Wednesday, April 18, 2018

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समाचार पत्रों की भाषा
डॉ. वेद प्रकाश भारद्वाज
समाचार पत्र अभिव्यक्ति का वह क्षेत्र है जिसने मानवीय मेधा को चतुर्दिक फैलाया है, उसे बहुआयामी विस्तार दिया है। सूचना देना और पाठकों को चेतन करने के साथ ही उसकी एक बड़ी भूमिका भाषा के विकास में रही है। जिसे आज हम हिन्दी के रूप में जानते हैं, उसका विकास एक लम्बी यात्रा के बाद हुआ है और इस यात्रा में समाचार पत्रों की भूमिका अप्रतिम रही है। यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी कि हिन्दी के जन्म से लेकर उसके वर्तमान स्वरूप तक में समाचार पत्रों की मुख्य भूमिका रही है, भाषा को बनाने में, और बिगाड़ने में भी। मेरे जैसे हजारों पत्रकार-लेखकों ने समाचार पत्रों और पत्रिकाओं के माध्यम से ही भाषा का संस्कार ग्रहण  किया और अपनी तरह से उसमें योगदान देने का काम किया।
एक भाषा के रूप में हिन्दी की यह विशेषता रही है कि उसने हमेशा दूसरी भाषाओं, देशी और विदेशी दोनों ही, के शब्दों को आवश्यकता के आधार पर अपना बनाने में कभी संकोच नहीं किया। वैसे भी हिन्दी का जन्म खड़ी बोली और उर्दू के मिश्रण हुआ कहा जाए तो कुछ गलत नहीं होगा। हिन्दी और उससे पहले की अन्य भाषाओं में एक समानता रही कि वे सब लोक व्यवहार की भाषाएं रही हैं। संस्कृत जब शास्त्रों तक सीमित रह गयी तब लोक भाषाओं ने ही जन सामान्य को संवाद का आधार दिया। क्षेत्रीय भाषाओं और बोलियों की विविधता के बीच एक सर्वमान्य भाषा की आवश्यकता के तहत हिन्दी का जन्म और विकास हुआ यह स्वीकार करने में किसी को आपत्ति नहीं होनी चाहिए। हिन्दी साहित्य के इतिहास को देखें तो आधुनिक काल से पूर्व का समस्त साहित्य अवधि, ब्रज और अन्य क्षेत्रीय भाषाओं में रचा गया। भारतेंदू हरिश्चंद्र के समय से वर्तमान हिन्दी का रूप आकार लेने लगा था जिसे बाद में अन्य साहित्यकारों और पत्रकारों ने विकसित कर जन साधारण की भाषा के रूप में स्थापित करने का काम किया।
आज हम वैश्वीकरण के दौर में जी रहे हैं। क्षेत्रीय अस्मिताएं वैश्वीक स्तर पर अपनी अलग पहचान बनाते हुए विश्व समुदाय का महत्वपूर्ण हिस्सा बन रही हैं जिनमें से भाषा भी एक आधार है। ऐसे समय में यह देखना आवश्यक हो जाता है कि हम हिन्दी को लेकर कहां खड़े हैं। सूचना तकनीक के महा-विस्फोट से संचार माध्यमों में जो क्रांति आयी है उसने जैसे दुनिया की सारी सरहदों को बेमानी कर दिया। भारत में निजी संचार माध्यमों टीवी व इंटरनेट के विस्तार के साथ एक बार चारों तरफ अंग्रेजी भाषी संचार सेवाओं का वर्चस्व होने लगा था। परन्तु जल्दी ही अंग्रेजीदा संचार सेवा प्रदाताओं को समझ में आ गया कि भारत में यदि अपनी पैठ बनानी है तो हिन्दी और अन्य क्षेत्रीय भाषाओं को ही अपना आधार बनाना होगा। इस बीच महानगरों से प्रकाशित हिन्दी के अखबारों ने भी स्वयं को विस्तार देते हुए अपने क्षेत्रीय संस्करणों के माध्यम से विकास किया। विदेशी कम्पनियों ने शुरू में अंग्रेजी मीडिया को ही महत्व दिया और विज्ञापन की भाषा भी अंग्रेजी ही रखी पर उन्हें भी जल्दी ही समझ में आ गया कि हिन्दी और क्षेत्रीय भारतीय भाषाओं को अपना कर ही वे अपने बाजार का विस्तार कर सकते हैं। यहां तक कि हालिवुड के फिल्म निर्माताओं ने भी भारत में अपने विस्तार के लिए हिन्दी और अन्य भारतीय भाषाओं को आधार बनाया है। कई विदेशी टीवी चैनल पूरी तरह हिन्दी व क्षेत्रीय भाषाओं में बदल गये हैं। ऐसे में यह देखना रोचक होगा कि हम खुद हिन्दी वाले आज कहां और किस स्थिति में हैं।
भाषाओं के बीच कभी टकराव नहीं होता, जो टकराव होता है वह राजनीतिक होता है। हिन्दी तो वैसे भी शुरू से ही दूसरी भाषाओं के ऐसे शब्दों को अपनाने में उदार रही है जो जन सामान्य की बोलचाल का हिस्सा बन गये हैं या जिनकी आवश्यकता है और उनके हिन्दी विकल्प नहीं हैं। कार के लिए चाहें तो चैपहिया वाहन का प्रयोग कर सकते हैं परन्तु कार शब्द का प्रयोग सभी के लिए आसान होता है और अशिक्षित व्यक्ति भी उसे समझता है। इसी प्रकार इंटरनेट के लिए अंतरजाल शब्द का प्रयोग करने पर वास्तविक अर्थ समझने में मुश्किल होगी। दरअसल ऐसे विदेशी शब्द जो आम लोगों की समझ का हिस्सा बन चुके हैं उनका प्रयोग करना गलत नहीं है। इसी तर्क पर हिन्दी समाचार पत्रों और अन्य संचार सेवाओं में अंग्रेजी शब्दों के प्रयोग की छूट ली गयी। परन्तु इस छूट का एक बड़ा नुकसान हिन्दी को विकृत करने और उसे माध्यम से लोक व्यवहार को विकृत करने के रूप में सामने आया है। यही नहीं हिन्दी के प्रयोग में भाषागत शुद्धता को दरकिनार कर मनमानी की जा रही है।
इस दृष्टि से कुछ समाचार पत्रों का अध्ययन करने पर मैंने पाया कि उनमें भाषा के लेकर अजीब-सी अराजकता है। यह सही है कि समय के साथ भाषा और उसका व्यवहार बदलता है। जैसे एक लम्बे समय से हिन्दी के समाचार पत्रों में उर्दू के शब्दों के साथ नुक्ता लगाने का चलन खत्म हो गया है। इसी प्रकार आधे म तथा न की जगह अनुस्वार का प्रयोग किया जा रहा है। इसकी शुरूआत उस समय हुई थी जब कम्प्यूटर नहीं था। सीसे के टाइप से अखबार तैयार होता था। आधे म तथा न का प्रयोग न करने पर एक तो स्थान बचता था दूसरे टाइप की लागत भी कम हो जाती थी। बाद में अनुस्वार की स्वीकृति इतनी हो गयी कि उसने साहित्य से भी आधे म तथा न को बेदखल कर दिया। इसी प्रकार अर्द्धचंद्र बिन्दू की जगह केवल अनुस्वार से काम चलाया जाने लगा है। परन्तु ऐसा करने से भाषा अशुद्ध नहीं हुई।
एक समय था जब अखबारों में भाषा की शुद्धता पर बहुत अधिक बल दिया जाता था। एक-एक मात्रा का ध्यान रखा जाता था, लिंग व वचन भेद पर पूरा जोर रहता था। पर जब हाल ही में मैंने कुछ अखबारों का भाषा की दृष्टि से विश्लेषण किया तो स्थिति को चिंताजनक पाया। ऐसे अखबारों तक में भाषा को लेकर लापरवाही और कहीं-कहीं तो अराजकता देखने को मिली जो किसी समय हिन्दी भाषा के लिए मानक रहे हैं।
हिंदी समाचार पत्रों में दिल्ली से प्रकाशित हिन्दुस्तान अपनी भाषागत शुद्धता व प्रयोग के मामले में अग्रणी कहा जा सकता है। हालांकि उसमें बहुत बार शब्दों में या वाक्य रचना में गलती मिलती है, जैसे 22 अक्टूबर के अंक में पृष्ठ 6 पर कोरियाई कम्पनी में 50 लाख की डकैतीसमाचार के इंट्रो में लिखा है बदमाश अपने साथ लाए कार में......1, कार स्त्रीलिंग है जिसका ध्यान नहीं रखा गया है। इसके बाद भी कि भाषागत अशुद्धियां बढ़ती जा रही हैं, हिन्दुस्तान की भाषा को शैली के स्तर पर आदर्श कहा जा सकता है। इस सन्दर्भ में पृष्ठ 5 पर प्रकाशित एक समाचार उल्लेखनीय कहा जा सकता है। शीर्षक है छठ को लेकर आप-भाजपा में सियासी घमासान। खबर की शुरुआत देखिए- दीपावली के तुरन्त बाद ही छठ घाटों पर सियासी घमासान शुरू हो गया है। इन घाटों की तैयारियों को लेकर आप व भाजपा नेताओं में टकराव सामने आया है। दोनों पार्टियों के नेताओं ने एक-दूसरे पर दोषारोपण किया है। इस तरह के छोटे-छोटे वाक्य हिन्दुस्तान की खूबी कहे जा सकते हैं। हालांकि इसी अंक में पृष्ठ 6 पर क्रिकेटर युवराज सम्बन्धी खबर का पूरा इंट्रो एक ही वाक्य में लिखा गया है।2 हालांकि ऐसा ज्यादातर समाचारों में देखने को नहीं मिलता। दरअसल जब किसी भी समाचार में छोटे-छोटे वाक्यों का प्रयोग किया जाता है तो बात अधिक स्पष्ट होकर सामने आती है और पाठक किसी उलझन में नहीं रहते।
मीडिया में हिंदी के प्रयोग को लेकर होने वाली लापरवाही का एक उदाहरण देखिए- 22 अक्टूबर 2017 के हिन्दुस्तान के दिल्ली संस्करण में पृष्ठ 16 पर टीम इंडिया कीवियों पर दबदबा बनाने उतरेगी3 शीर्षक से जो खबर प्रकाशित हुई है उसका एक वाक्य देखिए- विराट कोहली की कमान में टीम इंडिया आस्ट्रेलिया की तरह न्यूजीलैंड के खिलाफ भी दबदबा बनाने की कोशिश करेगी।इस वाक्य में टीम इंडिया जैसे शब्दों का प्रयोग कितना जरूरी था इस बात को नजरअंदाज कर सकते हैं। पर एक शब्द मेरी समझ में नहीं आया कमान। जहाँ तक मेरी समझ है कमान का अर्थ नेतृत्व तो नहीं ही होता। कमान का अर्थ धनुष है या तीर रखने का पात्र है, अंग्रेजी में इसके लिए शब्द है कमांड यानी नियंत्रण पर हिंदी में इसका बहु-प्रचलित अर्थ तीर-कमान के सन्दर्भ में ही है। अब भारतीय टीम कोहली के नेतृत्व में खेलती है या कोहली का हथियार है समझना मुश्किल है। दरअसल यहाँ गलती कम और संपादन की भूल या अज्ञानता अधिक दिखाई देती है। लोग बस इसे पढ़ कर अर्थ निकाल लेते हैं जैसे किसी बच्चे की तुतलाती जबान से निकले आधे-अधूरे अस्पष्ट शब्दों का हम अर्थ ग्रहण कर लेते हैं। परन्तु यह कहने से भाषा के प्रति अपराध कम नहीं हो जाता। इस तरह के प्रयोगों से शब्दों के अर्थ बदल जाते हैं, साथ ही अन्य लोगों को शब्दों के मनमाने प्रयोग की छूट मिल जाती है। अब देखें इसके सही शब्द कौन से हो सकते हैं। सबसे उपयुक्त वाक्य है विराट कोहली के नेतृत्व में भारतीय टीम.....। या कप्तान कोहली की अगुवाई में भारत आज न्यूजीलैंड को.....। यह जो कप्तान शब्द है वास्तव में अंग्रेजी के कैप्टन का हिंदी रूप है। ऊपर हमने कमांड शब्द का जिक्र किया था। यह शब्द भी नेतृत्व के लिए ही प्रयोग किया जाता है परन्तु केवल सेना के लिए। इस तरह से यह अर्थभेद वाला शब्द है।
इसी दिन के राष्ट्रीय सहारा में प्रथम पृष्ठ पर मुख्य खबर में फ्लैग है सीबीआई ने बोफोर्स की दोबारा जांच की केंद्र से मांगी अनुमति’, और शीर्षक है -शुरू हुई जांच तो बढ़ेगी सियासी आंच।4 शीर्षक काव्यात्मक है परन्तु खबर कुछ और ही है। दरअसल सीबीआई ने इस मामले में सरकार से न्यायालय में याचिका दाखिल करने की अनुमति मांगी है जांच की नहीं। इसी अखबार में उसी दिन मुख्य पृष्ठ पर एंकर है युवा त्रिमूर्तिने जगाई गुजरात में  कांग्रेस की उम्मीदें। इसमें त्रिमूर्ति शब्द का प्रयोग विशेष है। हालांकि त्रिमूर्ति का भारतीय संस्कृति में एक विशेष अर्थ है - ब्रह्मा, विष्णु व महेश जिन्हें त्रिदेव भी कहा जाता है। इसी पृष्ठ पर एक अन्य खबर में अंग्रेजी शब्दों का प्रयोग किया गया है- करोलबाग में दो ज्वेलरी शॉप से करोड़ों की चोरी।5
वैसे सामान्यतः राष्ट्रीय सहारा की भाषा सहज होती है और छोटे-छोटे वाक्यों का प्रयोग किया जाता है परन्तु कई बार बहुत ही उलझाने वाले लम्बे वाक्यों का प्रयोग समाचार की पठनीयता को बाधित करता है। उदाहरण के लिए मुख्य पृष्ठ पर प्रकाशित बोफोर्स सम्बन्धी खबर के दूसरे पैराग्राफ को देखें तो वह एक वाक्य में है- सूत्रों के अनुसार, जांच एजेंसी ने कार्मिक एवं प्रशासनिक विभाग को भेजे पत्र में कहा है कि उसे इस मामले की जांच फिर से शुरू करने के लिए दिल्ली उच्च न्यायालय के आदेश को चुनोती देने के लिए उच्चतम न्यायालय में विशेष अनुमति याचिका दाखिल करने की इजाजत दी जाए।करीब 50 शब्दों के इस वाक्य को आदर्श नहीं कहा जा सकता। इसके साथ ही पूरी खबर पढ़ने के बाद पता चलता है कि शीर्षक सही नहीं है। सीबीआई ने केंद्र से इस मामले में कोर्ट में याचिका दायर करने की अनुमति मांगी है जाँच की नहीं।6
इसके बाद भी भाषा की शुद्धता व सरलता की दृष्टि से राष्ट्रीय सहारा की प्रशंसा करनी होगी। इस अखबार में अंग्रेजी के शब्दों या पीएम, एलजी जैसे शब्दों का कम ही प्रयोग किया जाता है। और यदि किया भी जाता है तो उसके लिए सम्पादकीय विभाग को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। जैसे इसी दिन के अखबार में पृष्ठ 10 पर सुधीश पचैरी का लेख आओ, विभाजन-विभाजन खेलेंकी खिचड़ी भाषा को देख सकते हैं। इसमें लेखक ने अंग्रेजी शब्दों का प्रयोग करने में बड़ी उदारता का परिचय दिया है जबकि उनके लिए हिंदी शब्दों की उपलब्धता को लेकर किसी तरह का संकट नहीं है।7 इसी प्रकार सहारा के उमंगपरिशिष्ट में विभिन्न लेखों में अनावश्यक रूप से अंग्रेजी शब्दों का प्रयोग खटकता है। इससे लेखों में जो भाषिक सौंदर्य होना चाहिए, वह लुप्त हो जाता है। फीचर लेखन जिसे हिंदी में ललित लेखन या रम्य रचना कहा जा सकता है उसमें भाषा की खिचड़ी उचित नहीं कही जा सकती। हालांकि इसके लिए सम्पादकीय विभाग को दोषी नहीं ठहराया जा सकता पर इससे भी इनकार नहीं किया जा सकता कि सम्पादकों को ऐसे लेखन व लेखकों को स्थान देने से बचना चाहिए, भले ही वे अपने क्षेत्र में प्रसिद्ध या विशेषज्ञ क्यों न हों।8
अब आइये देखते हैं देश के एक और प्रमुख अखबार नवभारत टाइम्स को। एक समय था जब नवभारत अपनी भाषा, वैचारिक निष्पक्षता, अपने परिशिष्ट आदि के कारण आदर्श माना जाता था। राजेन्द्र माथुर, सुरेन्द्र प्रताप सिंह जैसे पत्रकारिता के मानक इसके सम्पादक रहे। इतना ही नहीं, हिंदी साहित्य में निबन्ध लेखन को नई ऊंचाई तक ले जाने वाले विद्या निवास मिश्र भी इसके सम्पादक रहे। ऐसे अखबार के 22 अक्टूबर 2017 के अंक में पृष्ठ 3 की कुछ बानगियाँ देखिए- शीर्षक है- हटाया जा सकता है लाइफ सपोर्ट सिस्टम। खबर कुछ इस तरह शुरू होती है- इच्छा मृत्यु मामले को लीगलाइज्ड किए जाने के बाद सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक बेंच ने फैसला सुरक्षित रख लिया है। सुप्रीम कोर्ट ने 25 फरवरी 2015 को पैसिव यूथनेशिया ( परोक्ष इच्छा मृत्यु) से सम्बन्धित मामले को संवैधानिक बेंच को रेफर कर दिया था। पैसिव यूथनेशिया यानी मरीज की मौत के लिए इलाज बन्द करना या मेडिकल सपोर्ट हटा देना, ताकि दवा न मिलने पर उसकी मौत हो जाए।9 अंग्रेजी के शब्दों के प्रति ऐसा अनुराग दूसरे अखबारों में कम ही देखने को मिलता है। 
नवभारत टाइम्स के इसी अंक में एक अन्य खबर है जिसकी शुरुआत इस तरह से होती है- पत्नी से दोस्त के सम्बंधों के शक के चलते हॉरर मर्डर को अंजाम दिया गया था।10 यह है टीवी का अखबारों की भाषा पर असर। इस तरह से अचानक खबर का शुरू होना चकित करता है परन्तु बहुत प्रभावित नहीं। इस तरह की शुरुआत अपराध कथाओं की पत्रिकाओं में पढ़ने को मिलती थी पर अखबारों की यह शैली नहीं है।
इसी अखबार के कुछ शीर्षक हैं - बर्थ और डेथ सर्टिफिकेट फ्री देगा साउथ एमसीडी, हलवाइयों पर एमसीडी ने लिया यू-टर्न, 35 PCS अफसरों के तबादले। हद तो यह है कि इस अखबार में भाजपा की जगह रोमन लिपि में BJP शब्द के प्रयोग में कोई संकोच नहीं किया जाता (पृष्ठ 4), इंतहा यह है कि एक पृष्ठ का नाम है NBT FUTURE STARS रोमन लिपि में छापा गया है। (पृष्ठ 8)। इसी प्रकार पृष्ठ 10 का नाम स्पेशल स्टोरी है तो 11 का जस्ट लाइफ। इस अखबार में जिस तरह धड़ल्ले से अंग्रेजी के शब्दों के साथ ही रोमन लिपि का प्रयोग किया जाता है NBT] MNS] DNA (पृष्ठ 14)11 इन सब को देखकर लगता नहीं है कि यह वही अखबार है जो कभी हिंदी पत्रकारिता का मानक रहा है। दरअसल दिल्ली से प्रकाशित होने वाले हिंदी अखबारों में नवभारत टाइम्स ने ही अंग्रेजी शब्दों व रोमन लिपि के प्रयोग की शुरुआत की थी।
अब देखें उत्तर भारत के एक अन्य प्रमुख अखबार अमर उजालाको जिसके 19 संस्करण निकलते हैं। हिंदी क्षेत्र में, और विशेषरूप से उत्तर भारत में लोगों में अच्छी हिंदी का संस्कार स्थापित करने वाले अखबारों में अमर उजाला अग्रणी रहा है। पर आज इसकी स्थिति देखें तो भले ही इसकी प्रसार संख्या बढ़ी हो परन्तु भाषा की दृष्टि से इसका पतन हुआ है। इस अखबार के 22 अक्टूबर के अंक का अध्ययन इस दृष्टि से उपयुक्त होगा। यह भी आजकल नवभारत टाइम्स के पदचिह्नों पर चल रहा है। इसका पृष्ठ 3 देखें तो उसका नाम है अपना शहर हॉट सिटी, अब अपना शहर के साथ हॉट सिटी की क्या जरूरत थी समझ पाना मुश्किल है। इसी पृष्ठ पर तीन खबरों के शीर्षक देखने लायक हैं - कर्ज से परेशान इंजीनियर ने फंदा लगाकर किया सुसाइट, रेलवे ने फेस्टिव सीजन के लिए चलाई स्पेशल ट्रेनें, सुसाइट करने रेलवे ट्रैक पर लेटी महिला।12
वैसे शीर्षकों के कुछ उदाहरण छोड़ दिए जाएं तो अमर उजाला की भाषा शैली, खासकर वाक्य रचना सहज है। इसमें अपेक्षाकृत छोटे वाक्यों का प्रयोग और तारतम्यता पाठक को बांधती है। महाराष्ट्र में दूसरे प्रदेशों से आकर बसे लोगों के लिए परप्रांतीयशब्द का प्रयोग या हिमालय के अन्वेषक नैन सिंह जैसे पद पुराने अमर उजाला की उपस्थिति को दर्शाते हैं। (पृष्ठ 14) परन्तु जब उसी पृष्ठ पर मोटर एक्सीडेंट क्लेम के मामलों में यदि ड्राइवर का लाइसेंस फर्जी पाया जाता है..हलवे में कंकर आने की तरह है।13
इसी दिन का अमर उजाला का रविवारीय परिशिष्ठ मनोरंजनके मुख्य लेख लाइक में लाइफनए माध्यमों पर है इसलिए उसमें कुछ शब्द तो उचित हैं जैसे सोशल मीडिया, फेसबुक, व्हाट्सऐप आदि परन्तु चाइल्ड साइकोलॉजिस्ट को बाल मनोचिकित्सक भी लिखा जा सकता है जो सबकी समझ में आता है। इसी प्रकार चार कैटेगिरी, स्पेसिफिक इमोशन्स, कलेक्ट, मैसेज, लेवल जैसे शब्दों से बचा जा सकता है। इसी खण्ड के पृष्ठ 3 पर एक लेख में अनेकोंशब्द लिखा गया है, बहुवचन का बहुवचन कमाल का प्रयोग है। इसी पृष्ठ पर खानपान पर लेख में रेस्तरां, मेन्यू शब्दों से भी बचा जा सकता था। इसी खण्ड के 2 से 4 नम्बर के पृष्ठों पर मनोरंजन के साथ Sunday लिखना क्यों जरूरी है समझना मुश्किल है।14
हिंदी अखबारों की बात हो और इंदौर का नाम न आए ऐसा हो नहीं सकता। एक समय अपनी भाषा और अन्य पक्षों के लिए इंदौर से प्रकाशित समाचार पत्र मानक थे परन्तु आज स्थिति एकदम विपरीत है। 1983 में जब इंदौर से भास्कर का प्रकाशन शुरू हुआ तो मैं उसमें प्रशिक्षु के रूप में काम करने लगा था। उन दिनों किसी भी खबर में गलती छूट जाने पर सम्पादक के सामने पेशी हो जाती थी। अब पता नहीं वैसा होता है या नहीं, पर जिस अखबार में काम करते हुए मैंने हिंदी सीखी उसमें आज अंग्रेजी का बोलबाला है। 22 अक्टूबर के दैनिक भास्कर का पृष्ठ 2 देखें तो उसका नाम ही है लाइफ - मैनेजमेंट। उसपर जो सामग्री प्रकाशित है उसमें ड्रग एडिक्ट, एक्टर, थॉट, गॉसिप सहित अनेक अंग्रेजी शब्दों का इस्तेमाल किया गया है। हालांकि खबरों में अंदर सरस हिंदी है और अंग्रेजी शब्दों का प्रयोग कम है परन्तु शीर्षक में उनका प्रयोग उचित कैसे कहा जा सकता है।15 इसी प्रकार पृष्ठ 4 पर एक खबर में अप्रूव प्रोजेक्ट, डिस्ट्रीब्यूशन लाइन, लीकेज, ज्वाइंट वैंचर जैसे शब्दों का प्रयोग किया गया है।16 इसके साथ ही पृष्ठ 12 का नाम बिजनेस रखा गया है। इस पृष्ठ पर प्रकाशित समाचारों में अंग्रेजी शब्दों की भरमार खटकती है।
इंदौर से प्रकाशित नई दुनिया ऐसा अखबार है जिसने अपनी भाषा व प्रस्तुतिकरण के लिए कई बार पुरस्कार जीता है पर अब इसमें भी भाषा को लेकर पहले जैसी प्रतिबद्धता दिखाई नहीं देती। नई दुनिया के उज्जैन संस्करण के 22 अक्टूबर के अंक में पहले पृष्ठ पर ही एक शीर्षक है - हिंगोट युद्ध में 50 साल में पहली वार एक की मौतइसमें बार की जगह वार छपा है जो गलत है। इसी पृष्ठ पर पुलिस पर हमले वाली खबर में भाषा की गलतियां हैं। जैसे-‘.... छिप कर बैठे हत्या का आरोपी व उसके भाई.....इसमें हत्या के आरोपी लिखा जाना चाहिए था। इसी समाचार में आगे एक जगह लिखा गया है उसे मेघनगर के जीवन ज्योति अस्पताल ले जाया गया और यहां से...इसमें यहां की जगह वहां या जहां शब्द लिखा जाना चाहिए था।17
नई दुनिया के इंदौर संस्करण के 22 अक्टूबर के अंक में हिंगोट वाली खबर में तो गलती को ठीक कर लिया गया परन्तु पुलिस पर हमले वाली खबर में नहीं। इसी अंक में पृष्ठ 28 पर प्रकाशित समाचारों में अंग्रेजी शब्दों का प्रयोग देखकर आश्चर्य होता है कि क्या यह वही अखबार है जो कभी मानक हुआ करता था और जिसने राजेन्द्र माथुर जैसा सम्पादक दिया।18
इस प्रकार आज हम पाते हैं कि हिन्दी अखबारों में ही हिन्दी का समुचित आदर होना कम होता जा रहा है। अंग्रेजी भाषा में कोई बुराई नहीं है और न ही उसके प्रयोग में। बात बस इतनी सी है कि हम किस मंशा से उसका प्रयोग कर रहे हैं। ऐसा लगता है कुछ अखबारों ने जानबूझ कर अंग्रेजी शब्दों का प्रयोग करना शुरू किया है ताकि हिन्दी भाषी लोगों को हिंग्लिश भाषी बनाया जा सके। यह एक तरह से भाषिक गुलामी की ओर प्रस्थान है। भाषा की शुद्धता के प्रति किसी भी तरह की प्रतिबद्धता न रहना और आवश्यक न होने पर भी मखमल में टाट के पैबंद की तरह अंग्रेजी के शब्दों का प्रयोग एक तरह का सांस्कृतिक विचलन है। समाचार पत्रों का काम भाषा का संस्कार बनाना है बिगाड़ना नहीं, परन्तु लगता है कि आजकल के पत्रकार यह बात भूलते जा रहे हैं। 

1.            हिन्दुस्तान, 22 अक्टूबर के अंक में पृष्ठ 6
2.            वही पृष्ठ 6
3.            वही, 22 अक्टूबर 2017 पृष्ठ 16
4.            राष्ट्रीय सहारा, 22 अक्टूबर 2017 पृष्ठ 1
5.            राष्ट्रीय सहारा, 22 अक्टूबर 2017 पृष्ठ 1
6.            राष्ट्रीय सहारा, 22 अक्टूबर 2017 पृष्ठ 1
7.            वही, पृष्ठ 10
8.            वही, उमंग परिशिष्ट
9.            नवभारत टाइम्स, 22 अक्टूबर 2017, पृष्ठ 3
10.          वही
11.          वही
12.          अमर उजाला, 22 अक्टूबर 2017 पृष्ठ 3
13.          वही, पृष्ठ 14
14.          वही, मनोरंजन परिशिष्ट
15.          दैनिक भास्कर, इन्दौर, 22 अक्टूबर 2017, पृष्ठ 2
16.          वही, पृष्ठ 4
17.          नई दुनिया, उज्जैन संस्करण, पृष्ठ 1
18.          नई दुनिया, इन्दौर, पृष्ठ 28

Dr. Ved Prakash Bhardwaj
Assistant Professor, BJMC department,  IIMT group of collages Greater Noida


1 comment:

  1. आदरणीय श्रीमान वेद प्रकाश जी, सादर नमस्कार! श्रीमान जी आपका लेख "समाचार पत्रों की भाषा" कहत वेद ब्लॉग पर पढ़ा। आपने, इस लेख में बड़ी गंभीरता से हिंदी समाचार पत्रों की भाषा का विश्लेषण किया। आपके इस लेख को पढ़कर मुझे नई रोशनी मिली है। मेरे लिए तो समाचार पत्रों की भाषा को समझने के लिए यह लेख अत्यंत सहायक एवं उपयोगी सिद्ध हुआ है। मैं इस लेख से अत्यंत प्रभावित हूँ।
    श्री मान जी "समाचार पत्र अथवा मुद्रित माध्यमों में हिंदी के प्रयोग" विषय पर आपके द्वारा लिखित कोई पुस्तक हो तो अवश्य बताइये। चरण स्पर्श!
    # सत्येन्द्र कात्यायन
    खतौली(मुज़फ्फरनगर)251201
    9897548002(व्हाट्सएप्प)

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