वेद प्रकाश भारद्वाज
राजनीति में दो पक्ष होते हैं, सत्ता
पक्ष और विपक्ष। आज ज्यादातर पत्रकार और अन्य बुद्धिजीवी इन्हीं दोनों पक्षों में
से किसी एक का हिस्सा हैं। एक समय था पत्रकार तीसरा पक्ष हुआ करता था जिसे जनपक्ष
कहा जाता था। आज यह तीसरा पक्ष कहीं दिखाई नहीं देता या बहुत कम दिखाई देता है।
अपने चार दशक के पत्रकारिता के जीवन में मैंने इस तीसरे पक्ष को धीरे-धीरे मरते
देखा है। आज किसी भी अखबार को या समाचार चैनल को देखिये तो वह या तो सत्ता पक्ष का
हिस्सा दिखाई देता है या फिर विपक्ष का। उसका अपना पक्ष होना तो जैसे अब कल्पना भर
है। यही कारण है कि अब जनपक्ष भी कहीं नजर नहीं आता, न
राजनीति में और न ही पत्रकारिता में। इसी का नतीजा है कि आज राजनीति अतिरेक का
शिकार है। एक समय कांग्रेस का अतिरेक था तो आज भाजपा का है। कल फिर कांग्रेस का
होगा या किसी और का होगा। पक्ष और विपक्ष की भूमिका बदलती रहेगी और जनपक्ष की
भूमिका जीवन में कम से कमतर होती चली जाएगी। सरकार और विपक्ष के समांतर जो तीसरा
कोना बनता था वह पत्रकारों और बुद्धिजीवियों के कारण ही संभव था। यह तीसरा कोना ही
लोकतंत्र को और उसमें जनपक्ष को हमेशा जीवित रखता था। यह तीसरा कोना अब समाप्त हो
गया है या लगभग समाप्त हो गया है। विरोधी विचारों की अब कहीं कोई संभावना नहीं है, न
इस पक्ष में न उस पक्ष में। विरोधी विचार खुद एक पक्ष हो सकता है, बल्कि
होता भी है पर अब वह नितांत अकेला है। उसके लिए अब पत्रकारिता में भी जगह नहीं रह
गयी है क्योंकि पत्रकारिता में उसके तीसरा पक्ष होने को नकार दिया गया है। इसीलिए
अब पत्रकारिता में भी जनपक्ष के लिए कोई जगह नहीं बची है।

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