केदार नाथ सिंह और गौरेया
आज अंतरराष्ट्रीय गौरेया दिवस है और मुझे केदार नाथ सिंह की एक कविता याद आ रही है। यह अजीब संयोग है कि एक दिन पहले ही वे इस भौतिक संसार को अलविदा कह गये और अपने पीछे छोड़ गये कविता का ऐसा संसार जिसमें जीवन की बहुत ही साधारण चीजें और जीव एक नई अर्थवत्ता के साथ हमारे सामने आते हैं चाहे वह दीवार के सहारे खड़ा हल और पहिया हो या फिर सभा की समात्ति के बाद पीछे छूट गये जूते हों। इसी तरह की उनकी एक कविता है ‘बढ़ई और चिड़िया’। एक बढ़ई का लकड़ी चीरना उसके जीवन का साधारण कर्म है परन्तु इसी साधारण कर्म के चित्रण से केदारनाथ सिंह कई प्रतीकांे व बिम्बों के सहारे एक ऐसा संघर्ष चित्रित करते हैं जिसमें भविष्य को लेकर कई आशंकाएं जन्म लेती हैं। ऐसी ही एक आशंका चिड़ियाओं के जीवन का संकट है। इस कविता में उन्होंने लकड़ी के चीरे जाने के दौरान पर्यावरण और जैविक संकट की तरफ इशारा किया है। जैसे कविता में वह कहते हैं-
उसकी आरी कई बार लकड़ी की नींद
और जड़ों में भटक जाती थी
कई बार एक चिड़िया के खोंते से
टकरा जाती थी उसकी आरी
उसे लकड़ी में
गिलहरी के पूँछ की हरकत महसूस हो रही थी
एक गुर्राहट थी
एक बाघिन के बच्चे सो रहे थे लकड़ी के अंदर
एक चिड़िया का दाना गायब हो गया था
और कविता का अंत कुछ इस तरह से है-
वह चीर रहा था
और चिड़िया खुद लकड़ी के अंदर
कहीं थी
और चीख रही थी।
उन्होंने अपनी इस कविता में कहीं भी गौरेया का वर्णन नहीं किया है परन्तु आज हम देख सकते हैं कि यह कविता हमारे जीवन से गुम हो चुकी गौरेया को और उसके संकट को कितनी संवेदनशीलता के साथ सामने लाती है। यह केदारनाथ सिंह के रचना जगत की अनन्यतम विशेषता कही जाएगी कि वे अक्सर साधारण चीजों और वर्णनों से एक बड़ा विमर्श सामने लाते थे। उनके यहां सजीव ही नहीं, निर्जीव मानी जाने वाली वस्तुएं भी जैसे एक नया जीवन पा जाती थीं।
यह बहुत पहले तय हो गया था कि आने वाली पीढ़ी के लिए वह गौरेया केवल लिखित में और चित्रों में ही बची रहेगी। आज के ज्यादातर बच्चों ने गौरेया को देखा तक नहीं है, उस गौरेया को जो कभी हर घर-आंगन में होती थी। उसके फुदकने में लोग अपनी बेटियों का जीवन देखते थे। अक्सर बच्चियों को डांटते समय कहा भी जाता था कि क्या चिड़िया की तरह फुदकती रहती है। इस डांट में भी एक मिठास रहती थी जैसी मिठास गौरेया के चहचहाने में होती थी।

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