महत्वपूर्ण यह नहीं होता कि खबर क्या
है, महत्वपूर्ण होता है कि खबर की प्रस्तुति कैसी है। एक यूट्यूब चैनल पर खबर देखी
की बिहार के एक थाना क्षेत्र में प्रॉपर्टी के विवाद में दो गुटों में हाथापाई। शीर्षक
को पढ़ने के बाद खबर को देखना जरूरी नहीं रह जाता। मेरा मानना है ज्यादातर लोग इस शीर्षक
को पढ़ने के बाद खबर नहीं देखेंगे। कारण कि इसमें ऐसा कुछ नहीं है जो उन लोगों को भी
आकर्षित कर सके जो बिहार के नहीं हैं। बिहार के लोगों के लिए भी यह एक सामान्य घटना
है। चैनल मेरे एक पूर्व विद्यार्थी का है इसलिए मैंने देखा। उसे देखने के बाद पाया
कि सबको आकर्षित कर सकने वाली खबर की हत्या हो गई।
खबर देखने से पता चला कि मामला उतना
छोटा है नहीं जितना शीर्षक से लगता है। खबर यह है कि बिहार के एसकेपुरी थाना क्षेत्र
में एक मकान पर जद (यू) के एक नेता ने कब्जा कर लिया है व उसपर पार्टी का बोर्ड भी लगा दिया है। खबर यह भी है कि मकान मालिक ने दो लोगों
को मकान बेच दिया। दूसरी तरफ एक पक्ष का कहना है कि जदयू नेता ने जबरन कब्जा कर लिया
है। जब उसने विरोध किया तो उसके साथ मारपीट की गई। खबर की सच्चाई तो बाद में सामने
आएगी पर इस समय यह देख जाए कि इस एकदम स्थानीय खबर को कैसे ज्यादा से ज्यादा लोगों
की रुचि का विषय बनाया जा सकता है।
बिहार के किसी थाना क्षेत्र में प्रापर्टी
विवाद में दो गुटों में हाथापाई में दूसरे राज्यों के लोगों की कोई रुचि नहीं होगी।
मुझे लगता है कि बिहार के भी ज्यादातर लोग इसमें कोई रुचि नहीं रखेंगे। इस तरह की खबरें
अब आम हो गई हैं। बिहार ही नहीं, देश के किसी भी शहर में इस तरह की घटनाएं होती रहती
हैं। इन खबरों में स्थानीय लोगों की रुचि रहती है इसीलिए समाचार पत्रों के स्थानीय
पृष्ठ पर इन्हें छापा जाता है। किसी यूट्यूब चैनल की यह खबर नहीं हो सकती। हां, चैनल
एकदम स्थानीय स्तर पर काम कर रहा हो तो अलग बात है। परन्तु हमें यह नहीं भूलना चाहिए
कि यूट्यूब चैनल चाहे जितना भी लोकल हो, उसकी पहुंच का दायरा स्थानीय ही नहीं होता।
इसलिए उसमें खबरों को इस तरह प्रस्तुत किया जाना जरूरी है जिससे उन्हें ज्यादा से ज्यादा
लोग देखना चाहें।
अब उक्त खबर को ही देखें तो उसमें
एक ऐसी बात है जिसे रिपोर्टर और सम्पादक दोनों ने महत्व नहीं दिया। बिहार में जदयू
की सरकार है और जल्दी ही वहां विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। ऐसे में यदि कोई खबर आती
है कि जदयू के एक नेता ने किसी के मकान पर कब्जा कर वहां पार्टी का बोर्ड लगा दिया
है तो खबर बड़ी हो जाती है। यदि खबर के शीर्षक में ही जदयू नेता के कब्ज़ा करने की बात
आती है तो बिहार ही नहीं, दूसरी जगह के लोग भी खबर को देखना चाहेंगे कि कौन नेता है।
सम्भव है कि कुछ लोगों को खबर को इस तरह प्रस्तुत करना उचित न लगे पर इसमें अनुचित
कुछ नहीं है।
पत्रकारिता में खबर खोजना और लिखना
ही नहीं, उसकी प्रस्तुति भी बहुत महत्व रखती है। आज खबर को उसी तरह बेचना होता है जैसे
अन्य उत्पादन बेचे जाते हैं। यह बेचना शब्द बहुत से पत्रकारों को पसन्द नहीं आएगा परन्तु
यही सत्य है। एक पत्रकार के रूप में हम समाचार और विचार का कारोबार करते हैं। यदि हमारी
खबर कोई पढ़े ही नहीं, हमारे विचार कोई पढ़े ही नहीं तो उनका और हमारा होना व्यर्थ हो
जाएगा। फिर उक्त खबर को अलग ऐंगल से प्रस्तुत करने में कुछ गलत भी तो नहीं होगा। कारण
कि उसमें एक जदयू नेता शामिल है और उसने मकान पर पार्टी का बोर्ड लगाया है। तथ्य वही
है बस उसकी प्रस्तुति बदलने की जरूरत थी।
एक और खबर देखिए जो 25 अगस्त की एक
प्रमुख खबर है कि सोनिया गांधी फिलहाल कांग्रेस के अंतरिम अध्यक्ष बनी रहेंगी। खबर
यह है कि कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक में अध्यक्ष को लेकर कोई नया निर्णय नहीं लिया
जा सका और सोनिया गांधी को निर्णय का अंतिम अधिकार दिया गया है। इस खबर में ऐसा क्या
नया है जो किसी की जानकारी में न हो। सभी जानते हैं कि कांग्रेस में सोनिया गांधी और
उनके परिवार की इच्छा के बिना पत्ता भी नहीं हिल सकता। ऐसे में यदि सोनिया गांधी को
निर्णय का अंतिम अधिकार देने की बात कही गई है तो वह तो उनके पास पहले से है।
खबर यह हो सकती थी कि राहुल गांधी
को अध्यक्ष बनाने का इरादा रखने वाले कांग्रेस नेताओं को अभी और इंतज़ार करना होगा।
इससे भी बड़ी खबर यह होती कि पार्टी में सामूहिक नेतृत्व की बात कर रहे नेताओं का क्या
हुआ। यह साफ है कि जो खबर आई है उससे साफ है कि पार्टी में गांधी परिवार से अलग नेतृत्व
को खारिज कर दिया गया है। पार्टी में सामूहिक नेतृत्व की बात करने वाले नेताओं की हार
हुई है। मुझे यदि इस खबर का शीर्षक देना होता तो मैं लिखता 'कांग्रेस में गांधी के
अलावा कोई नहीं' या 'कांग्रेस में लोकतंत्र की मांग फिर हारी' या यह कि 'राहुल भक्तों
का इंतज़ार बढ़ा'। खबर वही रहती, बस उसको प्रस्तुत करने का तरीका बदल जाता।



