Sunday, April 28, 2019

दलबदल का दलदल



डॉ. वेद प्रकाश भारद्वाज


भारतीय राजनीति में दलबदल कोई नयी घटना नहीं है। हाल ही में चुनावों की घोषणा के बाद हमने देखा है कि कई प्रमुख नेता एक पार्टी छोड़ कर दूसरी में चले गये। आज कांग्रेस ने किसी भाजपा नेता को तोड़ा तो कल भाजपा ने किसी कांग्रेसी नेता को अपना सदस्य व उम्मीदवार बना लिया। आया राम-गया रामका यह खेल बहुत समय से चल रहा है। शुरूआती दौर में कांग्रेस से नाराज नेताओं ने अपनी पार्टी बनायी पर बाद में पार्टी बनाने की बजाय दूसरी पार्टी में शामिल होना शुरू कर दिया। मजेदार बात तो यह है कि कई बार यह तक पता नहीं चलता कि कौन नेता किस पार्टी में है। हाल ही में भाजपा छोड़कर कांग्रेस में शामिल हुए शत्रुघ्न सिन्हा का तो मामला और भी अजीब है। वह कांग्रेस में शामिल हो गये हैं जबकि उनकी पत्नी पूनम सिन्हा सपा के टिकट पर लखनऊ से चुनाव लड़ रही हैं। उनके बच्चे किस पार्टी में जाएंगे इसकी चर्चा होने लगी है। आज कोई अपने घर लौट रहा है तो कोई दम घुटने की शिकायत कर दूसरे के बगीचे में विचरने चला गया है।

हरियाणा के विधायक गया लाल

आया राम-गया रामके इस खेल में सबसे बड़ा खिलाड़ी भजनलाल को माना जाता था। 1977 में जब जनता पार्टी सत्ता में आयी तो भजनलाल उसका हिस्सा थे। 1979 में वह हरियाणा में अपनी ही पार्टी की देवीलाल की सरकार को गिराकर मुख्यमंत्री बने। पर उससे बड़ा कारनामा उन्होंने 1980 में इंदिरा गांधी के फिर से सत्ता में आने पर किया। वह अपने मंत्रियों सहित 40 विधायकों को लेकर कांग्रेस में शामिल हो गये। सरकार की पार्टी का झंडा बदला बाकी सब वही रहे, मुख्यमंत्री से लेकर मंत्री तक। भारतीय राजनीति के इतिहास की यह अद्भुत घटना थी। उस समय भजनलाल के साथ एक विधायक गया लाल भी थे जिनके नाम के आधार पर आया राम-गया रामजुमला बना। भजनलाल यदि दल-बदल के खेल के सुपर स्टार थे तो गया लाल सदाबहार थे।


                                भजनलाल

इस आया राम-गया रामको लेकर भी गया लाल के नाम ही रिकार्ड दर्ज है जिन्होंने मात्र नौ घंटे में तीन बार पार्टी बदली थी। 1967 में हरियाणा में कांग्रेस से टूटकर कुछ विधायकों ने विशाल हरियाणा पार्टी बनायी और दक्षिण हरियाणा के एक प्रमुख नेता राव बिरेंद्र सिंह के नेतृत्व में युनाइटेड फ्रंट बनाकर सरकार बनायी। उस समय फरीदाबाद क्षेत्र के हसनपुर विधानसभा से विधायक निर्दलीय गया लाल थे। बताया जाता है कि वह पहले कांग्रेस में शामिल हुए फिर कुछ ही घंटों में युनाइटेड फ्रंट में शामिल हुए और फिर तत्काल वहां से कांग्रेस में गये। पर खेल अभी बाकि था। कुछ ही घंटों में वह फिर युनाइटेड फ्रंट में लौट आये। तक राव बिरेंद्र सिंह ने कहा था गया राम अब आया राम हो गये हैं। 

दलबदल के रिकॉर्डधारी नागमणि

वैसे सबसे अधिक पार्टियाँ बदलने का इतिहास यदि लिखा जाएगा तो उसमें बिहार के एक नेता नागमणि का होगा जो अपने राजनीतिक जीवन में बीसियों बार पार्टी बदलने का काम कर चुके हैं। यहाँ तक कि वह एक ही पार्टी में कई बार आये और गये।  नागमणि के नाम 2014 तक के बीस साल के राजनीतिक जीवन में तेरह बार पार्टी बदलने का रिकार्ड दर्ज हुआ था। उसके बाद भी उन्होंने कई बार पार्टी बदली। भाजपा में उनका कई बार आना-जाना हुआ। हाल ही में वह राष्ट्रीय लोक समता पार्टी (रालोसपा) को छोड़कर जदयू में शामिल हो गये। कम से कम बिहार में ऐसी कोई प्रमुख पार्टी नहीं है जिसमें वह रहे न हों। शायद वामपंथी पार्टियाँ ही हैं जिनका दामन उन्होंने कभी थामा न हो। 

इसी प्रकार की एक घटना उत्तर प्रदेश के इतिहास में भी दर्ज है जब 1997 में भाजपा और बसपा की संयुक्त सरकार से बसपा ने समर्थन वापस ले लिया था। उस समय कल्याण सिंह मुख्यमंत्री थे। तब भाजपा ने बसपा और कांग्रेस को तोड़कर अपना बहुमत साबित किया था। उस समय भाजपा पर विरोधी दलों के विधायकों को खरीदने का आरोप लगा था जिसके प्रमाण में यह कहा गया था कि दलबदल कर आये सभी विधायकों को मंत्री बना दिया गया था। उत्तराखंड में भी 2016 में दलबदल का खेल खेलने की कोशिश की गयी थी पर उसमें भाजपा को सफलता नहीं मिली। कर्नाटक में चाहे वह कांग्रेस हो या भाजपा या कोई और दल, सभी सत्ता पाने के लिए दलबदल का खेल खेलते रहे हैं। स्थिर सरकार के नारे के साथ झारखंड में 2014 में सत्ता में आयी भाजपा की अल्पमत सरकार की स्थिरता का कारण भी दलबदल ही है। उसी समय भाजपा ने झारखंड विकास मोर्चा का विभाजन करा कर उसके छह विधायकों को अलग दल के रूप में विधानसभा में मान्यता दिलायी और अपना बहुमत साबित किया। तब से लेकर फरवरी 2019 तक यह तय नहीं हो पाया कि उक्त छह विधायकों का जाना पार्टी का विभाजन है या दल बदल। उन विधायकों का कहना था कि उन्होंने पार्टी का भाजपा में विलय कर दिया है। फरवरी 2019 में विधानसभा अध्यक्ष के निर्णय के बाद उसे विभाजन मान लिया गया।

इसी तरह का राजनीतिक नाटक खेलने की कोशिश कर्नाटक में 2018 के विधानसभा चुनाव में किसी को बहुमत न मिलने पर भाजपा ने की। केंद्र में सत्तासीन भाजपा ने येदुरप्पा को मुख्यमंत्री तो बनवा तो लिया पर आवश्यक बहुमत न होने पर कुर्सी छोड़नी पड़ी। उसने कांग्रेस व जदएस के विधायकों को तोड़ने की कोशिश की पर कामयाबी नहीं मिली। कोर्ट में यह मामला गया तो वहाँ कोर्ट ने भाजपा के इस तर्क को नकार दिया कि शपथ लेने के पहले तक चुने गये विधायकों पर दलबदल कानून लागू नहीं होता। 

गोवा में भी भाजपा ने इसी प्रकार अपनी सरकार बनायी थी। 2017 के विधानसभा चुनाव में 40 सीटों में से भाजपा को 13, कांग्रेस को 17 सीटें मिली थीं। जब केंद्र में सत्तासीन भाजपा के मनोहर पर्रिकर मुख्यमंत्री बने। महाराष्ट्रवादी गोमांतक पार्टी सहित कुछ निर्दलियों के सहयोग से बहुमत साबित किया गया। उस समय कांग्रेस ने भाजपा पर विधायकों की खरीद-फरोख्त का आरोप लगाया था।
भारतीय राजनीति में दलबदल के दलदल के यह कुछ बड़े उदाहरण हैं। इनके अलावा आये दिन नेताओं का एक पार्टी को छोड़ कर दूसरी में आना-जाना लगा रहता है। इसका कारण कभी टिकट नहीं मिलना होता है तो कभी लाभ का पद न मिलना। निष्ठाओं को कपड़ों की तरह बदलने की इस राजनीति का ही परिणाम है कि अब किसी भी दल को शुद्ध या आदर्श नहीं कहा जा सकता। इसके बाद भी ऐसे नेता चुनाव जीतने में सफल हो जाते हैं, यह कम आश्चर्य की बात नहीं है। कल तक भाजपा की तारीफ और कांग्रेस की आलोचना करने वाले शत्रुघ्न सिन्हा आज कांग्रेस की तारीफ और भाजपा की आलोचना कर रहे हैं। वह तो मात्र एक उदाहरण हैं। भारतीय राजनीति में ऐसे-ऐसे आया राम- गया राममौजूद हैं कि उनके बारे में सुनकर दाँतों तले अंगुली दबानी पड़ती है।

1 comment:

  1. सर आप जैसे जानकार हमारे पास है ये हमारे लिए गौरव की बात है।

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