Friday, April 12, 2019

भंड़ाफोड़ पत्रकारिता यानी मीडिया का नया चेहरा

हिंदी पत्रकारिता : कल आज और कल-2


भंड़ाफोड़ पत्रकारिता यानी मीडिया का नया चेहरा

वेद प्रकाश भारद्वाज

आज से चार दशक पहले मुंबई से एक टेबलाइट अखबार छपता था ब्लीट्ज। उसकी विशेषता थी भंडाफोड़ खबरें छापना। कहा जाता था कि उन खबरों की आड़ में उसके मालिक नेताओं व अन्य प्रभावशाली लोगों को ब्लैकमेल किया करते थे। इसमें कितना सच था और कितना झूठ कहना मुश्किल है। पर यह भी सत्य है कि उसकी तर्ज पर देश के कई अन्य शहरों से वैसे ही अखबार निकलते थे। इंदौर से ऐसा ही एक अखबार स्पूतनिक निकलता था। उस समय पत्रकारिता में ब्लीट्ज या उस जैसे अखबारों की कोई प्रतिष्ठा थी, ऐसा नहीं कहा जा सकता। मनोहर कहानियाँऔर सत्यकथाजैसी पत्रिकाएँ इसका प्रमाण रही हैं। आज भी इस तरह की तमाम पत्रिकाएँ आपको बाजार में मिल जाएँगीं, अलबत्ता अब उनके स्तर को लेकर सवाल खड़े किये जा सकते हैं। मनोहर कहानियाँऔर सत्यकथाकी कहानियाँ सच्ची अपराध घटनाओं पर आधारित होती थीं परंतु उनमें कहानीपन भी होता था। इसके विपरीत आज की ऐसी पत्रिकाओं को देखें तो उनमें कहानी कहीं नहीं होती, केवल घटनाओं का विवरण होता है, यानी वह दैनिक अखबार में किसी एक आपराधिक घटना की छपी खबरों का संकलन मात्र होता है। सनसनीखेज पत्रकारिता की वह पीढ़ी बहुत पहले दम तोड़ चुकी थी जिसे टीवी चैनलों ने फिर से जिंदा कर दिया है।
इस सनसनीखेज पत्रकारिता और खबरों को दर्शकों पर किसी बम की तरह गिराने की शुरूआत 1990 के खाड़ी युद्ध से समय सीएनएन ने की थी जिसने दुनियाभर में लोगों को इराक पर हमले की धमाकेदार और रौशन कवरेज दिखाई और यह प्रमाणित किया कि आने वाला समय छवियों का होगा शब्दों का नहीं। यही वह समय था जब भूमंडलीकरण का वास्तविक चेहरा आकार लेने लगा था। भारत में हम देख सकते हैं कि किस तरह विदेशी भुगतान संतुलन से निपटने के लिए सरकार को विश्व बैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष के निर्देशानुसार अपनी आर्थिक नीतियों को बदलना पड़ा।
खाड़ी युद्ध की लाइव कवरेज ने मीडिया को एक नये चेहरे के साथ सामने लाया। आकर्षक, कौतुहल और संहार के सौंदर्य की गाथा के रूप में।  मीडिया के चरित्र में परिवर्तन का यह प्रस्थान बिंदु कहा जा सकता है। यह एक नये विश्व के निर्माण का दौर था, भूमंडलीकरण का दौर जिसमें पूरी दुनिया एक गांव में बदल दी जाने वाली थी पर उसमें भी अलग-अलग देश उसी प्रकार का व्यवहार करने वाले थे जैसे किसी भारतीय गांव में अलग-अलग जातियों के बीच होता है। यह एक नया विश्व होने वाला था परंतु एक ही मामले में कि इसमें सब कुछ तकनीक के प्रभाव में होगा और कहीं से भी किसी भी जगह को या लोगों को नियंत्रित-निर्देशित किया जा सकेगा। जिसमें लोग छवियों के इतने आदि हो जाएंगे कि भाषा दोयम हो जाएगी। छवियाँ लोगों को सोचने का अवसर नहीं देतीं। एक छवि को देखते हुए हम सोचना शुरू ही करते हैं कि दूसरी छवि सामने आ जाती है। निरंतर चंचल छवियों का यह संसार मनुष्य को सोचने से रोकता है।
भाषा और भाषाई पत्रकारिता अखबार व पत्रिकाएँ लोगों को सोचने का अवसर देती थीं, इससे पाठक निर्णायक की भूमिका में आने की संभावना रखता था। मीडिया ऐसा नहीं चाहता। मीडिया यानी बड़े बहुराष्ट्रीय या देशी अखबार व टीवी चैनल। ऐसे पाठक या दर्शक जो खुद सोचें-विचारें और कोई निष्कर्ष निकालें, उनके लिए खतरा हैं, उनके आकाओं के लिए खतरा हैं और उनके लिए भी जो इस नई दुनिया के आका हैं या बनने की दौड़ में शामिल हैं। कोई उनपर विचार न कर सके, उनके पर्दे के पीछे के खेल को जान न सके इसके लिए मीडिया को एक भौचक और अवाक पाठक व दर्शक ही अभिष्ठ है। इसलिए मीडिया पर लगातार ऐसा कुछ किया जाता रहता है जिससे पाठक व दर्शक सोचने की अवस्था में ही नहीं रहे। उसे डराया जाता है स्थितियों की भयावहता से जिससे ज्यादातर लोग उन भयावह स्थितियों से खुद को मुक्त देखकर कल की आशंकाओं के बीच आज की निश्चिंता को जी नहीं पाता। एक मरा हुआ या मरे जैसा दर्शक व पाठक। यह दर्शक या पाठक किसी कार में जलते हुए व्यक्ति को बचाने की बजाय उसका वीडियो बनाता है या फोटो खींचता है फिर उसे सोशल मीडिया पर डालता है। वह सड़क के किनारे पड़े घायल को अस्पताल ले जाने की बजाय उसका वीडियो बनाता है। सोशल मीडिया ने हर उस व्यक्ति को पत्रकार होने का भ्रम दे दिया है जिसके हाथ में स्मार्ट फोन है। ऐसे लोग टीवी और अखबारों के लिए आदर्श उपभोक्ता हैं।

आज के सभी मीडिया ऐसे ही लोगों को ध्यान में रखकर काम कर रहे हैं। यानी ऐसे लोगों को ध्यान में रखकर जो अपने विवेक का कम से कम इस्तेमाल करते हैं और मीडिया के दिखाये रास्ते पर यह सोचकर चलते हैं कि ऐसा वह अपनी मर्जी से करते हैं। वह उन तमाम धारावाहिकों को देखते हैं जिन्हें देखते हुए उन्हें पता होता है कि सभी चैनलों पर इसी प्रकार के धारावाहिक चल रहे हैं। फैमेली सोप ऑपेरा अब केवल एक अवधारणा है। उसमें कुछ भी फैमेली यानी परिवार जैसा नहीं होता। उसमें वही सब होता है, धोखाधड़ी, विश्वासधात, बदनीयती, हत्या, छल-कपट आदि सब जो पहले फिल्मों में देखते आये हैं। महाभारत के बारे में कहा जाता है कि उसमें जो कुछ लिखा गया है वह सब दुनिया में है या होता है। और यह भी कि दुनिया में ऐसा कुछ नहीं होता जो उसमें वर्णित नहीं है। इसीलिए यह कहा जाता था कि महाभारत को घर में नहीं रखना चाहिए क्योंकि वह घर में कलह का कारण बनती है। पर आज टीवी के पर्दे से महाभारत रोज घरों में आ रही है। घारावाहिकों के माध्यम से आ रही है, समाचार चैनलों पर होने वाली बहसों के रूप में आ रही है। यह है आज के मीडिया का चेहरा।

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