Sunday, March 31, 2019

मिले न सुर मेरा-तुम्हारा


वेद प्रकाश भारद्वाज

व्यंग्य


त्त तेरी की, सारी कवायद बेकार गयी। कोलकाता से लखनऊ वाया दिल्ली क्या-क्या न किया, किस-किस को चाचा-ताऊ, मामा, बहनजी, भइया न कहा, पर हुआ वही ढाक के पात तीन। बहुत कोशिश की पर सुर मिल ही नहीं पाये। पहले बुआ-भतीजे ने अपना गाना अलग कंपोज कर लिया। साफ कह दिया कि हम अपने गाने में किसी और को शामिल नहीं करेंगे। संगीत भी हमारा होगा, गीत भी हमारा और आवाज भी हमारी। बड़ी बुआ ताकती रह गयी, बबुआ मन मसोस कर रह गया तो उसने भी बहनजी को मंच पर उतार दिया। अब सुनो हमारा अलग सुर। उधर दीदी ने कोलकाता में किसी को अपनी मंडली में गाने का मौका देने से मना कर दिया। उन्हें अपना मंच बचाना है। आप के बाप केजरीवाल ने कोशिश की कि कम से कम दिल्ली में सुर संगम हो जाए, पर कोढ़ में खाज की स्थिति बन गयी। काँग्रेस ने न हाँ करी न ना करी, केजरी ने केसरी बनते हुए अपने गायकों की सूची जारी कर दी। अब उसका सुर अलग है। काँग्रेस का अलग। उधर चंद्र बाबू की संगीत मंडली अपने ही मंच पर संकट में घिर गयी है। साजिंदे मिल नहीं रहे। जिनसे उम्मीद थी वह अपनी अलग आर्केस्ट्रा पार्टी लेकर आ गये हैं।

कितनी उम्मीद भी, विपक्ष का एक सुर होगा तो इस बार आम चुनाव की अंताक्षरी में उनकी जीत तय होगी। पर यहाँ तो जूतियां में दाल बँटने की नौबत आ गयी है। जो गलबहियाँ डालने को आगे बढ़े थे वही एक-दूसरे का गला दबाने लगे। एक ने सुर छेड़ा तो दूसरा सुर मिलाने की जगह पगुराने लगा है। वो भी क्या दिन थे जब दागी सांसदों-विधायकों पर खतरा आया तो क्या पक्ष क्या विपक्ष, सबने एक सुर में ऐसा राग छेड़ा था कि सुप्रिम कोर्ट की भी बोलती बंद हो गयी थी। वो मिले सुर मेरा-तुम्हाराअब क्या हुआ?

कैसे-कैसे अरमान बाँधे थे। सब एक होकर ऐसी तान छोड़ेंगे कि सामने वाले की बोलती बंद हो जाएगी। पर यहाँ तो अब अपनी ही बोलती बंद होने की स्थिति आ गयी है। यूपी में तीन राग हैं, बिहार में दो, दिल्ली में तीन- हर कोई बजा रहा है अपनी-अपनी बीन। साजिंदों में भगदड़ मची है। हर मंड़ली दूसरे की मंड़ली से साजिंदे तोड़ कर लाने की जुगत में लगी है। क्या ऐसे हराएँगे मोदी को? महा गठबंधन बनने से पहले ही महा भंजन बन गया है। जिसे देखो अपनी-अपनी ढफली अपना-अपना राग की नीति पर चल रहा है। एक उŸार में जा रहा है तो दूसरा दक्षिण की तरफ रूख किये हुए है; तीसरा ठिठका खड़ा है। समझ में नहीं पा रहा है कि इधर जाऊँ या उधर जाऊँ।


कल तक जिसके सुर के आगे सारे सुर फीके रहते थे वही आज जगह-जगह दूसरों के सहारे सुर साधने की कोशिश कर रहा है। कल तक सुपर हिट थे आज एक हिट के लिए दूसरों का मुँह ताकना पड़ रहा है। अपने गीत में दूसरे की कव्वाली मिलाने को तैयार हैं पर कोई सुर मिलाने को तैयार नहीं। जो सुर मिला रहे हैं वह साथ में आँखें भी दिखा रहे हैं। क्या बुरे दिन आ गये हैं। मुख्य गायक को कोरस की भीड़ का हिस्सा बनना पड़ रहा है। हर कोई सुर से सुर मिलाकर महागान की जरूरत घोषित करता है फिर भी कहता है कि मिले न सुर मेरा-तुम्हारा। इधर श्रोता कभी इसकी तरफ देखते हैं कभी उसकी तरफ। किसी का सुर पकड़ में नहीं आ रहा।

Sunday, March 24, 2019

हिंदी पत्रकारिता : कल आज और कल-1



वेद प्रकाश भारद्वाज

अपनी पैतीस साल की पत्रकार और लेखक के जीवन में बहुत कुछ देखा और बहुत कुछ सीखा भी। मैंने पत्रकारिता का वह दौर भी देखा जब वह विचार और नैतिकता से संपन्न रही। गंदगी उस समय नहीं थी ऐसा नहीं कहा जा सकता। परंतु इतना जरूर है कि उस समय पत्रकारिता के नाम पर गलत काम करने वालों को न तो पत्रकारिता जगत में सम्मान मिलता था और न ही समाज में। मेरे अनुभव कोई बहुत मूल्यवान हैं या पत्रकारिता को कोई दिशा दे सकेंगे, ऐसा मेरा कोई दावा करना उचित नहीं होगा। हां, यह अनुभव यदि किसी भी तरह पत्रकारों और पत्रकारिता के अध्येताओं के काम आ सकें तो मैं अपने कार्य को सफल मानूंगा। मेरे अनुभवों को लेखन बहुत सिलसिलेवार नहीं है। इसलिए जो बात जब याद आयी तब लिख दी गयी है। आशा है पाठकों के लिए यह कुछ उपयोगी हो सकेंगे।

अपराध और पत्रकारिता

एक समय था जब मनोहर कहानियां हिंदी की सबसे अधिक बिकने वाली पत्रिका कही जाती थी। वास्तविक आपराधिक  घटनाओं को कहानी के रूप में प्रस्तुत करने वाली  यह पत्रिका मित्र प्रकाशन द्वारा इलाहाबाद से प्रकाशित की जाती थी। बाद में इसी प्रकाशन से मनोहर कहानियांके साथ एक और पत्रिका सत्यकथाका प्रकाशन शुरू किया गया और वह भी काफी लोकप्रिय हुई। इसी प्रकाशन की एक और पत्रिका माया थी जो एक समय कहानियों की पत्रिका थी और बाद में समाचार पत्रिका में बदल दी गयी। मनोहर कहानियां व माया वैसे शुरू में हल्की-फुल्की मनोरंजक कहानियां की पत्रिकाएं थीं।

भैरव प्रसाद गुप्त को जब मनोहर कहानियां का संपादक का दायित्व दिया गया तो उन्होंने उसे गंभीर कहानियां की पत्रिका में बदल दिया। उसमें उस समय के सभी महत्वपूर्ण कहानिकारों की रचनाएं प्रकाशित होती थीं। स्वयं गुप्त जी का प्रथम उपन्यास शोले उसमें धारावाहिक प्रकाशित हुआ था। 1973 में गुप्तजी के पत्रिका से अलग होते ही इसे आपराधिक घटनाओं की कहानियां की पत्रिका बना दिया गया। 1975 के आसपास मैंने पहली बार यह पत्रिका पढ़ी थी। इसमें आपराधिक घटनाओं को एक कहानी की तरह प्रस्तुत किये जाने के कारण लोगों द्वारा पसंद किया जाता था यह अलग बात है कि आमतौर पर घरां में उसे पढ़ा नहीं जाता था, इसके बाद भी उस समय वह सबसे ज्यादा बिकने वाली पत्रिका थी। इससे यह पता चलता है कि चार दशक पहले भी सबसे ज्यादा बिकने वाला साहित्य अपराध ही था।

आज हम अखबारों और टीवी चैनलों की इस बात के लिए आलोचना करते हैं कि उन्होंने अपराधों को अधिक महत्व देकर पत्रकारिता के चरित्र को बदल दिया है। हकीकत यह है कि पहले इतने अधिक अपराध भी नहीं होते थे। फिर उस समय का सामाजिक वातावरण ऐसा था कि उसमें अपराधियों के बारे में बहुत अधिक प्रकाशित करना उचित नहीं माना जाता था। समाचार पत्र और पत्रिकाएं भी इससे परहेज करती थीं। उनकी प्राथमिकताएं अलग थीं। तब राजनीति, समाज, संस्कृति आदि पत्रकारिता के केंद्र में होते थे। आज की तरह अपराधियों का जीवन चरित्र छापना कोई पसंद नहीं करता था। नटवर लाल और हाजी मस्तान जैसे अपराधियों के बारे में विस्तार से उन दिनों मनोहर कहानियां और सत्यकथा में ही पढ़ने को मिला था, किसी समाचार पत्र या अन्य पत्रिका में नहीं। पर आज क्या हो रहा है।


आज किसी गैंगस्टर या भू-माफिया की हत्या होने पर अखबारों में उसके बारे में एक-एक बात खोज कर छापी जाती है। जैसे कि उसके पास कितनी कारें थीं, कितने मकान थे, यहां तक कि उसके अन्य स्त्रियों से अवैध संबंधों तक को छापा जाता है। उनकी गिरफ्तारी होने पर वह जेल में कैसे रहता है, क्या खाता है आदि सब छापा जाता है। उसकी जीवन-शैली को इतने आकर्षक तरीके से छापा जाता है जैसे वह कोई आदर्श हो। यही स्थिति टीवी चैनलों की है। आज टीवी के रूप में मनोहर कहानियां हमारे घरों में प्रवेश कर गयी है। पप्पू यादव बिहार के नेता हैं परंतु उनकी छवि एक अपराधी नेता की है। उनकी आत्मकथा हाल ही में छपकर आयी है। यह सब मीडिया का वह चेहरा है जिसकी कल्पना मेरी पीढ़ी के पत्रकारों में से शायद ही किसी ने की हो।

Tuesday, March 19, 2019

UDAYAN CARE ART WORKSHOP

Working with girls in an art workshop

ved prakash bhardwaj

It was learning for me to work with girls came from different part of India. Udayan care, a Ngo working for girls, organize that workshop under the guidance of senior artist Jai Zharotia in Delhi on 7 March 2019. Most of the girls don’t have any formal training in art but all of them are so enthusiastic and want to learn how to express their feeling by lines and colors. More than 100 girls came from all over India celebrating the girlhood. It was such a wonderful experience for me like creating something with clay. Udayan care has been constructing such a craft for the last 25 years. Dr. Kiran Modi launched it 25 years ago with the aim to facilitate financially backward girls to become independent and contribute to creating a better society. Celebrating silver jubilee this year, Udayan care organized a three-day program in Delhi from 7 to 9 March 2019.

The first day of the program was an art workshop with girls. Under the guidance of senior painter Jai Zharotia, more than a dozen artists worked with girls coming from across the country to focus on women empowerment. Along with senior painter Jai Zhrotia in the workshop, Anu Naik, Meena Deora, Shridhar Iyer, Raghuvir Akela, Sheela Khubchandani, Sanjay Roy, Sampha Sircar Das, Satish Sharma Renuka Sondhi, Kavita Nayar, Ved Prakash Bhardwaj etc. took part.
About 100 girls from all over the country participated in the workshop. The artists guided the girls in their group with basic information about art and gave them guidance in painting. Along with that, the artists themselves also create paintings.


One advantage of the workshop was that girls were less hesitant about expression through painting; they composed images in their own way collectively. Udayan Care works to provide higher education to girls. By working in such a workshop, they learn how to work in a group. 

It was also a different kind of education to work collectively for society. In most of the paintings, created by girls in the workshop was an expression of women power and her contribution to society. All artists were also created in their own style which is also great learning for participating girls.