JOURNALIST VED PRAKASH BHARDWAJ SHARING HIS VIEWS ON SOCIAL ISSUES, LITERATURE, ART, AND POLITICS. पत्रकार वेद प्रकाश भारद्वाज के सामाजिक, साहित्य, कला, राजनीति आदि पर विचार
Sunday, April 28, 2019
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Saturday, April 6, 2019
एक कुर्ता-पायजामा का आत्मकथ्य
एक कुर्ते-पायजामे का आत्मकथ्य
वेद प्रकाश भारद्वाज
हे पाठकों, आज मैं अपनी अंतरात्मा की आवाज़ की बात मानते हुए आपको एक कुर्ते-पायजामे का आत्मकथ्य सुना रहा हूँ। जब उस कुर्ते-पायजामे ने अपना आत्मकथ्य सुनाया था तो यह कसम ली थी कि मैं किसी को यह बताऊँगा नहीं। मैंने बताता भी नहीं पर आज ही मैंने गाना सुना 'कस्में वादे प्यार वफ़ा सब बातें हैं बातों का क्या'; इसे सुनते ही मेरी अंतरात्मा पुकार उठी, इतनी सच्ची बात सुनकर भी तेरी अक़्ल के कपाट बंद हैं। क़समें तो होती ही तोड़ने के लिए हैं। क्या तूने अपने देश के कर्णधारों से आज तक कुछ नहीं सीखा? जनता कहती है 'वादा न तोड़' पर नेता हैं कि एक ही अंतरा दोहराते रहते हैं 'भूल गया सब कुछ, याद नहीं अब कुछ' । इससे आगे उन्हें कुछ याद नहीं आता। आत्मा ने मुझे लताड़ते हुए कहा, क्या तू अपने आप को नेताओं से बड़ा समझता है? फिर बात जब लोकहित की हो तो उसका उजागर होना ही उचित है। इसलिए क़सम को तोड़ और कह दे जो कुछ सुना है। अतः हे पाठकों, अपनी आत्मा की पुकार काम दुत्कार अधिक सुनकर और लोकहित को ध्यान में रखकर उस कुर्ते-पायजामे का आत्मकथ्य आपको सुनाता हूँ।
मैं एक कुर्ता-पायजामा हूँ। एकदम नया-नकोर, क्रीज तक नहीं बिगड़ी है। एक समय था जब मैं शोरूम में रखा-रखा इंतज़ार करता था कि कब कोई आएगा और मुझे मेरे होने का मान देगा। मैं खादी का कुर्ता सफेद झक्क, सुनहरे डिब्बे में बंद, इंतज़ार में। और वह दिन भी आया जब शहर के एक प्रतिष्ठानवत नेता ने मुझे चुन ही लिया। वैसे तो मुझे कोई पहनता, क्या फ़र्क पड़ना था। आख़िर को पहना ही तो जाना था। पर कई बार इसका महत्व ज़्यादा होता है कि पहन कौन रहा है। कपड़े की कीमत उसको पहनने वाले से भी आंकी जाती है। कबीर की झीनी झीनी चदरिया का जमाना नहीं है अब। अब कोई फ़िल्मी हीरोइन झीनी झीनी पहने हो तो फैशन है। फटी जींस मजदूर पहने तो ग़रीबी है, मालिक पहने तो फ़ैशन। मैं एक अदद कुर्ता-पायजामा ही तो हूँ। मैं अधिक से अधिक हिंदू, मुसलमान, अगड़ा-पिछड़ा, सवर्ण-दलित मतदाताओं की तरह सिल्क का, खादी का, फॉर्मल या पार्टी-वियर के रूप में अलग- अलग पहचाना जा सकता हूँ। पर हूँ तो कुर्ता-पायजामा ही। पर जब नेताजी ने मुझे पसन्द किया तो मैं खुशी के मारे फ़ूला नहीं समाया। लगा कि इतने दिन के इंतज़ार का मीठा फल मिल गया है। मैं अपने सीने का चौड़ा करके देखता, जनता के सामने समाज व देश की सेवा का बखान करते समय मैं कितना फैलूँगा। मेरी बाजू हवा में लहराने को बेताब थे। सभा की तैयारी करने लगे थे। चुनाव की इस बेला में मुझे अपना अलबेला नायक मिल गया था। मेरी आशाओं की जेबों में आश्वासनों की चिल्लर अभी से खनकने लगी थी। वादों की गड्डियाँ भी खरखराने लगी थीं। मेरे बाजुओं में घोषणाएँ फड़कने लगी थीं। मेरा अलबेला नायक मुझे बड़े प्यार से देखता और फिर अलमारी में रख देता। ख़ास नामांकन वाले दिन के लिए उसने मेरे एक भाई को भी लाकर मेरी बगल में रख दिया था। खानदानी नेता थे। लम्बा अनुभव था राजनीति का। कई बार चुनाव भी लड़ चुके थे। इसबार तो दिल्ली का टिकट मिलना तय था।
हाईकमान से उनके बड़े हाई रिश्ते थे। मुझपर हाथ फेरते हुए उन्होंने कहा था, यह उस दिन पहनूँगा जिस दिन हाईकमान के साथ जनसभा करूँगा। उनका यह सोचना मुझे एक नई दुनिया में ले गया। मैंने अपनी बगल में लेते कुर्ता-पायजामा की तरह ऐसे देखा जैसे सेठजी की कोठी पिछवाड़े बनी मज़दूरों की झोपड़ियों को देखती है। मैं सातवें आसमान पर था।
मेरे आका ने पूरी तैयारी कर ली थी। पोस्टर-बैनर डिजाइन हो गए थे। चेलो-चपाटियों को तैयार रहने को कह दिया था। टोपियाँ तैयार थीं, बस पहनने की देर थी। सारा माहौल बसन्ती-बसन्ती हो रहा था। मन में आशाओं के नए कोपल फूटने लगे थे। दिल्ली में मीटिंगों का दौर चल रहा था। नेताजी वहाँ डेरा जमाए हुए थे। इधर उनके चमचे माहौल बनाने में लगे थे, उधर वह सेटिंग ठीक करने में। रह गया मैं अलमारी में। मैं तो सपनों की दुनिया में खोया हुआ था। हम कुर्ता-पायजामा की जात में ऐसा अवसर सबको नहीं मिल पाता जो मुझे मिलने वाला था।
सब कुछ ठीक-ठाक चल रहा था। सारी गोटियाँ सही जगह फिट थीं। पता नहीं कहाँ चूक हो गई। हाई कमान ने हाई वोल्ट का झटका दे दिया। दो दिन पहले ही तो नेताजी राजधानी से लौटे थे, टिकट पक्की करके। इधर आते ही उन्होंने कहाँ-कहाँ कार्यालय होगा, किसके जिम्मे कौन सा काम होगा, सब प्लान कर लिया था। शाम को हाईकमान उम्मीदवारों की सूची जारी करने वाले थे। नेताजी के विरोधी पस्त थे, नेताजी मस्त थे।
अचानक सब कुछ बदल गया। लगा जैसे लहलहाते खेत में बनैले जानवर घुस आए हों। एक ही झटके में सब कुछ रौन्द गए। नेताजी का टिकट जो सौ प्रतिशत से अधिक पक्का था पता नहीं कैसे कच्चा पड़ गया। उनके विरोधी के बंजर खेत मैं अचानक बहार आ गई। नेताजी का टिकट कट गया, विरोधी को मिल गया। दोपहर तक जो कार्यकर्ता उनकी चिलम भर रहे थे अब दूसरे का हुक्का गुड़गुड़ा रहे थे। कोठी के बाहर लगा शामियाना गायब हो गया था। कुर्सियाँ लद चुकी थीं। सड़क के उसपर आ जमे चाय-समोसे के ठेले नए ठीये की तलाश में निकल चुके थे।
मैं अलमारी में बंद कहकहों की बस्ती में अचानक आ पसरे सिसकियों के सन्नाटे को महसूस करने लगा। भरी-पूरी अलमारी में अचानक खुद को अकेला अनुभव करने लगा। नेताजी को उनके परमानेंट चमचे दिलासा दे रहे थे। बोतल के सहारे गम गलत किया जा रहा था। मैं एक अदद कुर्ता-पायजामा अलमारी में अपने टूटते हुए सपनों को देख रहा था। थोड़ी देर पहले तक मैं खुद को दुनिया का सबसे भाग्यशाली कुर्ता-पायजामा समझ रहा था। अपने वीवीआईपी स्टेट्स पर फ़िदा था। अब कहीं कुछ नहीं बचा। बचा है तो बस अगले चुनाव तक का इंतज़ार।


