Monday, June 25, 2018

आर्थिक युद्ध की राह पर दुनिया, world on the way to trade war



वेद प्रकाश भारद्वाज
क्या एक बार फिर दुनिया में अघोषित युद्ध की स्थिति बन रही है? यह प्रश्न अनुचित नहीं है क्योंकि जिस प्रकार से पिछले कुछ दिनों में अमेरिका ने अपनी अर्थव्यवस्था की मुश्किलों को कम करने के लिए दूसरे देशों के उत्पादों पर कर बढ़ाये हैं और उसके जवाब में यूरोपीय देशों, चीन तथा अब भारत में भी जवाबी कार्रवाई की है उससे ऐसा लगता है कि इस बार युद्ध हथियारों की जगह बाजार में लड़ा जाएगा। अमेरिका के फेडरल रिजर्व सहित कई बड़े बैंकरों ने यूरोपीय संघ, चीन और भारत के ताजा कदमों के बाद इसकी चेतावनी भी दी है। और यह सब तब हो रहा है जब अमेरिका की अगुवाई में पूरी दुनिया में मुक्त बाजार की अवधारणा को साकार करने का काम किया जा रहा है। परंतु अमेरिका की ताजा हरकतों से लगता नहीं है कि दुनिया में कभी वास्तविक अर्थों में मुक्त बाजार कायम हो पाएगा।
इस व्यापार टकराव की शुरूआत नौ मार्च को उस समय हुई तब अमेरिका ने इस्पात और एल्यूमीनियम पर क्रमशः 25 तथा 10 प्रतिशत शुल्क बढ़ाने की घोषणा की थी। इसके बाद अगले कदम के तौर पर अमेरिका ने चीन पर दबाव बनाया कि वह एक निश्चित मूल्य के अमेरिकी उत्पादों का आयात करे। उसने इसी तरह का दबाव यूरोपीय संघ के देशों पर भी बनाने की कोशिश की। नजीता यह हुआ कि यूरोपीय देशों और चीन ने जवाबी कार्रवाई करते हुए अमेरिका को कड़ा जवाब दिया। परंतु भारत ने इस मामले में निर्णय लेने में काफी समय लगा दिया। दरअसल भारत अमेरिका के साथ बातचीत के माध्यम से इस समस्या का हल निकालना चाहता था परंतु अमेरिका ने इसमें कोई रूचि नहीं दिखाई लिहाजा भारत को भी अब 29 अमेरिकी उत्पादों पर शुल्क बढ़ाने की घोषणा करनी पड़ी है। इनमें सेब, दालें, अखरोट और फास्फोरिक एसिड उत्पाद शामिल हैं। इससे 
अमेरिका द्वारा स्टील व एल्युमिनियम पर सीमा शुल्क बढ़ाने के जवाब में भारत 1600 करोड़ रूपये के अमेरिकी उत्पादों पर जवाबी शुल्क लगाने की तैयारी कर रहा है। इनमें बादाम, सेब, फास्फोरिक एसिड जैसे उत्पाद शामिल हैं। अमेरिका के शुल्क वृद्धि के कारण भारत पर करीब 24 करोड़ डॉलर का अतिरिक्त भार पड़ता और उसका व्यापार कम हो जाता। इसके जवाब में भारत को कुछ ऐसा करना ही था जिससे उसका व्यापार भुगतान संतुलन बना रहे। भारत के साथ ही अमेरिका की अधिनायकवादी व्यापार नीति के विरोध में चीन और भारत के अलावा यूरोपीय संघ के साथ ही तुर्की, जापान, कनाडा, आस्ट्रेलिया और मैक्सीको भी कूद पड़े हैं। पिछले ही दिनों रूस ने भी अमेरिका को राजनयिक क्षेत्र में चुनौती देते हुए उसकी नीतियों का विरोध किया था। चीन पर तो अमेरिका लगातार आर्थिक दबाव बना रहा है। इसका एक प्रमाण यह है कि 15 जून को अमेरिका ने 50 अर्ब डॉलर के चीनी उत्पादों पर 25 प्रतिशत आयात शुल्क लगाने की घोषणा की। इसके जवाब में चीन ने भी 50 अरब डॉलर के 659 अमेरिकी उत्पादों पर 25 प्रतिशत अतिरिक्त शुल्क लगाने की घोषणा कर दी।
बात यहीं पर खत्म नहीं हुई है। अमेरिकी सिनेट ने चीन की दूरसंचार कम्पनी जेडटीई पर फिर से पाबंदी लगा दी है और साथ ही धमकाया है कि वह उसके खिलाफ और कड़े कदम उठा सकता है। यही नहीं अब जब भारत के साथ ही कई और देश अमेरिका के खिलाफ कमर कस कर खड़े हो गये हैं तब वह नये हथियारों का इस्तेमाल करने पर उतर आया है। इनमें से एक है दुनिया के बड़े बैंकरों को अपने पक्ष में खड़ा करना। यही कारण है कि 23 जून को खबर आई कि फेडरल रिजर्व सहित दुनियाभर के केंद्रीय बैंकरों ने चेतावनी दी है कि अमेरिका के साथ चीन व यूरोपीय संघ सहित कुछ अन्य देशों का व्यापार युद्ध 2008 जैसी मंदी ला सकता है। इसके साथ ही ट्रंप ने यूरोपीय संघ से आने वाली कारों पर 20 प्रतिशत शुल्क लगाने की धमकी दी है।
हकीकत यह है कि यह अब सिर्फ व्यापार का मामला ही नहीं रह गया है। शीत युद्ध की समाप्ति के बाद से अमेरिका जिस तरह पूरी दुनिया को अपनी सामरिक और आर्थिक शक्ति से दबाने की कोशिश कर रहा है उसके दूरगामी परिणाम होंगे। अमेरिका लगातार वैश्विक व्यवस्था में अपनी तानाशाही भूमिका को मजबूत करते हुए विरोध करने वाले या उसकी बात नहीं मानने वाले देशों को धमकाने से पीछे नहीं रहता है। इसका प्रमाण यह है कि 17 जून को अपने एक वीडियो संदेश में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक तरफ दुनिया में शांति होने की बात कही वहीं जी-7 शिखर सम्मेलन में व्यापार, आतंकवाद और आव्रजन के मुद्दों पर जापान सहित अधिकतर देशों के अमेरिका के साथ एक राय न होने यानी उसकी बात न मानने के कारण ट्रंप ने जापान को नष्ट कर देने की अप्रत्यक्ष धमकी दे डाली। उन्होंने जापान के प्रधानमंत्री शिंजो आबे को धमकी दी कि यदि अमेरिका ढाई करोड़ मैक्सिको नागरिकों को जापान पहुंचा देगा तो आबे अपदस्थ हो जाएंगे। यानी अमेरिका की सीधी-सीधी धमकी है कि हमारी हां में हां मिलाओ और हमारी हर बात मानो नहीं तो आपके देश में हम राजनीतिक अस्थिरता उत्पन्न कर देंगे।
अमेरिका इस बात को जानता है आज दुनिया में उसे चुनौति देने वाली कोई सामरिक शक्ति नहीं है परंतु दुनिया पर अपना एकछत्र नियंत्रण कायम करने के लिए उसे दुनिया पर आर्थिक आधिपत्य भी जमाना होगा। और यह सब चीन, जापान व यूरोपीय संघों के मजबूत रहते संभव नहीं होगा। साथ ही तेजी से उभरती भारतीय अर्थव्यवस्था भी उसके वर्चस्व के लिए भावी चुनौति है। अमेरिका अपने लिए मौजूदा चुनौतियों के साथ ही भावी चुनौतियों को भी आकार लेने से पहले ही कुचलना चाहता है। परंतु जिस तरह से चीन व भारत के साथ ही यूरोपीय संघ और जापान जैसी आर्थिक शक्ति ने अमेरिकी अधिकारवादी प्रवृŸा को चुनौती दी है उससे उसके लिए कुछ भी कर पाना आसान नहीं होगा। यह सही है कि आज अमेरिका दुनिया की सबसे बड़ी शक्ति है परंतु उसे यह नहीं भूलना चाहिए कि यदि व्यापार युद्ध तेज होता है तो उसका सबसे ज्यादा नुकसान अमेरिका को ही होगा क्योंकि अमेरिका और उसके मित्र देश आज भारत जैसे बड़े उपभोक्ता बाजारों पर ही निर्भर हैं।

Monday, June 11, 2018

घाटे में बैंक : संशय में जनता

घाटे में बैंक : संशय में जनता
डॉ. वेद प्रकाश भारद्वाज
भारत सरकार द्वारा देश की अर्थव्यवस्था के मजबूत होने और आगे बढ़ने के दावों के बाद भी हकीकत यह है कि देश के आर्थिक आधारों में से एक बैंकिंग क्षेत्र लगातार संकट में है। यह संकट इसलिए नहीं है लोगों को उसमें विश्वास नहीं रहा और लोगों ने बैंकों में घन जमा रखना बंद कर दिया है बल्कि इसलिए है कि उनमें रखा धन अब पहले की तरह सुरक्षित नहीं रह गया है। जमीनी हकीकत यह है कि आज भी आम भारतीय नागरिक की नजर में अपनी बचत को सुरक्षित रखने और उससे ब्याज के रूप में कुछ कमाने की दृष्टि से बैंक और डाक विभाग सबसे पहली पसंद हैं, बावजदू इसके कि बैंकों में बचत पर लगातार ब्याज दरें कम हुई हैं। इसका एक बड़ा कारण यह है कि आज भी भारतीय नागरिक गैर परम्परागत बचत माध्यमों पर यकीन नहीं कर पा रहा है। ऐसे में अपनी बचत को आय का साधन बनाने के लिए उसका शेयर बाजार और म्यूचुअल फंड जैसे पूंजी बाजारों पर यकीन करना मुश्किल है। एक तो इन पूंजी बाजारों की व्यवस्था को समझ पाना उसके बूते की बात नहीं है। दूसरे इसकी अस्थिरता को नियंत्रित करने का उसके पास कोई उपाय नहीं है।
भारत में शेयर बाजार कोई नई चीज नहीं है परंतु आर्थिक उदारीकरण से पहले वह बचतकर्ताओं और छोटे निवेशकों में आज जितना लोकप्रिय नहीं था। पिछली शताब्दी में 90 के दशक में आये बूम ने पहली बार भारतीयों को अपनी पूंजी को रातों-रात बढ़ाने का रास्ता दिखाया। परन्तु जैसे ही शेयर बाजार धराशाई हुआ छोटे निवेशकों को तगड़ा झटका लगा। उसके बाद से शेयर बाजार में होने वाली उथल-पुथल की तुलना में बैंकों में कायम स्थिरता लोगों को अधिक विश्वसनीय लगती है। यही कारण है कि शेयर बाजार में लोगों की भागीदारी बढ़ने के बाद भी बैंकों के प्रति आकर्षण व विश्वसनीयता कम नहीं हुई। परंतु पिछले कुछ सालों में जिस तरह विजय माल्या, नीरव मोदी आदि के प्रकरण सामने आये हैं उससे बैंकों की साख को नुकसान पहुंचा है। ऊपर से आये दिन आने वाली उन खबरों ने आम लोगों को चिंतित कर दिया है कि क्या उनका धन बैंकों में सुरक्षित है?
पिछले कुछ समय से लगातार इस तरह की खबरें आ रही हैं कि बैंकों ने कुछ बड़े औद्योगिक घरानों को और व्यापारियों को नियमों को ताक पर रखकर कर्ज दे दिया जिसकी वापसी संभव नहीं हो पायी हैं। उद्योगपतियों और व्यापारियों को कर्ज देना बैंकों की आमदानी का एक जरिया है परंतु अब यही जरिया उसके गले की फांस बन गया है। हालिया रिपोर्टों के अनुसार देश के 21 बैंकों को विŸा वर्ष 2016.17 में 85,370 करोड़ का घाटा हुआ जबकि पिछले वर्ष इसी अवधि में इन बैंकों को 473.72 करोड़ का लाभ हुआ था। यह लाभ एक साल में ही घाटे में नहीं बदला है और न ही बैंकों ने एक ही साल में इतना कर्ज बांटा है कि उसकी वसूली न होने से घाटा हो। यह एक लंबी प्रक्रिया का नतीजा है। दरअसल बैंकों ने नियमों को ताक पर रखकर इतना अधिक कर्ज दे दिया और समय पर उसकी वसूली का प्रयास नहीं किया कि अब उसकी वापसी सपना हो गयी है। यहां तक कि कर्ज के बदले बंधक रखी गयी या जब्त की गयी सम्पिŸायों से इतना धन नहीं मिल पा रहा है कि फंसे कर्ज की भरपाई हो सके। इस संदर्भ में हम विजय माल्या की अचल सम्पिŸायों की नीलामी को देख सकते हैं। 
सवाल उठता है कि आखिर हमारी सरकार क्या कर रही है। पिछले दिनों जब पंजाब नेशनल बैंक, जिसका घाटा सबसे ज्यादा है, घोटालों के कारण चर्चा में आया था तब भी यह सवाल उठा था कि तमाम नियमों के बाद भी आखिर बैंक किसी को इतना अधिक कर्ज कैसे दे सकता है जबकि सब जानते हैं कि एक साधारण नागरिक को कर्ज लेने में कितनी परेशानियों का सामना करना पड़ता है। बैंकों द्वारा अक्सर अपने खातों में इस तरह के समायोजन किये जाते रहे हैं कि नुकसान की जगह लाभ दिखाया जा सके। पर जब लम्बे समय तक बड़े कर्जों की वापसी नहीं हो पाती है तब पता चलता है कि जिसे अभी तक लाभ बताया जा रहा था वह तो वास्तव में गंदगी को कालीन के नीचे ढंकना भर था। यदि एक व्यक्ति बैंक से कर्ज लेकर बाइक या कार खरीदता है या फिर घर खरीदता है तो समय पर कर्ज न चुकाने की स्थिति में बैंक उसे जब्त कर लेते हैं और जमानती से भी वसूली का प्रयास करते हैं। और यह सब होता है कुछ हजार से लेकर कुछ लाख तक के कर्ज के लिए। परंतु कई सौ या हजार रूपये के कर्ज की मूल रकम तो छोड़िये ब्याज की भी जमा न कराने पर भी बैंक बड़े लोगों के गिरेबान को नहीं पकड़ता। बैंकों के घाटे का एक प्रमुख कारण यदि औद्योगिक व व्यापारिक कर्ज का डूबना है तो दूसरी तरफ सरकार द्वारा समय-समय पर किसानों और अन्य लोगों के माफ किये जाने वाले कर्ज भी हैं।
अब यहां सवाल उठता है कि आम जनता का क्या होगा जो आज भी अपनी बचत को सुरक्षित रखते हुए कम वृद्धि पर संतोष रखती है और बैंकिंग व्यवस्था में पूरा यकीन रखती है। आज यदि लोग यह प्रश्न करने लगे हैं कि क्या उनका पैसा बैंकों में सुरक्षित रहेगा तो उनकी चिंता जायज है। इस बात की पूरी संभावना है कि सरकार रिजर्व बैंक के माध्यम से घाटे के गर्त में डूबे बैंकों को बचा ले परंतु क्या यह इस समस्या का सही हल होगा? माल्या और नीरव मोदी के मामलों के सामने आने के दौरान ही कई ऐसी खबरें आयीं जिनसे पता चला कि बैंकों ने कई ऐसी कंपनियों को सैकड़ों करोड़ का कर्ज दे दिया जिनके पास उतने मूल्य की परिसम्पिŸायां तक नहीं हैं। ऐसे कर्ज की वसूली कभी भी सम्भव नहीं हो सकेगी। हाल फिलहाल सरकार भले ही बैंकों को तात्कालिक संकट से उबार ले परंतु यह समस्या का ठोस और स्थाई हल नहीं होगा। बैंकों में घोटाले न हों इसके लिए कड़े नियम हैं जिनका पालन करने में कोताही बरती जाती है। सरकार को इस तरह के प्रावधान करने होंगे कि बैंकों में कर्ज देने में सक्षम अधिकारी नियमों को ताक पर रख कर मनमानी न कर सकें। साथ ही बड़े कर्जों के संदर्भ ऐसी निगरानी व्यवस्था भी बनानी होगी जिससे त्वरित कार्रवाई कर आसन्न संकट को रोका जा सके।
डॉ. वेद प्रकाश भारद्वाज
वरिष्ठ पत्रकार