वे लौट रहे हैं मगर......
वे लौट रहे हैं। दो महीने पहले ही वह दिल्ली, मुंबई, अहमदाबाद छोड़कर
अपने गांवों की तरफ चल दिये थे। कुछ बसों से, बहुत सारे अपने आटो लेकर तो बहुत सारे अपने बीबी-बच्चों के साथ पैदल ही।
कोरोना का डर और दो वक्त की रोटी की व्यवस्था न हो पाने की मजबूरी में वह अपने गांवों
को लौट गये थे। उस समय कितने ने ही संकल्प किया था कि अब इस महानगरीय मृग-मरिचिका
में नहीं फंसेंगे। अपने गांवों में ही रहेंगे, वहीं कुछ करेंगे। संकल्प अब टूटने लगा है। भूख आदमी को तोड़ देती है। लॉकडाउन
खुलने के बाद दिल्ली, मुंबई सहित सभी जगह
के उद्योगपति व व्यापारी परेशान हैं। उन्हें मजदूर नहीं मिल रहे। ऐसे में उन्हें
खयाल आया कि जो मजदूर लौट गये हैं उन्हें फिर लौटा लाया जाए। इसके लिए वह अब
किराया भी दे रहे हैं। शहरों में जो मजदूर मिल रहे हैं उन्हें मनमाना पैसा देने को
तैयार हैं। आज उनके पास अचानक पैसा आ गया है। अभी कोई एक महीने पहले ही दिल्ली व
नोएड़ा के उद्योगपति न्यायालय पहुंच गये थे
कि उनकी कमाई बंद है तो वह मजदूरों व कर्मचारियों को वेतन कहां से दें। न्यायालय
ने उनकी बात सुनी। अब उन लोगों के पास पैसा आ गया है। मजदूरों को देने को तैयार
हैं। पैसा कहां गया था और अचानक कहां से आ गया, कोई प्रश्न करने वाला नहीं है। देश की करीब एक तिहाई आबादी ऐसे रोजगार
में है जिसमें प्रश्न करने की कोई गुंजाइश नहीं होती। वहां प्रश्न का मतलब है
नौकरी समाप्त, चाहे वह हमेशा
प्रश्न करने वाला पत्रकार हो या शिक्षक या कोई और। इसीलिए अपने घरों को गये मजदूर
फिर लौटने लगे हैं।
इस बीच कुछ राज्य सरकारों ने अपने यहां श्रम कानूनों को बदल दिया है।
मजदूरी का समय बढ़ा दिया है और ओवर टाइम समाप्त कर दिया है। साथ ही अब किसी तरह की
कानूनी सुनवाई भी नहीं। एक मरती जा रही व्यवस्था के ताबूत में कुछ कीलें और ठोंक
दी गयी हैं। जो लौट रहे हैं वह परिवार को गांवों में ही छोड़कर आ रहे हैं। नये सिरे
से जीवन शुरू करना है। बाढ़ में गांव डूब जाने के बाद जैसे आदमी फिर से झोपड़ी बनाता
है, खेत में कुछ उगाने
की कोशिश करता है। वैसा ही कुछ यह मजदूर करेंगे। इनमें मजदूर ही नहीं, दूसरे कर्मचारी भी
शामिल हैं। कुछ काली कॉलर हैं तो कुछ सफेद कॉलर। पर कॉलर का रंग कैसा भी हो, कुल मिलाकर हैं सभी
मजदूर, कुछ कम वेतन वाले
कुछ ज्यादा वेतन वाले। कुछ शारीरिक मेहनत करते हैं कुछ दिमागी, पर मजदूर दोनों ही
हैं। हां, आपस में कभी मिलते
नहीं, एक होते नहीं। यह टूटन
ही इन्हें थोड़ी सी मुसीबत में भी तोड़ देती है। तीन महीने पहले टूटे थे। अभी भी
टूटे हुए हैं इसीलिए वापस वहीं लौटने को मजबूर हुए हैं जहां से ‘बड़े बेआबरू होकर
तेरे कूचे से हम निकले’ की तरह गये थे।
सरकार के दावे तो बहुत हैं कि उसने हजारों करोड़ रूपये खर्च किये हैं मजदूरों को गांवों में ही रोजगार देने के लिए। पिछले दिनों सरकार ने आंकड़े भी जारी किये कि बेरोजगारी दर 23 से घटकर 13 प्रतिशत रह गयी है। सरकार के दावों और आंकड़ों पर शक करने की कोई गुंजाइश नहीं है। पर यह जो मजबूर मजदूर हैं, सभी तरह के, वह आंकड़ों की भाषा को उतना नहीं समझते जिनता रोटी की भाषा समझते हैं। यही कारण है कि अब वह फिर महानगरों की भट्ठी में खुद को झोंकने लौट रहे हैं। एक बड़े अर्थशास्त्री पत्रकार ने हाल ही में एक लेख लिखा है कि गांवों में मजदूरों को रोजगार देना खरनाक होगा। उनका विकास शहरों की गलियों से निकलता है। चीन के साथ टकराव के दौरान चीनी उत्पादों के बहिष्कार के साथ ही कहा गया कि हमें आत्मनिर्भन बनना चाहिए, प्रधानमंत्री ने भी लोकल की बात कही। पर लगता है यह सब केवल कहने के लिए होता है। चीन में बड़े पैमाने से लेकर एकदम स्थानीय स्तर तक जिस तरह काम होता है उसीसे वह पूरी दुनिया को टक्कर दे पा रहा है। हमारे भगवानों की सस्ती व सुंदर प्रतिमाएं वहां बन जाती हैं, हमारे यहां नहीं। कारण, यहां आदमी मजदूरी करने के लिए है, खुद का कुछ उद्यम करने के लिए नहीं। खुद का वह कुछ कर सकता है परंतु उससे हमारे उद्योगपतियों को किसी तरह की परेशानी नहीं होनी चाहिए। इसीलिए वह लौट रहा है, फिर से उसी दुनिया में, जहां दो महीने पहले ही खुद को अजनबी और अवांछित पा रहा था। शहरों में रौनक लौट आएगी। अर्थव्यवस्था पटरी पर आ जाएगी। पर क्या मजदूर का जीवन कभी पटरी पर आ पाएगा? इंडियन एक्सप्रेस के 28 जून के अंक में प्रथम पृष्ठ पर जो रिपोर्ट छपी है उसके अनुसार बिहार के मजदूर अपने घर तो पहुंच गये परंतु वहां उनके लिए कोई काम नहीं है। इसीलिए वह फिर से शहरों की तरफ भाग रहे हैं।
वेद प्रकाश भारद्वाज


बिल्कुल सच लिखा है सर !
ReplyDeleteधन्यवाद रोहन। आपको पसन्द आया है तो आप इस ब्लॉग को फॉलो कर सकते हैं।
DeleteRight
ReplyDeleteबिल्कुल सही लिखा सर आपने, मजदूरों की यही कहानी है
ReplyDeleteDeep thought!
ReplyDeleteDeep analysis sir. Plz provide me your contact details
ReplyDeleteRegards
Dr. Vikash Singh
8981433955
Mobile no. (Rectified): 8081433955
ReplyDeleteBhout acha likhe hai apne sir apne es lockdown ma un logo ki problems ko analysis kre hai jo kahi tarah ki problems face kre hai u are too good sir 👍😊😊
ReplyDeleteबहुत अच्छा लिखा है।
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