समय,
समाज और पत्रकारिता
हिन्दी पत्रकारिता पर वैश्वीकरण
का प्रभाव
Impact of
globlisation on Hindi Jurnalism
डॉ. वेद प्रकाश भारद्वाज
1.
हिन्दी पत्रकारिता की दशा और दिशा पर विचार करते हुए और वैश्वीकरण
के उस पर प्रभाव का आकलन करते हुए इस बात को ध्यान में रखा जाना जरूरी है कि आज हम
जिस दुनिया में हैं उसमें कोई भी मानवीय व्यवहार ऐसा नहीं है जो दूसरे व्यवहारों से
प्रभावित न हो, बल्कि कुछ मामलों में तो वर्तमान जीवन का एक पक्ष शेष
पक्षों को नियंत्रित करने लगा है। यहां रमेश उपाध्याय की याद आना स्वाभाविक है जो भूमंडलीकरण
और उत्तर आधुनिकतावाद के यथार्थपरक विश्लेषण के लिए जाने जाते हैं। उन्होंने अपनी पुस्तक
उत्तर आधुनिकतावाद और आज का उपभोक्ता समाज में बाजार और उसके चतुर्दिक प्रभाव को बड़ी
बारीकी से विश्लेषित किया है। यह काम शंभुनाथ सिंह ने भी किया है। उन्होंने अपनी पुस्तक
संस्कृति की उत्तरकथा में उत्तर आधुनिकतावाद और उसके सांस्कृतिक प्रभाव को ही नहीं
बल्कि उसके सामाजिक एवं राजनीतिक प्रभाव को भी सामने रखा है। इस तरह हम पाते हैं कि
भूमंडलीकरण या वैश्वीकरण का प्रभाव हमारे जीवन के सभी पक्षों पर पड़ रहा है जिसमें मीडिया
भी शामिल है। इसका सबसे अधिक असर हिन्दी पत्रकारिता पर हुआ है जिसमें समाचार पत्र-पत्रिकाएं
तो शामिल हैं हीं, टीवी चैनल, इंटरनेट
और सोशल मीडिया भी शामिल है। कुछ लोगों के लिए इंटरनेट और सोशल मीडिया को हिन्दी पत्रकारिता
में शामिल किया जाना संभव है कि अनुचित लगे परन्तु यहां स्पष्ट कर दूं कि आज इंटरनेट
और सोशल मीडिया पर हिन्दी में काफी काम हो रहा है। फेसबुक, व्हाटसएप, ट्वीटर, ब्लॉग आदि का हिन्दीकरण तेजी से हो रहा है। इंटरनेट
पर सर्च इंजन पर भी हिन्दी और अन्य भारतीय भाषाओं में काम करने की सुविधा तेजी से आगे
बढ़ रही है। यह सब वैश्वीकरण के साथ शुरू हुए माध्यम हैं जिनका असर पारम्परिक समाचार
पत्रों व पत्रिकाओं पर भी हुआ है। इसे समझने के लिए एक ही उदाहरण काफी होगा और वो है
सूचनाओं की वैधता का सवाल। सोशल मीडिया पर बहुत सारी ऐसी सूचनाएं परोस दी जाती हैं
जिनकी सत्यता संदिग्ध होती है और कई बार तो वे पूर्ण असत्य होती हैं फिर भी लोग उन्हें
साझा करते हैं, बगैर इस बात पर विचार किये कि उस खबर या सूचना में कोई
सच्चाई है या नहीं। इसी तरह का चरित्र अब टीवी चैनलों का है जो खबर की सत्यता को एक
निरर्थक प्रश्न मानते हैं। अखबारों ने भी अब खबरों की सच्चाई से यह कहकर दामन छुड़ाना
शुरू कर दिया है कि उनका काम केवल सूचना देना है उसकी सच्चाई को परखना नहीं जबकि एक
समय था कि अखबार में या पत्रिका में प्रकाशित हर सूचना के सच्ची होने का यकीन होता
था। लोग यह मानकर चलते थे कि कोई खबर या जानकारी यदि अखबार में छपी है तो उसमें सच्चाई
तो होगी ही। बाद में यही स्थिति खबरिया टीवी चैनलों की रही। यानी कि किसी समय पत्रकारिता
की जो सामाजिक प्रतिबद्धता और जिम्मेदारी होती थी वह अब अवांछित तत्व है। ठीक उसी तरह
जिस तरह वैश्वीकरण के चलते अमेरिका और उसके नेतृत्व वाली संस्थाओं के निर्देश पर सरकारों
ने अपनी सामाजिक जिम्मेदारियों से किनारा करना शुरू कर दिया है या उनकी प्राथमिकता
को कम महत्वपूर्ण मान लिया है। जो लोग यह मानकर चल रहे थे कि आर्थिक उदारीकरण के कारण
बनने वाली वैश्विक स्थिति का लाभ सभी को मिलेगा उनके लिए यह एक निराशाजनक स्थिति हो
सकती है। इस वैश्विक बाजार में हर किसी को अपने स्तर पर अपनी कोशिशों से अपना अस्तित्व
बनाना-बचना होगा, फिर चाहे वह सरकार हो, सरकार द्वारा पोषित सामाजिक-सांस्कृतिक संस्थाएं हों
या पत्रकारिता जगत।
2.
हिन्दी पत्रकारिता में पाठकों का मनोरंजन करना शुरू से एक महत्पवूर्ण
पक्ष रहा है। जब देश में टीवी का प्रचलन सब जगह नहीं था तब अखबारों के रवीवारीय परिशिष्ठ
और पत्रिकाएं मनोरंजन का साधन थीं। साहित्य तब भी बहुसंख्यक लोगों के मानसिक सामर्थ्य
से बाहर हुआ करता था। फिल्में मनोरंजन का साधन थी परन्तु उन्हें बहुत गंभरता से नहीं
लिया जाता था। हां समानान्तर सिनेमा ने जरूर अपनी गंभीर पहचान बनायी थी। 1990 से पहले तक दैनिक अखबारों के अलावा साप्ताहिक अखबार
व पत्रिकाएं जीवन का अनिवार्य हिस्सा हुआ करती थीं। भूमंडलीकरण की आंधी ने सबसे पहले
इन साप्ताहिकों व पत्रिकाओं को उखाड़ फेंका। उसके बाद टीवी की तेज गतिशील छवियों ने
अखबारों को अपनी बौद्धिक व शिथिल गंभीर छवि के आवरण से बाहर आने को मजबूर किया। पत्रकारिता
चतुर, चपल और सुंदरता की ऐसी दुनिया में प्रवेश कर गयी जहां
अर्थ का आग्रह तो बढ़ा परन्तु केवल मौद्रिक अर्थ का, मानकों और मूल्यों का नहीं। 1990 के दशक में
विज्ञापन पाने के लिए अखबारों ने अपनी मुद्रण तकनीक को ही नहीं बदला बल्कि अपनी प्रकाश्य
सामग्री और आग्रहों को भी बदल दिया। अखबारों में सम्पादकों से अधिक प्रभावी विज्ञापन
मैनेजर होने लगे। कुछ अखबारों ने तो सम्पादक की अनिवार्यता को ही नकारते हुए किसी को
भी सम्पादक के पद पर बैठा देने का चलन शुरू कर दिया।
हिन्दी समाचार पत्र जगत में पंजाब में आतंकवाद के खिलाफ जान
की बाजी लगाने के लिए पंजाब केसरी का हमेशा सम्मान किया जाएगा परन्तु यह भी तथ्य है
कि अपनी लोकप्रियता के बावजूद उसे कभी बहुत गंभीर अखबार नहीं माना गया। दिल्ली में
पंजाब केसरी आमतौर पर निचले तबके का अखबार रहा जिसके पहले पृष्ठ पर सिने तारिकाओं की
तस्वीरें छपा करती थीं या दूसरे किस्से कहानी आदि। पर भूमंडलीकरण के शुरूआती दौर में
ही कई अखबारों ने पंजाब केसरी के प्रथम पृष्ठ को अपना अंतिम पृष्ठ बना लिया और कुछ
ने तो उसके चरित्र को ही आत्मसात कर लिया। नवभारत टाइम्स ने अपने परिशिष्ठों को बंद
कर दिया। साहित्य और संस्कृति लोकप्रिय प्रचलनों की भेंट चढ़ा दिये गये। सहारा ने भी
हस्तक्षेप व उमंग जैसे परिशिष्ठों से जो अपनी गंभीर पहचान बनायी थी उन्हें या तो बंद
कर दिया या धारहीन बना दिया। यही स्थिति कमोबेश क्षेत्रीय अखबारों में हुई। नई दुनिया, भास्कर, राजस्थान
पत्रिका, अमर उजाला आदि में प्रतिबद्ध पत्रकारिता जैसे दीवार
पर लटकी पुरानी फोटो हो गये। कल तक पाठकों में अखबारों की जो गरिमामय उपस्थिति थी वह
धीरे-धीरे धूमिल होने लगी। पाठकों के लिए अखबार ठीक उसकी तरह बनती-बिगड़ती खबरों का
माध्यम हो गया जैसे टीवी चैनल हैं कि खबर आयी और गयी, उसके बाद कुछ नहीं। जबकि पहले अखबार खबर के जाने के
बाद यानी उसके छपने के कई दिन बाद तक उसके प्रभावों पर नजर रखते थे और जरूरी होने पर
खबरों को एक वैचारिक प्रवाह में बदल देते थे। वह एक ऐसा बौद्धिक आहार था जो मानव मेधा
को हमेशा तरोताजा और सजग रखता था। वह पौष्टिक खाने की तरह था जंक फूड या फास्ट फूड
की तरह नहीं कि उसका शारीरिक विकास में कोई योगदान न हो पाए। पर वैश्वीकरण के प्रभाव
में हिन्दी पत्रकारिता भी फास्ट फूड बनती जा रही है।
3.
आज ऐसे लोगों की कमी नहीं है जो नये संचार माध्यमों, टीवी व इंटरनेट आदि पर जिस तरह की हिंदी का प्रयोग हो
रहा है उसके पक्षधर हैं। इन लोगों को हिंदी के साथ अंग्रेजी शब्दों के प्रयोग या अशुद्ध
हिंदी से कोई परहेज नहीं है। ऐसे लोगों का तर्क है कि युवा पीढ़ी इस हिंदी को अपना रही
है और उसे समझ में आ रही है इसलिए सही है। आश्चर्य होता है जब ऐसे ही लोग फास्टफूड
का विरोध करते हैं या देहदर्शना फैशन का विरोध करते हुए भारतीय संस्कृति की रक्षा की
बात करते हैं जबकि यह सब तो युवा पीढ़ी की पहली पसंद है। दूसरे विश्वयुद्ध से पहले तक
किसी भी देश पर शासन के लिए उसकी राजनीतिक व्यवस्था पर कब्जा करना होता था पर आज ऐसा
नहीं है। जिस समय अमेरिका ने सीएनएन चैनल का विस्तार कर और उसका खाड़ी युद्ध में अपने
पक्ष में प्रयोग कर यह कहा था कि वह किसी भी देश पर अब सूचना तंत्र के जरिये और सांस्कृतिक
माध्यम से शासन करेगा। और यही किया जा रहा है। पिछले तीन दशक के समय में किसी भी देश
खासतौर पर भारत जैसे देश को देखें तो वहां बडे़ स्तर पर एक दूसरा भारत स्थापित हो गया
है। भूमंडलीकरण के रथ पर सवार वैश्विक प्रचलन जिनमें खानपान, फैशन, भाषा, शिक्षा सब शामिल है ने भारत के शहरी जीवन में ही नहीं, दूरस्थ ग्रामीण क्षेत्रों में भी अपनी पैठ बना ली है।
हरियाणा के जिन गांवों में कभी चाय तक की दुकान नहीं होती थी वहां अब बर्गर, चाउमिन, कोक-पेप्सी, चिप्स लोकप्रिय हो रहे हैं। छोटे-छोटे गांवों में अंग्रेजी
माध्यम के निजी स्कूल खुल गये हैं और अंग्रेजी बोलना सिखाने की दुकानें भी। यह एक नये
तरह का साम्राज्यवाद है जो तेजी से फैल रहा है और हमारी अपनी सहमति से या हमारे विरोध
न करने के कारण।
एक समय सरकार और समाज पर नियंत्रण करने की कोशिश करने वाले पूंजीवाद
जिसे अरविंद ने आवारा पूंजी कहा है, पर नकेल
का काम पत्रकारिता करती है,
यह माना जाता था जो काफी हद तक
सही भी था। सरकार और पूंजी दोनों पर पत्रकारिता का दबाव रहा और इसी कारण पत्रकारिता
को लोकतंत्र का चौथा खम्बा माना गया। एआर अंतुले, जगन्नाथ मिश्र, वीरभद्र सिंह, मध्यप्रदेश
के कांग्रेस शासन में विधानसभा अध्यक्ष रहे यज्ञदत्त शर्मा से लेकर कितने ही उदाहरण
हैं जो पत्रकारिता की सामाजिक पक्षधरता और सच्चाई को सामने लाने की निष्ठा के कारण
ही राजनीति में हाशिये पर चले गये। इसी प्रकार पत्रकारिता की पक्षधरता के कारण ही सरकारों
को अपने बहुत से ऐसे निर्णय वापस लेने पड़े जो पूंजीपतियों के हित में लिये गये। परन्तु
अब ऐसा होगा या हो सकता है यह कहना मुश्किल है। हालांकि हाल के वर्षों में टू जी घोटाला, नीरव मोदी का फर्जीवाड़ा जैसे मामलों में और कुछ सामाजिक
मुद्दों पर पत्रकारिता की सजगता के कारण ही सरकार को कदम उठाने पर मजबूर होना पड़ा।
एक समय था 1985 से लेकर 1990 तक
का जब हिन्दी में रविवार और माया जैसी पत्रिकाएं थीं और चौथी दुनिया जैसे साप्ताहिक
अखबार थे जिन्होंने ऐसे मामलों को सामने रखा जो प्रभावशाली राजनीतिक और सामाजिक नेताओं
के साथ ही पूंजीपतियों से सम्बन्ध रखते थे। उस समय तक यह मानकर चला जाता था कि कम्युनिस्ट
पार्टियां जनता का और खासतौर पर श्रमिकों का हित संरक्षित करने में सबसे आगे रहती हैं
परन्तु इस बात की सच्चाई को रविवार पत्रिका ने खोल कर रख दिया था। रविवार ने एक रपट
प्रकाशित की थी जिसमें बताया गया था कि अलग-अलग कम्युनिस्ट पार्टियों द्वारा बार-बार
हड़ताल के कारण पश्चिम बंगाल में कोई 3000 उद्योग
बंद हो गये या दूसरे राज्यों में चले गये। टाटा की नैनो कार के संदर्भ में भी यही देखने
को मिला था। बहरहाल उस तरह की पत्रकारिता की कल्पना आज नहीं की जा सकती।
4.
हिन्दी पत्रकारिता जो आज केवल अखबारों और खबरिया चैनलों तक सिमटकर
रह गयी है एक समय उसका दायरा बहुत बड़ा था। उसमें सिर्फ समाचार ही नहीं विचार भी होता
था और कई पत्रिकाएं तो अपने वैचारिक प्रवाह के लिए ही जानी जाती थीं। ऐसी ही एक पत्रिका
थी दिनमान जिसके सम्पादकों में अज्ञेय जैसे साहित्यकार से लेकर रघुवीर सहाय और बाद
में राजेंद्र माथुर जैसे दिग्गज पत्रकार रहे। दिनमान ने एक नयी तरह की वैचारिक पत्रकारिता
शुरू की जिसमें साहित्य-संस्कृति और राजनीति का सम्मिश्रण था। देश नहीं विदेश की भी
उसमें खोज-खबर होती थी। आधुनिक कला को लेकर दिनमान ने समीक्षात्मक लेखन का दौर शुरू
किया था। दिनमान के साथ ही उस दौर में शुद्ध साहित्यिक पत्रिका ‘सारिका’ थी जिसके
सम्पादक लम्बे समय तक कमलेश्वर रहे। उन्होंने सारिका को विशेषांकों के माध्यम से नये
क्षितिज तक पहुंचाया। सारिका का सात्र, हेमिंग्वे, दुष्यंत कुमार और इसी तरह के कभी लेखकों पर केंद्रित
तो कभी किसी विषय पर विशेषांक बाकी पत्रिकाओं के लिए एक चुनौती रहे। सारिका में कमलेश्वर
का सम्पादकीय वैचारिक आंदोलन से कम नहीं था।
उसी दौर की दो और पत्रिकाओं की चर्चा करना जरूरी है। एक धर्मयुग
और दूसरी साप्ताहिक हिन्दुस्तान। धर्मयुग का प्रकाशन टाइम्स समूह द्वारा किया जाता
था तो साप्ताहिक हिन्दुस्तान का हिन्दुस्तान टाइम्स समूह द्वारा। दोनों प्रतिष्ठानों
में प्रतिस्पर्धा तो थी जिसने दोनों पत्रिकाओं को नया कलेवर दिया। धर्मयुग के सम्पादक
धर्मवीर भारती रहे जो स्थापित साहित्यकार थे। धर्मयुग ऐसी पत्रिका थी जिसमें सम-सामयिक
विषयों पर चिंतन होता था और साहित्य पर भी। भारती जी ने धर्मयुग को कभी भी पूरी तरह
साहित्य के रंग में रंगने की कोशिश नहीं की बल्कि उसे आमजन की पत्रिका का रूप दिया
जिसे साहित्य के साथ ही ऐसी कहानियां व कविताएं चाहिए होती हैं जो उसकी समझ में आएं
और उसको बढ़ाएं। इसके साथ ही पाठकों को सामयिक विषयों पर वैचारिक सामग्री भी चाहिए।
धर्मयुग कभी भी पूरी तरह न तो राजनीतिक पत्रिका रही न साहित्यिक पर उसने अपनी सामग्री
में जीवन के सभी पक्षों के बीच संतुलन बनाए रखा। यही कारण रहा कि अपने समय में वह अन्य
पत्रिकाओं से अधिक लोकप्रिय रही। उसी दौर की एक और पत्रिका, जो आज भी प्रकाशित हो रही है, कादम्बिनी थी। एक समय उसके सम्पादक कथाकार राजेंद्र
अवस्थी हुआ करते थे। उनके समय में एक अच्छी कथा पत्रिका के रूप में तो उसकी पहचान थी
ही, उसमें सम्पादकीय के रूप में प्रकाशित होने वाला ‘काल चिंतन’ काफी
लोकप्रिय रहा। उस दौर की पत्रिकाओं में, जिन्होंने
हिन्दी पत्रकारिता को अलग गरिमा प्रदान की, आज यही
एकमात्र पत्रिका बची है। हां, इस बीच कुछ
नयी पत्रिकाओं का आगमन हुआ परंतु वे बहुत गहरा प्रभाव छोड़ने में सफल नहीं हो पायी हैं।
5.
1990-91 का खाड़ी युद्ध आज कितने लोगों को याद है कहा नहीं जा सकता परन्तु वही समय था जब
वैश्विक मीडिया ने अपना प्रसार करना शुरू किया था। कुवैत पर इराक के हमले के बाद अमेरिका
की इराक विरोधी कार्रवाई को सीएनएन के माध्यम से पूरी दुनिया में प्रसारित किया गया, कहीं प्रत्यक्ष रूप में तो कहीं अन्य चैनलों को प्रसारण
में सहभागी बनाकर। उन दिनों भारत के तकरीबन सभी बड़े शहरों में सीएनएन ने अमेरिकी हथियारों
की ताकत और अमेरिकी प्रभुत्व को न मानने की सजा क्या हो सकती है, इसे बखूबी स्थापित किया। खाड़ी युद्ध अमेरिका की प्रतिष्ठा
का ही सवाल नहीं था बल्कि वह एक तरह से नई विश्व व्यवस्था की शुरूआत थी जिसमें सोवियत
संध के कमजोर और निरूपाय होते जाने के साथ ही अमेरिकी प्रभुत्व की प्रधानता का संकेत
था। खाड़ी युद्ध इस बात का भी प्रमाण था कि अमेरिका जो भी निर्णय लेगा उसे मानना सबके
लिए बाध्यकारी होगा। इस युद्ध के दौरान अमेरिकी बमबारी से रात के अंधेरे में जैसे आतिशबाजी
का दृश्य उभर आया था। सीएनएन ने इन दृश्यों को और तेल के जलते कुंओं को अमेरिकी विजय
के नये प्रतीक चिन्हों के रूप में प्रस्तुत किया। यह एक नयी विश्व व्यवस्था का आगाज
था जिसमें सोवियत संघ की खामोशी बहुत अर्थपूर्ण थी। यह खामोशी बता रही थी कि दुनिया
में अबतक जो शक्ति संतुलन था वह अब बस गिरा ही चाहता है। और यही हुआ भी। अलबत्ता प्रथम
खाड़ी युद्ध के समय तक अमेरिकी रणनीति को पहचानने और उसका विरोध करने वाले लोग मौजूद
थे। उस समय पर्यावरण पर खाड़ी युद्ध के असर तक का मुद्दा उठाया गया था। उस समय दुनिया
भर में, यहां तक कि अमेरिका में भी इराक के खिलाफ अमेरिकी सैन्य
कार्रवाई का लोगों ने सड़क पर आकर विरोध किया। परन्तु दूसरे खाड़ी युद्ध में क्या हुआ।
पूरी दुनिया ने देखा कि अमेरिका ने इराक पर जो रासायनिक हथियार जमा करने का आरोप लगाकर
हमला किया था वह शताब्दी का सबसे बड़ा झूठ निकला। इराक तबाह कर दिया गया। सद्दाम हुसैन
को फांसी पर लटकाया गया और उसे टीवी चैनलों के माध्यम से दुनियाभर में पहुंचाया गया
मानो अमेरिका कहना चाहता हो कि मेरा कहना नहीं मानोगे तो यही अंजाम होगा। पूरी दुनिया
ने मान लिया कि अमेरिका सही है।
इराक का संहार पहले और दूसरे दोनों खाड़ी युद्धों में अमेरिकी
गर्वोक्ति की नयी गाथा थी जिसे सीएनएन-स्टार टीवी के जरिये एक नयी आभा के साथ पेश किया
गया। पूरी दुनिया ने इस अमेरिकी महोत्सव को कौतुहल से और कुछ-कुछ श्रद्धाभाव से देखा
और मान लिया कि दुनिया पर लोकतंत्र की विजय हुई है। प्रथम खाड़ी युद्ध तो प्रतीक था
अमेरिका के वैश्विक प्रभुत्व की स्थापना की शुरूआत का जिसे अफगानिस्तान और फिर इराक
में अमेरिका ने और पुख्ता किया। यहीं से वैश्विक मीडिया यानी निजी और विदेशी टीवी चैनलों
का प्रसार शुरू हुआ जिसने एक अघोषित युद्ध का आगाज किया जिसमें यह पहले से तय था कि
कौन जीतेगा और कौन हारेगा। इसे प्रस्तुत इस तरह किया गया जैसे दर्शक इससे लाभान्वित
होंगे। पर ऐसा था नहीं। लाभ तो उन मालिकों को होना था जो दर्शकों को एक नयी दिशा में
धकेल रहे थे, उस दिशा में जहां उनके लिए इतनी चकाचौंध थी कि आंखों
के आगे अंधेरा छा जाए। यह एक नयी तरह की पराधीनता की शुरूआत थी। यह शुरू हुई पहले मोहक
छवियों के मायाजाल से। भारत जैसे देश में जहां पारम्परिक समाज में बहुत कुछ ढंका-छिपा
रहता था और जिसमें शालीनता-शर्म समाज का आभूषण था। इन नयी छवियों ने सबसे पहले संस्कारों
को देह के रास्ते से खोलना शुरू किया। फैशन टीवी चोरी-छुपे ही सही लोकप्रिय हो गया।
हॉलीवुड की फिल्में पहले अंग्रेजी में और फिर हिन्दी में डब होकर आने लगी। रियल्टी
शो के कई संस्करण आ गये। बच्चों-बड़ों सबसे कहा गया नाचिये और गाइये। अंतहीन पारिवारिक
धारावाहिकों का दौर शुरू हुआ। सब कुछ टीवी पर बेचा जाने लगा, भावनाएं, ग्लैमर, मार-काट, पागलपन, यौन कुंठाएं, सैक्स, अपराधी भी सेलेब्रिटी बन गये और बिग बॉस से देशभर में
पहचाने जाने वाले चेहरे भी। यह नया समाज है, नया
वैश्विक समाज जिसके लिए सब कुछ खरीदा-बेचा जाना चाहिए। पर इस समाज में बेचने का अधिकार
कम ही लोगों के पास है, ज्यादातर तो बस खरीददार हैं और वह भी इसलिए कि इसके
अलावा वो कुछ कर भी नहीं सकते। जिसे बुद्धूबक्सा कहा गया था उसने लोगों को बुद्धू बना
दिया और धरों में कैद कर दिया। बची-खुची कसर मोबाइल और सोशल मीडिया ने पूरी कर दी है
जिसमें हर व्यक्ति अपने ही दायरे में कैद होता जा रहा है, जिसमें सबकुछ केवल संदेश बनाता जा रहा है वह भी संक्षिप्त, और इस तरह जीवन भी संक्षिप्त होता जा रहा है। यह एक
नयी विश्व व्यवस्था है जिसमें हरएक विश्व नागरिक है, अलबत्ता किसी की भी अपनी कोई पहचान नहीं है। सांस्कृतिक और भाषिक पहचानों को नष्ट
करना इस विश्वग्राम की पहली और आखरी शर्त है।
Dr. Ved Prakash Bhardwaj is a senior journalist, writer and artist, worked in different newspapers and writes on different subjects including creative writing since 1982. currently he works as an assistant professor in BJMC department in IIMT Group of collages, Greater Noida.