Sunday, March 24, 2019

हिंदी पत्रकारिता : कल आज और कल-1



वेद प्रकाश भारद्वाज

अपनी पैतीस साल की पत्रकार और लेखक के जीवन में बहुत कुछ देखा और बहुत कुछ सीखा भी। मैंने पत्रकारिता का वह दौर भी देखा जब वह विचार और नैतिकता से संपन्न रही। गंदगी उस समय नहीं थी ऐसा नहीं कहा जा सकता। परंतु इतना जरूर है कि उस समय पत्रकारिता के नाम पर गलत काम करने वालों को न तो पत्रकारिता जगत में सम्मान मिलता था और न ही समाज में। मेरे अनुभव कोई बहुत मूल्यवान हैं या पत्रकारिता को कोई दिशा दे सकेंगे, ऐसा मेरा कोई दावा करना उचित नहीं होगा। हां, यह अनुभव यदि किसी भी तरह पत्रकारों और पत्रकारिता के अध्येताओं के काम आ सकें तो मैं अपने कार्य को सफल मानूंगा। मेरे अनुभवों को लेखन बहुत सिलसिलेवार नहीं है। इसलिए जो बात जब याद आयी तब लिख दी गयी है। आशा है पाठकों के लिए यह कुछ उपयोगी हो सकेंगे।

अपराध और पत्रकारिता

एक समय था जब मनोहर कहानियां हिंदी की सबसे अधिक बिकने वाली पत्रिका कही जाती थी। वास्तविक आपराधिक  घटनाओं को कहानी के रूप में प्रस्तुत करने वाली  यह पत्रिका मित्र प्रकाशन द्वारा इलाहाबाद से प्रकाशित की जाती थी। बाद में इसी प्रकाशन से मनोहर कहानियांके साथ एक और पत्रिका सत्यकथाका प्रकाशन शुरू किया गया और वह भी काफी लोकप्रिय हुई। इसी प्रकाशन की एक और पत्रिका माया थी जो एक समय कहानियों की पत्रिका थी और बाद में समाचार पत्रिका में बदल दी गयी। मनोहर कहानियां व माया वैसे शुरू में हल्की-फुल्की मनोरंजक कहानियां की पत्रिकाएं थीं।

भैरव प्रसाद गुप्त को जब मनोहर कहानियां का संपादक का दायित्व दिया गया तो उन्होंने उसे गंभीर कहानियां की पत्रिका में बदल दिया। उसमें उस समय के सभी महत्वपूर्ण कहानिकारों की रचनाएं प्रकाशित होती थीं। स्वयं गुप्त जी का प्रथम उपन्यास शोले उसमें धारावाहिक प्रकाशित हुआ था। 1973 में गुप्तजी के पत्रिका से अलग होते ही इसे आपराधिक घटनाओं की कहानियां की पत्रिका बना दिया गया। 1975 के आसपास मैंने पहली बार यह पत्रिका पढ़ी थी। इसमें आपराधिक घटनाओं को एक कहानी की तरह प्रस्तुत किये जाने के कारण लोगों द्वारा पसंद किया जाता था यह अलग बात है कि आमतौर पर घरां में उसे पढ़ा नहीं जाता था, इसके बाद भी उस समय वह सबसे ज्यादा बिकने वाली पत्रिका थी। इससे यह पता चलता है कि चार दशक पहले भी सबसे ज्यादा बिकने वाला साहित्य अपराध ही था।

आज हम अखबारों और टीवी चैनलों की इस बात के लिए आलोचना करते हैं कि उन्होंने अपराधों को अधिक महत्व देकर पत्रकारिता के चरित्र को बदल दिया है। हकीकत यह है कि पहले इतने अधिक अपराध भी नहीं होते थे। फिर उस समय का सामाजिक वातावरण ऐसा था कि उसमें अपराधियों के बारे में बहुत अधिक प्रकाशित करना उचित नहीं माना जाता था। समाचार पत्र और पत्रिकाएं भी इससे परहेज करती थीं। उनकी प्राथमिकताएं अलग थीं। तब राजनीति, समाज, संस्कृति आदि पत्रकारिता के केंद्र में होते थे। आज की तरह अपराधियों का जीवन चरित्र छापना कोई पसंद नहीं करता था। नटवर लाल और हाजी मस्तान जैसे अपराधियों के बारे में विस्तार से उन दिनों मनोहर कहानियां और सत्यकथा में ही पढ़ने को मिला था, किसी समाचार पत्र या अन्य पत्रिका में नहीं। पर आज क्या हो रहा है।


आज किसी गैंगस्टर या भू-माफिया की हत्या होने पर अखबारों में उसके बारे में एक-एक बात खोज कर छापी जाती है। जैसे कि उसके पास कितनी कारें थीं, कितने मकान थे, यहां तक कि उसके अन्य स्त्रियों से अवैध संबंधों तक को छापा जाता है। उनकी गिरफ्तारी होने पर वह जेल में कैसे रहता है, क्या खाता है आदि सब छापा जाता है। उसकी जीवन-शैली को इतने आकर्षक तरीके से छापा जाता है जैसे वह कोई आदर्श हो। यही स्थिति टीवी चैनलों की है। आज टीवी के रूप में मनोहर कहानियां हमारे घरों में प्रवेश कर गयी है। पप्पू यादव बिहार के नेता हैं परंतु उनकी छवि एक अपराधी नेता की है। उनकी आत्मकथा हाल ही में छपकर आयी है। यह सब मीडिया का वह चेहरा है जिसकी कल्पना मेरी पीढ़ी के पत्रकारों में से शायद ही किसी ने की हो।

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