों को मुआवजा दे देती है और कुछ दिन बाद मामला भुला दिया जाता है। सरकार हर बार कहती है कि वह शराब के अवैध कारोबार के खिलाफ कड़े कदम उठाएगी। वह उठाती भी है परंतु वह हर बार खोखले साबित होते हैं। इस तरह के अपराधों के लिए जब तक पुलिस प्रशासन की पूर्ण जवाबदेही तय नहीं की जाएगी इसे रोकना असंभव है। कारण कि यह कोई अचानक होने वाला अपराध नहीं है। अवैध शराब का कारोबार बहुत ही संगठित और बड़े पैमाने पर किया जाने वाला कारोबार है जो बिना स्थानीय पुलिस प्रशासन के संरक्षण के संभव नहीं है।