Thursday, June 12, 2014

केशव मलिक

केशव मलिक नहीं रहे यह सुन कर झटका लगा। हालांकि पिछले काफी समय से वे अस्वस्थ चल रहे थे फिर भी जब भी कोई उन्हें प्रदर्शनी के उद्घाटन के लिये बुलाता था, वे जाते थे। इसमें कोई शक नहीं कि उनके जैसे कला आलोचक कम ही होते हैं। वे एक कवि भी थे, यह बात तो लगभग सभी जानते हैं परन्तु वे चित्रकार भी थे, यह बात कम ही लोगों को पता होगी। यह बात उन्होंने ऐसे ही अनौपचारिक बातचीत में बतायी थी। उनसे बातचीत करना हमेशा सुखद रहा, चाहे वह प्रदर्शनी में हो या उनके घर पर। एक बार उनसे उनके घर पर लम्बी मुलाकात हुई। उन दिनों भी वह स्वस्थ नहीं थे इसलिये साफ कह दिया था कि वे ज्यादा समय नहीं बैठ पाएंगे पर एक बार जब बातचीत का सिलसिला शुरू हुआ तो फिर करीब तीन घंटे तक चलती रही। उस समय उनसे कला की दुनिया और कला आलोचना की स्थिति को लेकर चर्चा हुई। उनके पास एक लम्बा अनुभव था। बहुत सी ऐसी बातें उनसे जानने को मिलीं जो वैसे मुझे पता नहीं चल पातीं। वे कला आलोचना की स्थिति को लेकर बहुत खुश नहीं थे क्योंकि समाचार पत्रों ने अपने यहां कला समीक्षा के लिये जगह खत्म कर दी थी। एक आलोचक के रूप में कैसे किसी कृति को देखा जाए इसको लेकर भी चर्चा हुई। उस समय उन्होंने एक बात कही थी जो अब भी याद है। उन्होंने कहा था कि कला पर लिखने के लिये सिर्फ कला को देखना ही काफी नहीं है बल्कि उसे जीना भी जरूरी है। उनकी याद हमेशा बनी रहेगी। क्या ही अच्छा हो यदि उनके लेखन को पुस्तक के रूप में सामने लाया जाए। यदि कोई प्रकाशक तैयार नहीं होता है तो कलाकारों को मिलकर इस दिशा में पहल करनी चाहिए।

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