वेद प्रकाश भारद्वाज
व्यंग्य
धत्त तेरी की, सारी कवायद बेकार गयी।
कोलकाता से लखनऊ वाया दिल्ली क्या-क्या न किया, किस-किस को चाचा-ताऊ, मामा, बहनजी, भइया न कहा, पर हुआ वही ढाक के पात तीन। बहुत कोशिश की पर सुर मिल ही नहीं पाये। पहले
बुआ-भतीजे ने अपना गाना अलग कंपोज कर लिया। साफ कह दिया कि हम अपने गाने में किसी
और को शामिल नहीं करेंगे। संगीत भी हमारा होगा, गीत भी हमारा और आवाज भी हमारी। बड़ी बुआ ताकती रह
गयी, बबुआ मन मसोस कर रह
गया तो उसने भी बहनजी को मंच पर उतार दिया। अब सुनो हमारा अलग सुर। उधर दीदी ने
कोलकाता में किसी को अपनी मंडली में गाने का मौका देने से मना कर दिया। उन्हें
अपना मंच बचाना है। आप के बाप केजरीवाल ने कोशिश की कि कम से कम दिल्ली में सुर
संगम हो जाए, पर कोढ़ में खाज की स्थिति बन गयी। काँग्रेस ने न हाँ करी न ना करी, केजरी ने केसरी बनते हुए
अपने गायकों की सूची जारी कर दी। अब उसका सुर अलग है। काँग्रेस का अलग। उधर चंद्र
बाबू की संगीत मंडली अपने ही मंच पर संकट में घिर गयी है। साजिंदे मिल नहीं रहे।
जिनसे उम्मीद थी वह अपनी अलग आर्केस्ट्रा पार्टी लेकर आ गये हैं।
कितनी उम्मीद भी, विपक्ष का एक सुर होगा तो इस बार आम चुनाव की अंताक्षरी में उनकी जीत तय होगी।
पर यहाँ तो जूतियां में दाल बँटने की नौबत आ गयी है। जो गलबहियाँ डालने को आगे बढ़े
थे वही एक-दूसरे का गला दबाने लगे। एक ने सुर छेड़ा तो दूसरा सुर मिलाने की जगह
पगुराने लगा है। वो भी क्या दिन थे जब दागी सांसदों-विधायकों पर खतरा आया तो क्या
पक्ष क्या विपक्ष, सबने एक सुर में ऐसा राग छेड़ा था कि सुप्रिम कोर्ट की भी बोलती बंद हो गयी थी।
वो ‘मिले सुर
मेरा-तुम्हारा’ अब क्या हुआ?
कैसे-कैसे अरमान बाँधे थे। सब एक होकर ऐसी तान छोड़ेंगे कि सामने वाले की बोलती
बंद हो जाएगी। पर यहाँ तो अब अपनी ही बोलती बंद होने की स्थिति आ गयी है। यूपी में
तीन राग हैं, बिहार में दो, दिल्ली में तीन- हर कोई बजा रहा है अपनी-अपनी बीन। साजिंदों में भगदड़ मची है।
हर मंड़ली दूसरे की मंड़ली से साजिंदे तोड़ कर लाने की जुगत में लगी है। क्या ऐसे
हराएँगे मोदी को? महा गठबंधन बनने से पहले ही महा भंजन बन गया है। जिसे देखो अपनी-अपनी ढफली
अपना-अपना राग की नीति पर चल रहा है। एक उŸार में जा रहा है तो दूसरा दक्षिण की तरफ रूख किये हुए है;
तीसरा ठिठका खड़ा है। समझ में
नहीं पा रहा है कि इधर जाऊँ या उधर जाऊँ।
कल तक जिसके सुर के आगे सारे सुर फीके रहते थे वही आज जगह-जगह दूसरों के सहारे
सुर साधने की कोशिश कर रहा है। कल तक सुपर हिट थे आज एक हिट के लिए दूसरों का मुँह
ताकना पड़ रहा है। अपने गीत में दूसरे की कव्वाली मिलाने को तैयार हैं पर कोई सुर
मिलाने को तैयार नहीं। जो सुर मिला रहे हैं वह साथ में आँखें भी दिखा रहे हैं।
क्या बुरे दिन आ गये हैं। मुख्य गायक को कोरस की भीड़ का हिस्सा बनना पड़ रहा है। हर
कोई सुर से सुर मिलाकर महागान की जरूरत घोषित करता है फिर भी कहता है कि मिले न
सुर मेरा-तुम्हारा। इधर श्रोता कभी इसकी तरफ देखते हैं कभी उसकी तरफ। किसी का सुर
पकड़ में नहीं आ रहा।
It's a beautiful piece..
ReplyDeletecheers
बेहतरीन व्यंग sir jeee
ReplyDeletebahut hi sateek bayang
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