Thursday, November 21, 2019

युवाओं में बढ़ता अवसाद और आत्महत्या की प्रवृत्ति




युवाओं में बढ़ता अवसाद और आत्महत्या की प्रवृत्ति
वेद प्रकाश भारद्वाज
पिछली शताब्दी के अंतिम दशक और इस शताब्दी के प्रथम दशक में जन्म लेने वाली पीढ़ी आज वयस्क हो चुकी है। एक ऐसी पीढ़ी जिसने नये सपनों को नया रंग देना शुरू कर दिया है। इस पीढ़ी को मैंपीढ़ी कहा जाता है। आत्मकेंद्रित परंतु विकास के लिए हर तरह का जोखिम उठाने वाली यह पीढ़ी एक नये समाज की रचना भी कर रही है। इस समाज में जाति और धर्म है परंतु अब वह किसी तरह के सामाजिक सूत्र की बजाय केवल एक पहचान है। यह समाज आज मूलतः शहरों में बसता है परंतु इसका प्रभाव ग्रामीण क्षेत्रों में होने लगा है। निश्चय ही इसका कारण उपभोक्तावाद और बाजारीकरण है। इसके कई तरह के लाभ हमें दिखाई देते हैं या दिखाये जाते हैं परंतु पिछले कुछ समय से इस युवा पीढ़ी में कई ऐसी समस्याएं भी दिखाई देने लगी हैं जो भविष्य के लिए एक बड़ा खतरा कही जा सकती हैं। इन समस्याओं में सबसे अधिक चिंताजनक है युवाओं में बढ़ता अवसाद और आत्महत्या की प्रवृत्ति। पिछली पीढ़ी के जीवन में भी निराशाएं होती थीं फिर भी उसमें जीवन से मोहभंग नहीं होता था परंतु इस पीढ़ी में जीवन से जल्दी मोहभंग देखने को मिल रहा है जो खतरनाक है। यदि आज इस तरह के तथ्य सामने आ रहे हैं कि 25 प्रतिशत युवाओं में अवसाद की समस्या है और वह आत्महत्या जैसे कदम उठा रहे हैं तो इस पर ध्यान दिया जाना चाहिए।
हाल ही में इंग्लैंड में हुए एक शोध के अनुसार यह पीढ़ी लगातार अवसाद की शिकार होती जा रही है। इसके अनुसार अवसाद और उसके परिणामस्वरूप आत्महत्या का कारण बढ़ती बेरोजगारी है। विश्व स्वास्थ्य संगठन की मानसिक स्वास्थ्य 2016 रिपोर्ट के अनुसार भारत में 25 प्रतिशत पुरूष आत्महत्या करते हैं जिनकी उम्र 16 से 29 वर्ष के बीच है। इस रिपोर्ट पर विश्वास नहीं किया जा सकता क्योंकि इतनी बड़ी संख्या में आत्महत्या के मामले देखने को नहीं मिलते। परंतु इसमें शक नहीं कि देश में पुरूषों और खासकर युवाओं में आत्महत्या की प्रवृत्ति बढ़ी है। विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट का आधार एक अध्ययन है जिसमें करीब दस हजार युवाओं को लेकर अध्ययन किया गया था। (दैनिक हिंदुस्तार, 19 नवंबर 2019, नई दिल्ली)। भारत सहित दुनिया के किसी भी समाज में हम यह देख सकते हैं कि किस तरह युवाओं में आत्महत्या की प्रवृत्ति बढ़ रही है। युवाओं में बढ़ती आत्महत्या और अवसाद के साथ यदि हम उनके चरित्र के आंकलन के परिणामों को मिलाकर देखें तो इसका कारण मैंपीढ़ी की स्थापनाओं में ही छिपा हुआ है।
यह जो मैंकी आत्मकेंद्रित प्रवृत्ति है, कोई नयी बात नहीं है। यह मनुष्य का स्वाभाविक रूप है। इसी मैंने मनुष्य को विकास की नई ऊंचाइयां तक पहुंचाया। उसे ज्ञान-विज्ञान के उन क्षेत्रों में पहुंचाया जो एक समय कल्पना मात्र थे। एक समय वह भी था जब इस मैंको नकारते हुए हमपर बल दिया गया। हमयदि सामाजिकता का आधार है तो मैंव्यक्तिगत विकास का और इसीलिए इनमें कई बार टकराव भी देखने को मिलता है। यह टकराव ज्यादातर लोगों के जीवन में होता है और उस टकराव में अक्सर मैंजीत जाता है। युवा अवस्था में यह मैंअधिक प्रभावी होता है। आत्मकेंद्रित व्यक्ति निजी इच्छाओं और उनकी पूर्ति के उद्यम को ही प्राथमिकता देता है। आज की युवा पीढ़ी के साथ एक समस्या यह है कि वह आत्मकेंद्रित ही नहीं है अति-महत्वाकांक्षी भी है। परंतु अपनी महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति के लिए वह किसी तरह की प्रतिबद्धता का प्रदर्शन नहीं कर पाती। यही कारण है कि उसकी छवि को एक गैर-ज़िम्मेदार और आलसी किस्म के युवाओं के रूप में पेश किया जाता है, लेकिन हाल ही में इन युवाओं पर मीडिया का ध्यान विशेषरूप से आकर्षित हुआ है। इसके दो कारण हैं। एक तो यह कि आज मीडिया का सबसे अधिक उपयोग करने वालों में यही युवा वर्ग सबसे आगे है, विशेषरूप से डिजिटल मीडिया का सबसे अधिक यही प्रयोग करता है। दूसरा यह कि यही युवा वर्ग पूरी दुनिया में सबसे बड़ा और प्रभावशाली उपभोक्ता भी है। एक ऐसा उपभोक्ता वर्ग जो खर्च करने के मामले में पिछली पीढ़ियों से बहुत आगे है।
किसी भी बाजार में हम देख सकते हैं कि सबसे अधिक खरीदार युवा ही होते हैं। उनमें विद्यार्थी वर्ग भी शामिल है और युवा युगल भी। इनमें बेरोजगार भी शामिल हैं, आंशिक रोजगार वाले भी और ऊंचे वेतन वाली नौकरियां करने वाले भी। बाजार में उनकी छवि कुछ ऐसी बन गयी है कि उनमें पैसा उड़ाने की गंदी लत पड़ जाती है। यह कोई सर्वमान्य या सर्वसम्मत स्थिति है, ऐसा दावा करना उचित नहीं है। कारण कि आज भी इस पीढ़ी का एक बड़ा वर्ग वैसा उपभोक्ता नहीं बन पाया है जैसा बाजार चाहता है, बिना किसी बात की परवाह किये खर्च करने वाला उपभोक्ता। आज भी ऐसे युवाओं की संख्या कम नहीं है जो किसी तरह जीवन को चलाने के संघर्ष के दौर में है। भारत में तो ऐसे युवाओं की संख्या अधिक है ही, अन्य देशों में भी उनकी संख्या कम नहीं है। सपने और आकांक्षाएं इसके पास भी कम नहीं हैं, और यही उसकी व समाज की बड़ी समस्या है। स्वप्न और यथार्थ के बीच की गहरी खाई अंततः इस वर्ग को अवसाद के अंधेरे में ले जाती है। यह अवसाद की समस्या सिर्फ उन युवाओं में ही नहीं है जो संसाधनों की कमी से जूझ रहे हैं बल्कि उनमें भी है जिनके पास संसाधन अधिक हैं या आवश्यकता से अधिक हैं। यह अलग बात है कि उनके अवसाद का कारण दूसरा है। पर यह एक ऐसी पीढ़ी है, जो अन्य पीढ़ियों की तुलना में सबसे अधिक अवसाद से ग्रस्त है। यह बहुत तेज़ी से बदलते वैश्विक समाज के बच्चे हैं और अपने माँ-बाप और दादा-दादियों के विपरीत स्वयं वयस्क होने के संक्रमण काल से गुज़र रहे हैं। यह परिवर्तन और विकास की अनेक चुनौतियों से जूझने के साथ-साथ आधुनिक काल की बढ़ती माँगों के अनुरूप खुद को बदल भी रहे हैं। यह बदलाव बहुत तेज है जो उन्हें स्थिर नहीं होने देता। हमारा समय तेजी से बदल रहा है। तेज तकनीकी विकास के कारण जीवन की गति भी तेज हो गयी है। इसका असर जीवन पर बहुत गहरे तक पड़ रहा है। इस पीढ़ी पर मनोवैज्ञानिक दबाव पहले की पीढ़ी से अधिक है क्योंकि जीवन के सभी क्षेत्रों में अवसरों से अधिक प्रतियोगिता बढ़ गयी है। इसका सीधा असर उनके व्यवहार और जीवन दर्शन पर पड़ा है।
यह शताब्दी पिछली शताब्दी के गर्भ से निकली है जो तेज परिवर्तनों, यहां तक कि अनेक अप्रत्याशित परिवर्तनों की गवाह रही है। जैसा वैचारिक आलोड़न और विचारधाराओं का ध्वंस पिछली शताब्दी में हुआ वैसा पहले कभी नहीं हुआ। आशाओं और निराशाओं के घमासान के बाद ऐसी स्थितियां बन गयी हैं जिनमें किसी तरह का वैचारिक आधार टिक नहीं पा रहा है। पुरानी राजनीतिक और सामाजिक संस्थाएं लगभग ध्वस्त हो चुकी हैं या जो बची हैं वह भी केवल भग्नावशेष प्रतीत हो रही हैं। ऐसे हालात में जीवन पर तात्कालिकता का इतना अधिक प्रभाव हो गया है कि उसमें स्थिरता और वैचारिक प्रतिबद्धता जैसे शब्द अर्थहीन प्रतीत होने लगे हैं।
सांस्कृतिक भूदृश्य में होने वाले परिवर्तनों अर्थात् यौन क्रांति, महिला आंदोलनों और ज्ञान-आधारित अर्थव्यवस्था की जगह उपभोग आधारित अर्थव्यवस्था के स्थापित हो जाने के कारण हाई स्कूल पास करने के समय और वयस्क की भूमिका में आने के समय के बीच का अंतराल कम होता रहा है। वयस्क अवस्था यानी आर्थिक स्वतंत्रता, स्थायी नौकरी और पारिवारिक जीवन के मानक बदल गये हैं। हालांकि यह मानक सभी संस्कृतियों में अलग-अलग हैं जहाँ एक ओर विकसित देशों में इसका व्यापक अध्ययन पहले से ही होता रहा है, वहीं भारत में इस पर शोध कार्य अभी आरंभ ही हो रहा है।
भारत में 1990 के दशक में सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र में तेज़ी की शुरुआत से ही सामाजिक और सांस्कृतिक परिवेश में भी परिवर्तन होने लगा। औद्योगीकरण और आधुनिकीकरण की आँधी ने एक ही झटके से पुराने मूल्यों और स्थापनाओं को ध्वस्त कर दिया। अमरीका के समान भारत में भी यह प्रवृत्ति मुख्यतः उच्च व मध्यवर्गी शहरी आबादी में अधिक दिखाई दी। भारतीय ग्रामीण समाज आमतौर पर होने वाले परिवर्तनों से या तो बचा रहा है या उसके प्रभावित होने की गति अपेक्षाकृत धीमी रही है परंतु शहरी समाज में परिवर्तन अधिक तेजी से हुए हैं। इसका कारण शहरी समाज तक सूचना तंत्र की पहुंच और शिक्षा रहा है। यही कारण है कि सहस्राब्दी में जन्मी और परवान चढ़ी युवा पीढ़ी में यह प्रवृत्ति शिक्षा, ऊँचे वेतन वाली नौकरियों और प्रेम और विवाह में आज़ादी के कारण अधिक मुखर रूप में दिखाई देने लगी है। इसका असर ग्रामीण समाजों पर भी हुआ भले ही देर से हुआ क्योंकि दूर संचार के विस्तार और उदारीकरण के कारण बाजार के विस्तार की आवश्यकताओं ने ग्रामीण समाजों को एक बड़े और संभावनाशील उपभोक्ता समाज के रूप में बदलना शुरू कर दिया था। इसका एक कारण यह भी रहा है कि विकास के अवसरों की सीमितता के कारण ग्रामीण क्षेत्र के युवा बेहतर अवसरों की तलाश में शहरों का रूख करने लगे।  इसके फलस्वरूप सामाजिक आवाजाही बढ़ने लगी। यह युवा जब शहरी अनुभवों के साथ गांवों में जाने पर अपने साथ शहरी अनुभवों को ले जाने लगे और उन्हें ग्रामीण जीवन में स्थापित करने का काम करने लगे। इस काम में मीडिया के विस्तार ने कारगर भूमिका निभाई है। सामाजिक और सांस्कृतिक प्रवाह में परिवर्तन के कारण जाति-व्यवस्था की पकड़ भी धीरे-धीरे कमज़ोर होने लगी है और भारत में नया अध्याय आरंभ होने लगा है।
इस सहस्राब्दी के पहले दशक में, मध्यम शहरी वर्ग के भारतीय परिवारों में परिवर्तन का जो सिलसिला शुरू हुआ वह बहुआयामी है जिसका असर समाज, शिक्षा, अर्थव्यवस्था, राजनीति सभी क्षेत्रों में दिखाई दिया है। वैश्वीकरण, शहरीकरण और बदलते सामाजिक परिवेश का हिस्सा बनने के साथ ही उसमें निर्णायक भूमिका की इच्छा के कारण भारत की वयस्क पीढ़ी अनेक कठिन चुनौतियों का सामना कर रही है।  इसके कारण वयस्क अवस्था में संक्रमण के दौर से गुज़रने के अनुभवों में आमूल-चूल परिवर्तन आ गया है।
प्रत्येक संस्कृति में वयस्क अवस्था का सबसे बड़ा मानदंड है निर्णय की स्वतंत्रता जिसमें आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक स्वतंत्रता तो है ही, साथ ही बेहतर जीवन स्थितियों पर अधिकार की भावना भी शामिल है। युवा वर्ग की इस स्वतंत्रता की भावना को बाजार ने एक हथियार की तरह इस्तेमाल किया और उन्हें कमाओ और उड़ाओकी प्रतियोगिता में शामिल कर दिया। सुख और खुशी की परिभाषा मानसिक नहीं रही, भौतिक हो गयी है। जीवन का आनंद वस्तुओं के उपभोग में है। वस्तुओं का उपभोग ही व्यक्ति के होने की प्रामाणिकता है। एक उपभोक्ता के रूप में उपभोग की आजादी पर इतना बल दिया गया कि कुछ न कुछ उपभोग करना एक दूसरी तरह की परतंत्रता हो गयी। वस्तुओं की गुलामी जो दिखाई नहीं देती। घर से बाहर खाने की आजादी, नये उपकरणों के उपयोग की आत्मनिर्भरता, पारिवारिक और सामाजिक बंधनों से स्वतंत्रता, अपनी तरह से जीने की छूट आदि ने मिलकर युवाओं को ऐसे रास्ते पर लाकर खड़ा कर दिया जिसपर जरा की परेशानी आने पर उनके सामने सारे रास्ते बंद नजर आने लगते हैं। इसमें कोई संदेह नहीं कि इस सहस्राब्दी में दुनियाभर में युवाओं ने अनेक देशों में लोकतांत्रिक मूल्यों की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। भारत में भी राजनीतिक परिवर्तनों में उसकी भूमिका रही है।
भारतीय सामाजिक संरचना में व्यक्ति की जगह परिवार का महत्व रहा है। व्यक्ति की स्वतंत्रता का अर्थ बहुत सीमित रहा है। अपनी पसंद के कारण किये गए फैसलों में अक्सर कई कारण जुड़े रहते हैं, खास तौर पर पारिवारिक दायित्व और समाज की अपेक्षाएँ  लोगों के जीवन पर अधिक हावी रहती हैं। यही कारण है कि भारत में पहले युवा स्वतंत्र निर्णय नहीं ले पाते थे। आज भी इस स्थिति में बहुत बदलाव नहीं हुआ है। इसके बाद भी शहरी क्षेत्रों में युवाओं में स्वतंत्र निर्णय की आकांक्षा बढ़ती जा रही है। इसका प्रभाव पारिवारिक और सामाजिक संरचना पर पड़ा है। परिवार नामक संस्था इसके कारण कमजोर पड़ने लगी है। परिवारों के कमजोर होने के असर सामाजिक संगठन पर होने लगा है। हालांकि इसके कुछ अच्छे परिणाम भी सामने आये हैं जैसे जाति व समाज के बंधनों का टूटना पर इसके कारण होने वाले बिखराव ने अलगाव को बढ़ाया है जो युवाओं में अवसाद का एक बड़ा कारण है। शहरी जीवन में परिवार और समाज का आधार कमजोर होने के कारण थोड़ी-सी भी विपरीत परिस्थितियां युवाओं को हताशा के अंधेरे में धकेल देती हैं।

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