VIEW-WITH-VED
JOURNALIST VED PRAKASH BHARDWAJ SHARING HIS VIEWS ON SOCIAL ISSUES, LITERATURE, ART, AND POLITICS. पत्रकार वेद प्रकाश भारद्वाज के सामाजिक, साहित्य, कला, राजनीति आदि पर विचार
Thursday, December 2, 2021
education: common test for central university
Saturday, July 31, 2021
व्यंग्य: खेला होगा कि नहीं होगा
Sunday, May 16, 2021
dissatisfaction of public and our government-1 जनता में असंतोष और हमारी सरकार
Who are we? Are we citizens of this country and do we have the democratic right to question our government? I am raising this question because, on May 15, 15 people have been arrested in Delhi by filing 25 criminal cases for hang-up posters seeking answers from the Prime Minister about the vaccine. In this case, the administration says that people had problems with putting up such posters on polls.
According to the administration, people have
complained about polluting public property.
Who are these people who are so concerned about cleaning up the public
property? And where do these people go missing
when political parties and leaders fill the city walls with their posters? Where are the law and order keepers when
advertisements are pasted on government buildings, buses, etc.? Why legal action is not taken against anyone?
We know that
it is impossible to find answers to these questions. It is difficult for the
government to answer, but it is easy to crush the questions. The government always likes to do this easy task.
हम क्या हैं? क्या हम इस देश के नागरिक हैं और क्या हमें अपनी सरकार से सवाल करने का लोकतांत्रिक अधिकार है? यह सवाल मैं इसलिए उठा रहा हूं कि 15 मई को दिल्ली में प्रधानमंत्री से वैक्सीन को लेकर जवाब मांगने वाले पोस्टर लगाने पर 25 आपराधिक मामले दर्ज कर 15 लोगों को गिरफ्तार किया गया है। इस मामले में प्रशासन का कहना है कि इस तरह के पोस्टर लगाने से लोगों को परेशानी थी। प्रशासन के अनुसार लोगों ने सार्वजनिक संपत्ति को गंदा करने की शिकायत की है। यह कौन लोग हैं जिन्हें सार्वजनिक संपत्ति की सफाई की इतनी चिंता हुई है? और यह लोग उस समय कहाँ गुम हो जाते हैं जब राजनीतिक दल व नेता शहर की दीवारों को अपने पोस्टर से भर देते हैं? जब सरकारी इमारतों, बसों आदि पर विज्ञापन चिपका दिए जाते हैं तब कानून व्यवस्था के रखवाले कहाँ होते हैं? तब क्यों किसी के खिलाफ कानूनी कार्रवाई नहीं की जाती?
हम जानते हैं कि इन सवालों
के जवाब मिलना असंभव है। सरकार के लिए जवाब देना मुश्किल है पर सवालों को कुचलना आसान
है। सरकार यही आसान काम कर रही है।
Wednesday, August 26, 2020
खबर वही अंदाज नया how to write and present the news : Dr. Ved Prakash Bhardwaj
महत्वपूर्ण यह नहीं होता कि खबर क्या
है, महत्वपूर्ण होता है कि खबर की प्रस्तुति कैसी है। एक यूट्यूब चैनल पर खबर देखी
की बिहार के एक थाना क्षेत्र में प्रॉपर्टी के विवाद में दो गुटों में हाथापाई। शीर्षक
को पढ़ने के बाद खबर को देखना जरूरी नहीं रह जाता। मेरा मानना है ज्यादातर लोग इस शीर्षक
को पढ़ने के बाद खबर नहीं देखेंगे। कारण कि इसमें ऐसा कुछ नहीं है जो उन लोगों को भी
आकर्षित कर सके जो बिहार के नहीं हैं। बिहार के लोगों के लिए भी यह एक सामान्य घटना
है। चैनल मेरे एक पूर्व विद्यार्थी का है इसलिए मैंने देखा। उसे देखने के बाद पाया
कि सबको आकर्षित कर सकने वाली खबर की हत्या हो गई।
खबर देखने से पता चला कि मामला उतना
छोटा है नहीं जितना शीर्षक से लगता है। खबर यह है कि बिहार के एसकेपुरी थाना क्षेत्र
में एक मकान पर जद (यू) के एक नेता ने कब्जा कर लिया है व उसपर पार्टी का बोर्ड भी लगा दिया है। खबर यह भी है कि मकान मालिक ने दो लोगों
को मकान बेच दिया। दूसरी तरफ एक पक्ष का कहना है कि जदयू नेता ने जबरन कब्जा कर लिया
है। जब उसने विरोध किया तो उसके साथ मारपीट की गई। खबर की सच्चाई तो बाद में सामने
आएगी पर इस समय यह देख जाए कि इस एकदम स्थानीय खबर को कैसे ज्यादा से ज्यादा लोगों
की रुचि का विषय बनाया जा सकता है।
बिहार के किसी थाना क्षेत्र में प्रापर्टी
विवाद में दो गुटों में हाथापाई में दूसरे राज्यों के लोगों की कोई रुचि नहीं होगी।
मुझे लगता है कि बिहार के भी ज्यादातर लोग इसमें कोई रुचि नहीं रखेंगे। इस तरह की खबरें
अब आम हो गई हैं। बिहार ही नहीं, देश के किसी भी शहर में इस तरह की घटनाएं होती रहती
हैं। इन खबरों में स्थानीय लोगों की रुचि रहती है इसीलिए समाचार पत्रों के स्थानीय
पृष्ठ पर इन्हें छापा जाता है। किसी यूट्यूब चैनल की यह खबर नहीं हो सकती। हां, चैनल
एकदम स्थानीय स्तर पर काम कर रहा हो तो अलग बात है। परन्तु हमें यह नहीं भूलना चाहिए
कि यूट्यूब चैनल चाहे जितना भी लोकल हो, उसकी पहुंच का दायरा स्थानीय ही नहीं होता।
इसलिए उसमें खबरों को इस तरह प्रस्तुत किया जाना जरूरी है जिससे उन्हें ज्यादा से ज्यादा
लोग देखना चाहें।
अब उक्त खबर को ही देखें तो उसमें
एक ऐसी बात है जिसे रिपोर्टर और सम्पादक दोनों ने महत्व नहीं दिया। बिहार में जदयू
की सरकार है और जल्दी ही वहां विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। ऐसे में यदि कोई खबर आती
है कि जदयू के एक नेता ने किसी के मकान पर कब्जा कर वहां पार्टी का बोर्ड लगा दिया
है तो खबर बड़ी हो जाती है। यदि खबर के शीर्षक में ही जदयू नेता के कब्ज़ा करने की बात
आती है तो बिहार ही नहीं, दूसरी जगह के लोग भी खबर को देखना चाहेंगे कि कौन नेता है।
सम्भव है कि कुछ लोगों को खबर को इस तरह प्रस्तुत करना उचित न लगे पर इसमें अनुचित
कुछ नहीं है।
पत्रकारिता में खबर खोजना और लिखना
ही नहीं, उसकी प्रस्तुति भी बहुत महत्व रखती है। आज खबर को उसी तरह बेचना होता है जैसे
अन्य उत्पादन बेचे जाते हैं। यह बेचना शब्द बहुत से पत्रकारों को पसन्द नहीं आएगा परन्तु
यही सत्य है। एक पत्रकार के रूप में हम समाचार और विचार का कारोबार करते हैं। यदि हमारी
खबर कोई पढ़े ही नहीं, हमारे विचार कोई पढ़े ही नहीं तो उनका और हमारा होना व्यर्थ हो
जाएगा। फिर उक्त खबर को अलग ऐंगल से प्रस्तुत करने में कुछ गलत भी तो नहीं होगा। कारण
कि उसमें एक जदयू नेता शामिल है और उसने मकान पर पार्टी का बोर्ड लगाया है। तथ्य वही
है बस उसकी प्रस्तुति बदलने की जरूरत थी।
एक और खबर देखिए जो 25 अगस्त की एक
प्रमुख खबर है कि सोनिया गांधी फिलहाल कांग्रेस के अंतरिम अध्यक्ष बनी रहेंगी। खबर
यह है कि कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक में अध्यक्ष को लेकर कोई नया निर्णय नहीं लिया
जा सका और सोनिया गांधी को निर्णय का अंतिम अधिकार दिया गया है। इस खबर में ऐसा क्या
नया है जो किसी की जानकारी में न हो। सभी जानते हैं कि कांग्रेस में सोनिया गांधी और
उनके परिवार की इच्छा के बिना पत्ता भी नहीं हिल सकता। ऐसे में यदि सोनिया गांधी को
निर्णय का अंतिम अधिकार देने की बात कही गई है तो वह तो उनके पास पहले से है।
खबर यह हो सकती थी कि राहुल गांधी
को अध्यक्ष बनाने का इरादा रखने वाले कांग्रेस नेताओं को अभी और इंतज़ार करना होगा।
इससे भी बड़ी खबर यह होती कि पार्टी में सामूहिक नेतृत्व की बात कर रहे नेताओं का क्या
हुआ। यह साफ है कि जो खबर आई है उससे साफ है कि पार्टी में गांधी परिवार से अलग नेतृत्व
को खारिज कर दिया गया है। पार्टी में सामूहिक नेतृत्व की बात करने वाले नेताओं की हार
हुई है। मुझे यदि इस खबर का शीर्षक देना होता तो मैं लिखता 'कांग्रेस में गांधी के
अलावा कोई नहीं' या 'कांग्रेस में लोकतंत्र की मांग फिर हारी' या यह कि 'राहुल भक्तों
का इंतज़ार बढ़ा'। खबर वही रहती, बस उसको प्रस्तुत करने का तरीका बदल जाता।
Sunday, August 9, 2020
जनपक्ष कहां है
वेद प्रकाश भारद्वाज
राजनीति में दो पक्ष होते हैं, सत्ता
पक्ष और विपक्ष। आज ज्यादातर पत्रकार और अन्य बुद्धिजीवी इन्हीं दोनों पक्षों में
से किसी एक का हिस्सा हैं। एक समय था पत्रकार तीसरा पक्ष हुआ करता था जिसे जनपक्ष
कहा जाता था। आज यह तीसरा पक्ष कहीं दिखाई नहीं देता या बहुत कम दिखाई देता है।
अपने चार दशक के पत्रकारिता के जीवन में मैंने इस तीसरे पक्ष को धीरे-धीरे मरते
देखा है। आज किसी भी अखबार को या समाचार चैनल को देखिये तो वह या तो सत्ता पक्ष का
हिस्सा दिखाई देता है या फिर विपक्ष का। उसका अपना पक्ष होना तो जैसे अब कल्पना भर
है। यही कारण है कि अब जनपक्ष भी कहीं नजर नहीं आता, न
राजनीति में और न ही पत्रकारिता में। इसी का नतीजा है कि आज राजनीति अतिरेक का
शिकार है। एक समय कांग्रेस का अतिरेक था तो आज भाजपा का है। कल फिर कांग्रेस का
होगा या किसी और का होगा। पक्ष और विपक्ष की भूमिका बदलती रहेगी और जनपक्ष की
भूमिका जीवन में कम से कमतर होती चली जाएगी। सरकार और विपक्ष के समांतर जो तीसरा
कोना बनता था वह पत्रकारों और बुद्धिजीवियों के कारण ही संभव था। यह तीसरा कोना ही
लोकतंत्र को और उसमें जनपक्ष को हमेशा जीवित रखता था। यह तीसरा कोना अब समाप्त हो
गया है या लगभग समाप्त हो गया है। विरोधी विचारों की अब कहीं कोई संभावना नहीं है, न
इस पक्ष में न उस पक्ष में। विरोधी विचार खुद एक पक्ष हो सकता है, बल्कि
होता भी है पर अब वह नितांत अकेला है। उसके लिए अब पत्रकारिता में भी जगह नहीं रह
गयी है क्योंकि पत्रकारिता में उसके तीसरा पक्ष होने को नकार दिया गया है। इसीलिए
अब पत्रकारिता में भी जनपक्ष के लिए कोई जगह नहीं बची है।
Friday, July 24, 2020
बढ़ते साइबर अपराध Rising cyber-crime
वेद प्रकाश भारद्वाज
देश में साइबर अपराधों का बढ़ना, और उनमें भी आर्थिक
अपराधों का बढ़ना सचमुच चिंता की बात है। पिछले कुछ समय से जिस तेजी से साइबर अपराध
बढ़ रहे हैं वह कानून-व्यवस्था के लिए एक नया चैलेंज है। परंतु कानून-व्यवस्था से अधिक
बड़ा चैलेंज लोगों के लिए है कि वह किस प्रकार अपनी कमाई को बचा सकते हैं। देश में नोटबन्दी
के बाद सरकार ने डिजिटल लेन-देन को बढ़ावा दिया है। लोगों ने सुविधा को देखते हुए उसे
अपनाया भी है परन्तु अब जिस तरह आर्थिक साइबर अपराध बढ़ रहे हैं वह एक नई चिंताओं को
जन्म दे रहे हैं।
कोरोना संकटकाल में ऑनलाइन बैंकिंग काफी बढ़ गई है
और ऑनलाइन मार्केटिंग के साथ डिजिटल भुगतान भी। परन्तु इसी सुविधा को अब अपराधी निशाना
बना रहे हैं। आजकल अपराधी पुराने जमाने जैसे नहीं हैं। वह भी तकनीकी ज्ञान रखते हैं।
दिल्ली में हाल ही में जारी रिपोर्ट के अनुसार साइबर आर्थिक अपराध दोगुना से अधिक हो
गए हैं। सबसे ज्यादा मामले डेबिट व क्रेडिट कार्ड से जुड़े हैं। रिवार्ड पाइंट के नाम
पर, लोन के नाम पर, लिमिट बढ़ाने के नाम पर अक्सर लोगों के पास फोन आता है और देखते
ही देखते उनका बैंक खाता खाली हो जाता है। एटीएम पर कार्ड का क्लोन बनाकर या दूसरे
तकनीकी माध्यमों से चोरी हो रही है।
पिछले काफी समय से डाटा चोरी का जब तब हंगामा होता
रहा है। कुछ दिन शोर होता है फिर सब शांत हो जाता है। हकीकत तो यह है कि आपकी कोई जानकारी
अब निजी व गोपनीय नहीं रह गई है। कहीं भी, किसी भी काम से जाइए तो आपके बारे में सारी
जानकारी पहले मांगी जाती है। यहां तक कि सरकारी विभागों के शिकायत विभागों में जो डिजिटल
हो गए हैं, रजिस्ट्रेशन के समय ही बहुत सी ऐसी जानकारी मांगी जाती है जिसकी जरूरत नहीं
होती। बैकों के पास आपकी सारी जानकारी होती है। यह जानकारी साइबर अपराधियों को आसानी
से मिल जाती है। किसी स्टोर से कुछ खरीदने जाइए तो वहां भी बिल बनाते समय आपका फोन
नम्बर व ईमेल मांग लिया जाता है। इस तरह जो जगह-जगह आपकी जानकी बिखरी पड़ी होती है,
वह मार्केटिंग वालों से लेकर अपराधियों तक को मामूली शुल्क पर मिल जाती है। बाद में
यही जानकारी लोगों के साथ आर्थिक ठगी का आधार बनती है।
Rising cyber-crime
Ved Prakash Bhardwaj
The rise of cyber-crimes in the country and the
rise of economic crimes among them is indeed a matter of concern. The
increasing speed of cyber-crimes has been for some time is a new challenge for
law and order agencies. But a bigger challenge than law and order is for the
people how they can save their earnings. The government has encouraged digital
transactions after demonetization in the country. People have adopted it
because of convenience, but now, increasing financial cyber-crimes are a new
concern.
In the Corona crisis, online banking has grown
significantly and online marketing is accompanied by digital payments. But this
facility is now being targeted by criminals. Criminals are not like old age.
They also have technical knowledge. According to the recently released report
in Delhi, cyber financial crimes have more than doubled. Most of the cases are
related to debit and credit cards. In the name of a reward point, a loan, and
increasing the limit, people often get a call by cons on the name of the bank.
They have all information, including bank account numbers. The card is being cloned at ATMs or stolen by
other technical means.
There has been an uproar of data theft for a long
time. Some days there is noise, and then everything becomes quiet. The fact is
that any of your information is no longer private and confidential. Go
anywhere, for any work, buying something or for inquiry, all the basic
information about you is asked first like your mobile number, Email,
residential address, etc. Even in the complaints departments of government
departments, which have gone digital, at the time of registration, a lot of
information is sought which is not needed. Banks have all your information.
This information is easily available to cyber-criminals. When you go to buy
something from a store, your phone number and email are demanded while making
the bill there too. In this way, your life is scattered everywhere, from
marketing people to criminals, it is available at a nominal fee. Later this
information becomes the basis of financial fraud with the people.
By the way, many laws have been made to prevent
cyber-crimes. Special preparations have also been made by the police for this.
Even after this, cyber-crime is increasing, so it is a matter of concern.








