दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश में संवैधानिक उत्सव का एक और आयोजन लगभग समाप्त हुआ। यह कितना सफल हुआ और कितना विफल , इस बारे में जल्दी ही सबको पता चल जाएगा। मार्च में चुनाव की घोषणा के साथ ही पर्दा उठा था और 23 मई को पर्दा गिर जाएगा। इस पर्दा उठाने और गिरने के बीच मंच पर जो कुछ होता रहा वह किसी भी तरह से तार्किक, अर्थपूर्ण और सभ्य नहीं कहा जा सकता। आप चाहें तो उसे प्रहसन कह सकते हैं परंतु प्रहसन की भी अपनी मर्यादा होती है। राष्ट्रीय मंच पर जो कुछ होता रहा, वह किसी भी तरह मर्यादित तो नहीं ही कहा जा सकता। हमारे यहाँ होली के अवसर पर कई शहरों में मूर्ख सम्मेलन या इसी के जैसे कार्यक्रमों की सुदीर्घ परम्परा रही है। उसमें जो कुछ होता रहा है उसके बारे में सब जानते हैं कि यह सब बनावटी और केवल हास-परिहास के लिए होता रहा है। पर संसदीय चुनाव के राष्ट्रीय मंच पर इस बार जो कुछ हुआ क्या उसे भी हम होली के आयोजनों की तरह हल्के में ले सकते हैं? और यह भी कि जिस तरह से चुनाव-दर-चुनाव लोकतांत्रिक व्यवहार को तार-तार किया जाने लगा है, उसे देखते हुए क्या विश्व गुरु होने का दम भरने वाले इस देश की नियति 'नँगे राजा' की नहीं होने वाली है? मैं जानता हूँ कि इस देश में आशावादियों की कमीं नहीं है। सदियों तक दुश्मनों ने इस देश को मिटाने की कोशिश की फिर भी हमारी हस्ती मिटी नहीं, यह विश्वास दोहराने वाले कम नहीं हैं। मैं भी उनमें शामिल हूँ परंतु, इसके बावजूद भविष्य को लेकर यदि भय लगता है तो उसका कारण हमारा वर्तमान ही है जिसके प्रति हम आँखें मूंदे बैठे हैं।
उम्मीदों की इबारत लिखने की कोशिशों के बीच कब हमारे नेता वर्तमान की रेखाओं को मिटाने लगे, उन्हें खुद नहीं पता। देश, जो एक भौगोलिक और राजनीतिक इकाई से पहले एक सामाजिक इकाई होना चाहिए था, आज जैसे कबीलाई संस्कृतियों की पहचान का संघर्ष बन कर रह गया है। अनेकता में एकता के सुर उलटे पड़ गए हैं। और इतने उलटे पड़ गए हैं कि एकता में अनेकता का कोरस भी सम्भव नहीं रहा। वह अनेकता में भी अनेकता के कोलाहल में बदल गया है।
कोलाहल चारों ओर है। अपनी-अपनी डफली, अपना- अपना राग की विविधता भी अब नहीं है। सभी दल कहने को तो अपना अलग राग साध रहे हैं परंतु यह अलग राग तो केवल आवरण है। अंदर से देखें-सुनें तो गीत वही बेढंगा है सब का। सुर चाहे पंचम हो या सप्तम, बात सबकी बेढंगी ही है। घर में नहीं दाने और अम्मा चली भुनाने, जिसे देखो वही गरीबों की जेब काजू-किशमिश से भरने का दावा कर रहा था। उधर गरीब आदमी अपनी फटी जेब की चिंता में डूबा रहा, गलती से उन्होंने जेब में कुछ डाल दिया तो छेद और बड़ा हो जाएगा। पर गरीब आदमी थोड़ा आश्वस्त रहा, क्योंकि नेता जो कहते हैं करते नहीं और जो करते हैं उसकी भनक भी नहीं लगने देते। सत्तर साल का अनुभव है।
इसीलिए आदमी जब तक गरीब है निश्चिंत है। जैसे ही वो हिंदू-मुसलमान हो जाता है, अगड़ा-पिछड़ा हो जाता है, सवर्ण-दलित बन जाता है, अपनी फटी जेब की चिंता छोड़ देता है। वह जूतियों में दाल की तरह बंटने लगता है। राष्ट्रीय प्रहसन में मंचासीन यह देख खुश होते हैं। उनकी कोशिशें रंग लाने लगती हैं तो वे और नई कोशिशों में जुट जाते हैं। अमीर और गरीब कभी लड़ते नहीं हैं। दोनों अपनी-अपनी सीमा में डरे-दुबके रहते हैं। एक के पास लड़ने की फुरसत नहीं होती तो दूसरे के पास साधन नहीं। पर जैसे ही आदमी धर्म और जाति में बदलता है, उस धर्म और जाति के लिए जान देने को तैयार हो जाता है जो उसे जीने का कोई सुभीता नहीं देते।
मंचासीन इस बात को जानते हैं। चुनाव से बढ़िया व असरदार मौका रोज-रोज नहीं मिलता। इसबार तो मौके भी अधिक थे। दो महीने से अधिक की चुनाव अवधि में कुंलाचे भरने का भरपूर मौका था। फिर इस बार मंच भी बढ़ गए। सोशल मीडिया ने कलाकारी दिखाने के अवसर बढ़ा दिए। अभी खेल कुछ दिन और चलेगा। सोशल मीडिया पर विशेष लोग लगातार सक्रिय हैं। हर कोई अपने विश्लेषण के साथ अपने निष्कर्ष लेकर मैदान में है। चुनाव नतीज़ों की घोषणा के बाद यदि किसी को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला तो खेल कुछ दिन और रोचक बना रह सकता है।
20-5-2019
JOURNALIST VED PRAKASH BHARDWAJ SHARING HIS VIEWS ON SOCIAL ISSUES, LITERATURE, ART, AND POLITICS. पत्रकार वेद प्रकाश भारद्वाज के सामाजिक, साहित्य, कला, राजनीति आदि पर विचार
Tuesday, May 21, 2019
लोकतंत्र का प्रहसन : वेद प्रकाश भारद्वाज
Friday, May 17, 2019
वंशवाद और लोकतंत्र का भ्रम-1
डॉ. वेद प्रकाश भारद्वाज
दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र होने का दम भरते हुए
पिछले 70 साल में हम लगातार सामंतशाही को अपनी नियति बनाते रहे हैं। संसदीय व्यवस्था, संविधान और कानून व्यवस्था के साथ ही मानवाधिकारों और लोकतांत्रिक अधिकारों, प्रातिनिधिक शासन व्यवस्था के बाद भी यदि यह कहना पड़ रहा है कि हमारा लोकतंत्र
केवल प्रतिकात्मक है या केवल भ्रम है तो इसके कुछ ठोस कारण हैं। दुनिया के अनेक
लोकतांत्रिक देशों में आज भी राजशाही है, ब्रिटेन में हैं, जापान में है, और भी जगहों पर है परंतु वहाँ राजशाही केवल प्रतिकात्मक है। भारत में राजशाही
नहीं है, प्रतिकात्मक भी नहीं,
घोषित रूप से यही स्थिति है। परंतु क्या यह वास्तविक स्थिति है? नहीं, वास्तविक स्थिति यही है कि हम अप्रत्यक्ष रूप से आज भी राजशाही की स्थिति में
जी रहे हैं। कारण कि आज़ादी के बाद भले ही हमने लोकतांत्रिक शासन प्रणाली को अपना
लिया परंतु अपनी मानसिकता को हम राजशाही से मुक्त नहीं कर सके। पिछले दिनों जब
प्रियंका गांधी वाड्रा को कांग्रेस का महासचिव बनाया गया तब कांग्रेसियों और
कांग्रेस समर्थकों के अलावा मीडिया में भी जिस तरह उनका स्वागत किया और उनमें
भविष्य देखना शुरू किया वह एक लोकतांत्रिक अभिव्यक्ति थी या कि राजशाही वाली
मानसिकता का प्रदर्शन? कांग्रेस, सपा, बसपा, राजद, जदएस, नेशनल कांफ्रेंस, द्रमुक, तेलुगु देशम, राष्ट्रीय कांग्रेस पार्टी, शिवसेना और इसी तरह के अन्य दल क्या लोकतांत्रिक
राजनीतिक दल हैं या कि पारिवारिक संस्थान?
वंशवाद की बढ़ती बेल
भारतीय मानस 70 साल की लोकतांत्रिक यात्रा के बाद भी यदि
सामन्तवादी मानसिकता का शिकार है तो इसके एक तरफ ऐतिहासिक कारण हैं तो दूसरी तरफ
वर्तमान राजनीतिक दुरभिसंधि भी है। सवाल उठता है कि यह वंशवाद क्यों फलता-फूलता है? इसका एक ऐतिहासिक कारण तो यह कि 1947 के पहले तक भारतीय मानस किसी न किसी सत्ता की
अनुकंपा पर जीवन को सम्भव मानता रहा है, चाहे वह राजा हो या ईश्वर। दूसरा यह कि कोई भी
सत्ता हो, राजा या ईश्वर,
आम जनता के लिए असंदिग्ध रही है। तीसरे यह कि भारतीय मानस सामाजिक स्थितियों
की शास्त्रसम्मत व्यवस्था को अनुलंघनीय मानता आया है। इसी से जन्म से जाति और धर्म
के निर्धारण के साथ ही कर्म और सत्ता का निर्धारण होता आया है, हो रहा है। भारतीय समाज कभी भी उस तरह का संघर्षशील समाज नहीं रहा है जैसा
यूरोपीय समाज रहा है या जापान और चीन रहा है जिन्होंने अपनी समस्याओं के हल के लिए
राजा या ईश्वर की तरफ देखने की बजाय अपने बाजुओं पर और अपनी मेहनत पर विश्वास
किया। यदि महात्मा गांधी ने नेतृत्व न किया होता तो सारा देश अंग्रेजी शासन के खिलाफ़
न हुआ होता। गांधी से पहले और बाद की स्थितियाँ इसका प्रमाण हैं। 1857 की क्रांति की विफलता का कारण भी यही था कि अलग-अलग रियासतों में लोग अलग-अलग
नेतृत्व में लड़ रहे थे और सबके आराध्य व आदर्श अलग-अलग थे। उस समय सभी राजा-रानी
केवल अपनी सत्ता को कायम रखने या उसे वापस हांसिल करने के लिए लड़ रहे थे।
महात्मा गांधी का आभामंडल
यह एक सर्वविदित सत्य है कि कांग्रेस की स्थापना
आज़ादी के लिए नहीं हुई थी बल्कि आम जनता और अंग्रेज सरकार के बीच तालमेल बनाये
रखने और भारतीयों के लिए शासन से कुछ रियायतें प्राप्त करने के लिए की गयी थी।
रियायतों के इन हकदार भारतीयों में पूरा भारतीय समाज शामिल नहीं था। यह वह भारतीय
लोग थे जो अंग्रेजी शिक्षा के कारण प्रशासन का हिस्सा थे, जिनके हाथ में आर्थिक शक्ति थी। यह लोग भारतीय समाज का एक छोटा सा हिस्सा थे
और उच्च वर्ग के थे। महात्मा गांधी के आने के बाद कांग्रेस में इन सुधारवादियों की
जगह समाप्त हो गयी। गांधीजी ने खुद को आम भारतीय से जोड़ा और उसे आज़ादी के लिए लड़ने
को तैयार किया। लोगों ने गांधी में संत देखा और उन्हें महात्मा मान लिया। गांधीजी
देश की आज़ादी को लेकर लड़ रहे थे। उनके पास भी भविष्य के लोकतांत्रिक देश का कोई
नक्शा नहीं था और न ही उनके प्रिय नेताओं के पास ही। गांधीजी के आभामंडल का यह लाभ
तो हुआ कि देश की आम जनता भी आज़ादी के लिए लड़ने को आगे आयी परंतु उससे जनता में
किसी तरह का लोकतांत्रिक संस्कार जागृत नहीं हो पाया। गांधीजी का अपना जीवन चाहे
जितना लोकतांत्रिक रहा हो,
वह लोगों को लोकतांत्रिक संस्कार देने में विफल रहे। उनके कुछ निर्णय ऐसे भी
रहे जिन्हें देखते हुए उनकी लोकतांत्रिक आस्थाएँ संदिग्ध बनी रहीं। उदाहरण के लिए
हम सुभाषचंद्र बोस के कांग्रेस अध्यक्ष बनने के बाद की स्थितियों में गांधीजी की
भूमिका को देख सकते हैं। कांग्रेस के अंदर लोकतांत्रिक प्रक्रिया को कुंद करने का
वह पहला प्रकरण था जब एक निर्वाचित अध्यक्ष को गांधीजी की इच्छा के कारण पद
त्यागना पड़ा। वैसे तो यह एक बहुत छोटी घटना थी और बाद में इसे इसी रूप में समझा भी
गया परंतु यह थी बहुत बड़ी बात। यह संकेत था कि इस बात का कि आने वाली राजनीति कैसी
होगी। यही नहीं, जिस तरह बहुमत की पसंद सरदार पटेल को अध्यक्ष बनने से गांधीजी ने रोका और
नेहरू को अध्यक्ष बनवाया वह भी कांग्रेस में लोकतांत्रिक प्रक्रिया के अंत का एक
पड़ाव था। यह एक निर्विवाद सत्य है कि संगठन में तमाम निर्णयों को लेकर गांधीजी को अंतिम
अधिकार प्राप्त था। यह अधिकार इसलिए था क्योंकि भारतीय जनता उनमें एक महात्मा को
देखती थी और उनसे हर तरह के चमत्कार की आशा करती थी। गांधीजी ने अपने स्तर पर समाज
को सुधारने के कुछ काम किये परंतु उन्हें जो काम सबसे अधिक करना चाहिए था, वह नहीं किया। देश को एकता के सूत्र में बांधने के चक्कर में वह उसे
लोकतांत्रिक बनाने से चूक गये।
उधार का लोकतंत्र
दुनियाभर में जिन देशों में हम आज लोकतांत्रिक
व्यवस्था देखते हैं उनका इतिहास इस बात का प्रमाण है कि वहाँ की जनता ने उसे
अर्जित किया। अमेरिका हो या इंग्लैंड, फ्रांस हो या जर्मनी या कि जापान, इन देशों में जनता ने देश में लोकतांत्रिक व्यवस्था कायम करने के लिए संघर्ष
किया। ठीक उसी प्रकार सोविय संध के देशों और चीन ने साम्यवादी व्यवस्था के लिए
संघर्ष किया। इसके विपरीत हम भारत में देखते हैं कि लोगों ने लोकतंत्र के लिए किसी
तरह का संघर्ष नहीं किया। उसका सारा संघर्ष सिर्फ विदेशी शासन से मुक्ति ही रहा।
यही कारण है कि जब अंग्रेजों को लगा कि अब इस देश पर आगे शासन संभव नहीं है तो
उन्होंने सत्ता हस्तांतरण की नीति पर काम किया। इस नीति के तहत अंग्रेजों ने सत्ता
तो कांग्रेस को सौंप दी परंतु साथ ही शासन करने का तरीका भी निर्धारित कर दिया। और
यह तरीका वही था जो इंग्लैंड में चल रहा था। भारत ने अपना संविधान बनाया, संसदीय प्रणाली को अपनाया, अन्य बातों को भी अपनाया परंतु क्या इस लोकतांत्रिक
व्यवस्था को बनाने में जनता की किसी तरह की प्रत्यक्ष भागीदारी थी? जो कुछ नेताओं को सही लगा उसे अपना लिया गया और जनता ने उसे स्वीकार कर लिया।
यह स्वीकार किया जा सकता है कि उस समय देश
की 20 प्रतिशत जनता ही शिक्षित थी पर उस समय इसका भी प्रयोग नहीं किया गया। और फिर
यह कैसे मान लिया गया कि जो शिक्षित नहीं थे वह कैसा देश व शासन चाहते हैं इसे
अभिव्यक्त नहीं कर सकते थे।
नेहरू और उसके बाद
आज़ादी के बाद नेहरूजी प्रधानमंत्री बने तो वह एक
तरह से राजा ही बने थे। भले ही बाद में चुनाव की प्रक्रिया अपनायी गयी परंतु वह
एकमात्र निर्विकल्पिक विकल्प थे। सामने ऐसी कोई दूसरी पार्टी थी ही नहीं जो उन्हें
टक्कर दे सके, और जो थे उनके पास नेहरूजी जैसे आभामंडल वाला कोई नेता नहीं था। आज़ादी
से पहले कांग्रेस में सरदार पटेल विकल्प थे परंतु वह गांधीजी की पसंद नहीं थे
इसीलिए उनके पक्ष में बहुमत होने के बाद भी आज़ादी से पहले उन्हें कांग्रेस अध्यक्ष
नहीं बनने दिया गया। कारण कि अंग्रेजों द्वारा भारत की शासन व्यवस्था कांग्रेस
अध्यक्ष को ही सौंपी जानी थी। यदि पटेल उस समय कांग्रेस अध्यक्ष होते तो
प्रधानमंत्री उन्हें ही बनाना पड़ता। इसीलिए गांधीजी ने दबाव डालकर पटेल को चुनाव
से हटने और नेहरू को अध्यक्ष स्वीकार करने को बाध्य किया।
बहरहाल, जब तक नेहरूजी जिंदा रहे कांग्रेस और देश में वह
अकेली और अंतिम अथॉरिटी रहे। उनकी मृत्यु के बाद लाल बहादुर शास्त्री को
प्रधानमंत्री बनाया गया। जब लाल बहादुर शास्त्री की मृत्यु हुई उस समय कांग्रेस
में कई वरिष्ठ नेता थे परंतु इंदिरा गांधी
को प्रधानमंत्री बनाया गया। यहीं से कांग्रेस का एक परिवार की संस्था बनने का दौर
शुरू हुआ। इंदिरा गांधी ने योग्य वरिष्ठ नेताओं के होते हुए भी कांग्रेस में अपना
ऐसा गुट बना लिया था कि उनके मुकाबले में कोई सामने न आ सके। इसके लिए उन्होंने कुछ
वरिष्ठ नेताओं को भी अपने प्रभाव में ले रखा था। इसके बाद की कहानी सबके सामने है
कि किस तरह इंदिरा गांधी के बाद संजय गांधी की पर्दे के पीछे की सरकार रही और
इंदिराजी की हत्या के बाद किस तरह राजीव गांधी को प्रधानमंत्री बनाया गया। उनकी
हत्या के बाद कांग्रेस को बहुत मिला तो आवाज उठी की सोनिया गांधी को प्रधानमंत्री
बनाया जाए परंतु पार्टी के अंदर और बाहर उनके विदेशी होने को लेकर विवाद के कारण
यह संभव नहीं हुआ। उसके बाद से कांग्रेस ने कई बार केंद्र में शासन किया। पहले
नरसिंह राव और बाद में मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री रहे परंतु शासन की डोर सोनिया
गांधी के हाथ में रही। अब राहुल गांधी देश के भावी प्रधानमंत्री हैं और प्रियंका
में लोग इंदिरा गांधी की छवि देख रहे हैं।
कई बार यह सवाल उठता है कि जब कांग्रेस में
इंदिराजी के मुकाबले में मोरारजी देसाई, गुलजारी लाल नंदा, कामराज, देवकांत बरूआ जैसे वरिष्ठ और अनुभवी नेता थे तब जनता ने इंदिरा गांधी को ही
क्यों पसंद किया। इनमें से देवकांत बरूआ ने तो बाद में कांग्रेस डी की स्थापना की
परंतु उनका राजनीतिक जीवन ही समाप्त हो गया। मोरारजी देसाई 1977 में जनता पार्टी
की जीत के बाद बड़े विवाद के बाद ही प्रधानमंत्री बन पाये। कामराज तो इंदिराजी के
साथ ही रहे। हेमवती नंदन बहुगुणा और कमलापति त्रिपाठी के साथ ही जगजीवन राम जैसे
नेता हमेशा हाशिये पर रखे गये। इनमें से कुछ का कांग्रेस से अलग होने पर इन्हें
जनता का समर्थन नहीं मिलना इस बात का प्रमाण है कि जनता राजभक्ति वाली मानसिकता को
छोड़ने को तैयार नहीं थी क्योंकि वह लोकतंत्र का वास्तविक अर्थ जानती ही नहीं थी।
यही वजह है कि नारायण दत्त तिवारी, अर्जुन सिंह, शरद पवार जैसे बड़े नेता कांग्रेस से अलग होकर
महत्वहीन हो गये और फिर से कांग्रेस में लौटने को मजबूर हुए। भारतीय राजनीति में
वंशवाद और राजशाही के साथ ही गुलाम मानसिकता का इससे बड़ा प्रमाण मिलना मुश्किल
है।
गैर कांग्रेसी दलों की भूमिका
आज़ादी से पहले ही एक तरफ कांग्रेस के अंदर ही
समाजवादी नेताओं का एक गुट था तो दूसरी तरफ वामपंथी दल आकार लेने का प्रयास कर रहे
थे। हिंदू महासभा पहले से मौजूद थी और वामपंथी दल भी आकार लेने की कोशिश कर रहे
थे। देश में पहला आम चुनाव 1952 में हुआ। इतिहासकार रामचंद्र गुहा का मत है कि जिस
देश को आजाद हुए केवल पाँच साल हुए हों, जहाँ सदियों से राजशाही रही हो और जहाँ शिक्षित
जनता केवल 20 प्रतिशत हो वहाँ सबको मताधिकार प्राप्त होना बड़ी बात थी। इसमें कोई शक नहीं
कि यह मताधिकार एक बड़ी उपलब्धि थी परंतु केवल मताधिकार मिलने से लोकतंत्र पूर्ण
नहीं हो जाता। यह भी देखना चाहिए कि लोग इस मताधिकार का प्रयोग किस तरह करते हैं। 1951-52 के आम चुनाव में जनता ने नेहरू को वोट दिया, किसी विचार या कार्यक्रम को
नहीं। उस समय यह सब प्रासंगिक था भी नहीं। सामने कोई सशक्त विपक्ष भी नहीं था।
आचार्य जे बी कृपलानी कांग्रेस में समाजवादी विचारधारा वाले गुट का नेतृत्व करते
थे। 1950 के कांग्रेस अध्यक्ष के चुनाव में वह कांग्रेस के हिंदूवादी गुट के नेता
पुरूषोत्तम दास टंडन के मुकाबले हार गये जबकि कृपलानी को नेहरू का समर्थन प्राप्त
था। कृपलानी ने कांग्रेस छोड़ दी और किसान मजदूर प्रजा पार्टी की स्थापना की। जय
प्रकाश नारायण की सोशलिस्ट पार्टी उन दिनों तेजी से उभर रही थी। कांग्रेस से
त्यागपत्र देकर श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने जनसंघ की स्थापना की और चुनाव में
दावेदारी की। कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया श्रीपाद अमृत डांगे के नेतृत्व में
मैदान में थी। भीमराव अम्बेडकर ने भी कांग्रेस छोड़ कर शिड्यूल कास्ट फेडरेशन बनाया
जो बाद में रिपब्लिकन पार्टी बना। अम्बेडकर और आचार्य कृपलानी चुनाव हार गये।
कांग्रेस ने लोकसभा और विधानसभाओं में प्रचंड बहुमत प्राप्त किया। लोकतंत्र का एक
अध्याय पूरा हुआ परंतु इसे लोकतंत्र का साकार होना नहीं माना जा सकता था। सरदार
पटेल की मृत्यु के बाद कांग्रेस में नेहरूजी के लिए कोई चुनौती नहीं बची थी। यही
कारण था कि 1950 के पार्टी चुनाव में उनके समर्थित आचार्य कृपलानी को हराने के बाद भी पुरूषोत्तम
दास टंडन को नेहरूजी के विरोध और पार्टी में चलते मदभेदों के कारण पद से त्यागपत्र
देना पड़ा। इसे उस समय बहुत गंभीरता से नहीं लिया गया परंतु यह कांग्रेस में आंतरिक
लोकतंत्र के समाप्त होने का एक और पड़ाव था। कांग्रेस के एक व्यक्ति पर केंद्रित
होने की यह शुरूआत आगे चल कर कांग्रेस का ही चरित्र नहीं बनी, अन्य दलों का चरित्र भी बन गयी। इस चरित्र से समाजवादी दल, जनसंघ और कम्युनिष्ट पार्टी बचे रहे परंतु भारतीय मानस में व्यक्ति पूजा इतनी
गहरी रची-बसी थी कि उसे मिटाना किसी भी दल के लिए संभव नहीं हुआ।
Wednesday, May 15, 2019
विकास की बहार है
यहाँ-वहाँ, जहाँ-तहाँ
है विकास की बहार, पर तुझको क्यों
दिखाई देता नहीं मेरे यार। रीतिकाल
होता तो कोई कवि कहता ‘कोठिन में बंगलन में, दफ्तरन
में नेतन में बगरो बिकास है।‘ पर
यह रीतिकाल नहीं है, वीरगाथा काल है।
वीरों का हो कैसा बसंत नहीं, वीरों
का हो कैसा चुनाव का वक्त है। यकीन न हो तो बंगाल में देख लीजिए, साक्षात
दंगल है। और ज्यादा देखना हो तो सोशल मीडिया पर टहल आइये, तबीयत
झक्क न हो जाए तो कहियेगा। एक से बढ़कर एक शब्द-वीर तीर चला रहे हैं। चुनाव आयोग का
डर न होता तो उसे ही असली अखाड़ा बना देते। फिर भी ऐसे वीरों की कमी नहीं जिन्होंने
अपने-अपने पक्ष की जीत का ऐलान शुरू कर दिया है, भले
ही गिनती बाकी है। मुगालता पालना सबका लोकतांत्रिक अधिकार है।
चुनाव आयोग की सख्ती के चलते चुनाव प्रचार
पर अब प्रत्याशियों द्वारा प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष खर्च में कमी आयी है। पहले की
तरह दिन-रात कान फोडू आवाजों से तो राहत मिल ही गयी है। चुनाव के दौरान ध्वनि
प्रदूषण कम हो गया है परंतु इस बार बौद्धिक प्रदूषण बढ़ गया। जब से सोशल मीडिया आया
है हर कोई पत्रकार बन गया है और विश्लेषक भी। जिसे देखो वही या तो खुद लोगों को यह
समझाने पर आमादा है कि कौन सही है और कौन गलत या फिर दूसरों के समझाये में अपनी
समझदानी लेकर घुस गया। इसके या उसके पक्ष या विपक्ष में जैसी लतरानी सोशल मीडिया
पर देखने को मिल रही है उसके बारे में कुछ भी कहना दीपक को सूरज दिखाने जैसा होगा।
पुराना समय होता तो किसी प्रत्याशी के कार्यालय में बैठे समोसा-शरबत पर देश का
भविष्य तय कर रहे होते। पर इस बार तो कार्यालय देखने को भी नहीं मिल रहे।
इधर चुनाव आयोग का डंडा चल रहा है और खूब
चल रहा है। मतदाताओं की सेवा के लिए लाया गया कोई 3400 करोड़ का माल पकड़ा गया। जो
नहीं पकड़ा गया उसका कोई हिसाब नहीं है। वैसे भी कहते हैं कि जो पकड़ा गया वही चोर
है। लालू पकड़े गये तो जेल में हैं वर्ना बोफोर्स से लेकर राफेल तक, 2जी
से लेकर एजी ओजी सुनोजी तक सब मजे में हैं। लोग फैनी से खैनी तक पता नहीं किस-किस
को कोस रहे हैं।
कोई शेयर बाजार की चाल को लेकर परेशान है।
विकास की दर कम होने का अलग रोना है। इस देश की यही खासियत है। लोग हमेशा रोते
रहते हैं। उन्हें विकास वहाँ नहीं दिखता जहाँ वह हो रहा होता है। इस बार चुनाव लड़
रहे हमारे सांसदों की संपत्ति 41 प्रतिशत बढ़ गयी। क्या उनका विकास देश का विकास
नहीं है? माना कि देश का बजट
गड़बड़ा रहा है, महंगाई बढ़ गयी है पर
विकास तो हुआ ना? अब
जहाँ वह हो सकता था वहाँ हुआ। सीलमपुर की झुग्गी भला वसंतकुंज की कोठी कैसे बन
सकती है? सोचने वाली बात है।
पर नहीं, हम नहीं सोचेंगे।
फेसबुकियाई लोगों को तो बस नेताओं के बयान ही दिख रहे हैं। भाजपा के 361 और
कांग्रेस के 348 करोड़पति प्रत्याशी नहीं दिख रहे। देश का चुनाव अब करोड़पतियों का
चुनाव होता जा रहा है। क्या यह विकास नहीं
है? कई बार मुझे समझ में
नहीं आता कि लोग आखिर चाहते क्या हैं? क्या वो चाहते हैं
कि आज भी प्रत्याशी 1952 की तरह साइकिल पर घूमकर प्रचार करें?
देश इतना विकास कर चुका है तो क्या नेता
नहीं करेंगे? अंत में एक शेर
अर्ज़ किया है
हर तरफ विकास की बहार है अब दोस्तों
राजनीति भी तो व्यापार है अब दोस्तों।
15-5-2019
Sunday, May 5, 2019
हिंदी में खोजी पत्रकारिता का दौर INVESTIGATIVE JOURNALISM IN HINDI
डॉ. वेद प्रकाश भारद्वाज
हिंदी पत्रकारिता में दैनिक समाचार पत्रों के साथ
ही साप्ताहिक, पाक्षिक व मासिक पत्रिकाओं का भी अत्यधिक महत्व रहा है। एक समय था जब इस तरह
की पत्रिकाओं को दैनिक पत्रों का अगला चरण माना जाता था क्योंकि उनमें समाचार नहीं
होते थे बल्कि समाचारों पर आधारित वैचारिक लेख हुआ करते थे। शुरूआत में इन
पत्रिकाओं का केंद्र विचार ही होता था पर एक समय ऐसा भी आया जब कुछ साप्ताहिक
पत्रिकाओं ने विचार के साथ ही समाचार को अपनी विशेषता बना लिया। यह दौर था 1980 के दशक का। उससे पहले से ब्लीट्ज जैसे साप्ताहिक अखबार खबरों पर आधारित थे, खासतौर पर भंडाफोड़ खबरों पर, जिनमें से ज्यादातर आधारहीन भी होती थीं। हिंदी
पत्रकारिता में इस भंडाफोड़ पत्रकारिता के मुकाबले में खोजी पत्रकारिता की शुरूआत
इसी 80 के दशक में हुई। कोलकाता से प्रकाशित साप्ताहिक पत्रिका रविवार इस दिशा में
एक सार्थक पहल कही जा सकती है। सुरेंद्र प्रताप सिंह, जो स्वयं एक रिपोर्टर थे, जब इसके संपादक नियुक्त हुए तो उन्होंने उसे एक ऐसी
पत्रिका में बदल दिया जो उस समय सबसे ज्यादा पसंद की जाने लगी थी। यहाँ तक कि उसकी
तर्ज पर माया जैसी पत्रिका ने अपना कलेवर बदला और कुछ नये साप्ताहिक अखबार
अस्तित्व में आये जो खोजी पत्रकारिता के आधार स्तंभ बने। चौथी दुनिया ऐसा ही एक
अखबार था। यहाँ तक कि दिनमान जैसी पत्रिका, जो अपने अलग वैचारिक और राजनीतिक विश्लेषण के लिए
जानी जाती थी, वह भी खोजी पत्रकारिता का हिस्सा बनी।
रविवार के पहले अंक मई 1977 से ही सुरेंद्र प्रताप
सिंह पत्रिका से सहायक संपादक के रूप में जुड़ चुके थे और अक्टूबर 1977 में उसके
संपादक भी बना दिये गये। यह वह समय था जब देश आपातकाल के अंधेरे से निकल कर नये
उजाले की तरफ बढ़ने को तैयार था। ऐसे समय में रविवार का प्रकाशन शुरू होना हिंदी
पत्रकारिता में नयी सुबह आने जैसा था। कुछ ही समय में उसने अपनी रिपोर्टां और
वैचारिक लेखों से हिंदी क्षेत्र में अपनी विशेष पहचान बना ली। और इसका श्रेय
सुरेंद्र प्रताप सिहं को ही दिया जा सकता था जो ‘एसपी’ के नाम से अधिक संबोधित किये जाते थे। बाद में जब वह नवभारत टाइम्स के संपादक
बने तो रविवार के संपादक उदयन शर्मा बने। संतोष भारती भी रविवार में रिपोर्टिंग
किया करते थे जो आगे चलकर चौथी दुनिया के संपादक हुए और उन्होंने रविवार वाली
पत्रकारिता को चौथी दुनिया में आगे बढ़ाया। बहरहाल, हम बात करें रविवार की तो यह
शायद पहली ऐसी पत्रिका थी जिसने ऐसी खोजी पत्रकारिता की नींव रखी जिसमें सनसनी
नहीं बल्कि तथ्यपरक गंभीर सूचना व विश्लेषण होता था। इस पत्रिका में छपी रपटों ने
कई नेताओं के राजनीतिक जीवन को ही समाप्त कर दिया। ऐसे ही एक नेता थे मध्यप्रदेश
विधानसभा के अध्यक्ष यज्ञदŸा शर्मा। उनके भूमि कब्जाने संबंधित भ्रष्टाचार को लेकर एक रिपोर्ट रविवार में
छपने के बाद हंगामा हो गया। मध्यप्रदेश सरकार ने रविवार के उस अंक की बिक्री पर
रोक लगा दी और उसकी प्रतियाँ जब्त कर ली गयीं। इसके बाद भी इस खबर को लेकर इतना
हंगामा हुआ कि यज्ञदत्त शर्मा को पद से त्यागपत्र देना पड़ा और उनका राजनीतिक जीवन
समाप्त हो गया। उन दिनों मैं इंदौर में रहता था जहाँ से यज्ञदत्त शर्मा विधायक थे।
मुझे याद है कि उस समय लोगों ने रविवार के उस अंक को खोज-खोज कर पढ़ा था। उसके बाद
तो कई और नेताओं के काले कारनामों का खुलासा हुआ।
सुरेंद्र प्रताप सिंह
रविवार सिर्फ अपनी खोजी पत्रकारिता के लिए ही नहीं
जाना गया बल्कि विश्लेषणात्मक समाचारों के लिए भी प्रतिष्ठित हुआ। कलकत्ता (अब
कोलकाता) से प्रकाशित इस पत्रिका ने एक तरफ जहाँ बिहार के कोयला माफिया पर सामग्री
प्रकाशित की वहीं पश्चिम बंगाल में वामपंथी श्रमिक संगठनों की आये दिन होने वाली
हड़ताल के कारण हजारों फैक्ट्रियों के बंद होने से फैली बेरोजगारी को लेकर भी आवाज
बुलंद की। इसके साथ ही उस समय के कद्दावर नेता लगातार उसके निशाने पर रहे। इसका
अर्थ यह नहीं कि रविवार सिर्फ खोजी पत्रकारिता को ही जगह देता था। उसमें साहित्य, फिल्म आदि के साथ ही समाज में हो रही सकारात्मक चीजों के लिए भी जगह होती थी।
फिल्म को लेकर तो उसने विशेषांक भी निकाले। समानांतर सिनेमा को लेकर भी उसने कई
बार लेख प्रकाशित किये।
रविवार की ही तरह इलाहाबाद से मित्र प्रकाशन की
पत्रिका माया थी जो राजनीतिक पत्रकारिता की दिशा में अच्छा काम कर रही थी। 1980 के दशक में खोजी और जनपक्षधर पत्रकारिता की दृष्टि से इन दोनों पत्रिकाओं का
महŸवपूर्ण स्थान था। माया में लगातार ऐसी रपट प्रकाशित होती रहती थीं जो राजनीतिक
और प्रशासनिक भ्रष्टाचार का खुलासा करती रहती थीं। इन पत्रिकाओं की लोकप्रियता ने
दैनिक समाचार पत्रों में खोजी पत्रकारिता को बढ़ावा दिया। अनेक छोटी स्थानीय
पत्रिकाओं को भी इससे नयी दिशा मिली।
इसी दौर में साप्ताहिक अखबार चौथी दुनिया का
प्रकाशन शुरू हुआ जिसके संपादक संतोष भारतीय थे। चौथी दुनिया ने खोजी और वैचारिक
पत्रकारिता को आगे बढ़ाते हुए अनेक ऐसी खबरें प्रकाशित कीं जो चर्चित रहीं। ऐसी ही
एक रपट जैन मुनियों को लेकर थी जिसे लेकर काफी हंगामा हुआ। इस बीच विश्वनाथ प्रताप
सिंह कांग्रेस को छोड़कर अलग हुए और गैर कांग्रेसी विकल्प की बात फिर होने लगी। उस
समय भाजपा अपना आधार बनाने के लिए संघर्ष कर रही थी। उस समय वीपी सिंह के साथ खड़े
होने वालों में ज्यादातर समाजवादी दल थे। ‘राजा नहीं फकीर है, भारत की तकदीर है’ नारा उन दिनों गूँज रहा था।
1990 आते-आते भारतीय राजनीति नई करवट लेने लगी थी। उस
परिवर्तन के दौर में खोजी पत्रकारिता को आगे बढ़ने का मौका मिला। उसी दौर में
दिल्ली से रिलायंस घराने ने संडे ऑबजर्वर नाम से हिंदी और अंग्रेजी में साप्ताहिक
अखबार शुरू किये। एक और अखबार ‘संडे मेल’ के नाम से सामने आया। दिनमान को पत्रिका से बदल कर
साप्ताहिक अखबार का रूप दे दिया गया और नाम रखा गया ‘दिनमान टाइम्स’। इंडिया टूडे का अंग्रेजी में प्रकाशन 1975 से भी शुरू हो चुका था, बाद में
इसका हिंदी संस्करण शुरू हुआ। वीपी सिंह के अभ्युदय के साथ ही भारतीय राजनीति ने
करवट ली। भाजपा को जनाधार मिला और उसकी स्थिति ऐसी हो गयी कि वह निर्णायक ताकत बन
गयी। राजनीतिक स्थितियों में परिवर्तन का असर पत्रकारिता पर भी हुआ, खासकर साप्ताहिक पत्रिकाओं और अखबारों पर। हालांकि वीपी सिंह के सत्ता में आने
के बाद भी जमीनी स्थिति में बहुत फर्क नहीं आया था। गरीबी, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार जैसी स्थितियाँ यथावत थीं। दूसरी तरफ रामजन्म भूमि का मामला जोर
पकड़ रहा था, फिर भी पत्रकारिता में एक तरह का ठहराव आ गया। उसका विरोधी स्वर बंद नहीं हुआ
पर पहले जैसा धारदार भी नहीं रहा। पत्रकारिता भी एक तरह से दो खेमों में बंटी नज़र
आने लगी, एक कांग्रेस के पक्ष में तो दूसरी उसके विरोधियों के पक्ष में।
1990 का दशक एक तरफ नयी राजनीतिक धाराओं के जन्म का समय था तो दूसरी तरफ खोजी
पत्रकारिता की विदाई की बेला भी था। 1991 में राजीव गांधी की हत्या के बाद कांग्रेस की सत्ता
में वापसी, अर्थव्यवस्था का उदारीकरण, जनता दल की टूट, विपक्ष से जनता का मोहभंग कुछ ऐसे कारण रहे जो
पत्रकारिता में बदलाव का कारण बने। नयी उदार आर्थिक नीतियों का विरोध तो खूब हो
रहा था पर उस विरोध का कोई असर लोगों में देखने को नहीं मिल रहा था। पत्रकारिता
में जनता के पक्ष से आवाज़ उठ रही थी पर लगता था जैसे वह कुंद हो गयी है। इसी दौर
में धर्मयुग और साप्ताहिक हिंदुस्तान के साथ ही सारिका, माधुरी आदि पत्रिकाओं का प्रकाशन बंद हुआ। दिनमान टाइम्स भी ज्यादा दिन नहीं
चल सका। रविवार और माया बंद हो गयीं। चौथी दुनिया का प्रकाशन बंद हो गया। इनके साथ
ही ऐसी तमाम छोटी पत्रिकाएँ भी दम तोड़ गयीं जो खोजी और वैचारिक पत्रकारिता का आधार
थीं। संडे ऑबजर्वर और संडे मेल भी बाद में बंद हो गए। इस तरह 1990 का दशक खोजी और विचार प्रधान पत्रकारिता की विदाई का दशक साबित हुआ।
इस दौर में इंडिया टूडे एकमात्र पत्रिका रही जिसने
पत्रिकाओं के संसार को बचाये रखने का काम किया। यह अलग बात है कि उसमें न तो
रविवार वाली बात थी और न ही माया वाली। इंडिया टूडे 1975 से अंग्रेजी में प्रकाशित हो रही थी परंतु उसका हिंदी संस्करण बाद में शुरू
हुआ। यही नहीं उसका हिंदी संस्करण अंग्रेजी संस्करण का अनुवाद ही होता था। 1995 में आउटलुक का अंग्रेजी और हिंदी में प्रकाशन शुरू हुआ। अंग्रेजी में तो अनेक
पत्रिकाएँ प्रकाशित होती रहीं हैं परंतु हिंदी में पत्रिकाओं का संसार लगातार
सिकुड़ता गया है। वैसे आज हजारों पत्रिकाएँ निकल रही हैं परंतु उनमें से ज्यादातर
तो केवल नाम के लिए प्रकाशित हो रही हैं या फिर किसी खास राजनीतिक मकसद से
प्रकाशित हो रही हैं। उनके लिए जनता की पत्रकारिता का कोई अस्तित्व नहीं है। आज
अनेक पत्रिकाएँ राजनीतिक दलों द्वारा अप्रत्यक्ष रूप से पोषित हैं। इसीलिए वह जनता
के बीच अपनी कोई छाप नहीं बना पा रही हैं।
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