Thursday, April 19, 2018

हिन्दी पत्रकारिता पर वैश्वीकरण का प्रभाव Impact of globlisation on Hindi Journalism

समय, समाज और पत्रकारिता
हिन्दी पत्रकारिता पर वैश्वीकरण का प्रभाव
Impact of globlisation on Hindi Jurnalism
डॉ. वेद प्रकाश भारद्वाज
1.
हिन्दी पत्रकारिता की दशा और दिशा पर विचार करते हुए और वैश्वीकरण के उस पर प्रभाव का आकलन करते हुए इस बात को ध्यान में रखा जाना जरूरी है कि आज हम जिस दुनिया में हैं उसमें कोई भी मानवीय व्यवहार ऐसा नहीं है जो दूसरे व्यवहारों से प्रभावित न हो, बल्कि कुछ मामलों में तो वर्तमान जीवन का एक पक्ष शेष पक्षों को नियंत्रित करने लगा है। यहां रमेश उपाध्याय की याद आना स्वाभाविक है जो भूमंडलीकरण और उत्तर आधुनिकतावाद के यथार्थपरक विश्लेषण के लिए जाने जाते हैं। उन्होंने अपनी पुस्तक उत्तर आधुनिकतावाद और आज का उपभोक्ता समाज में बाजार और उसके चतुर्दिक प्रभाव को बड़ी बारीकी से विश्लेषित किया है। यह काम शंभुनाथ सिंह ने भी किया है। उन्होंने अपनी पुस्तक संस्कृति की उत्तरकथा में उत्तर आधुनिकतावाद और उसके सांस्कृतिक प्रभाव को ही नहीं बल्कि उसके सामाजिक एवं राजनीतिक प्रभाव को भी सामने रखा है। इस तरह हम पाते हैं कि भूमंडलीकरण या वैश्वीकरण का प्रभाव हमारे जीवन के सभी पक्षों पर पड़ रहा है जिसमें मीडिया भी शामिल है। इसका सबसे अधिक असर हिन्दी पत्रकारिता पर हुआ है जिसमें समाचार पत्र-पत्रिकाएं तो शामिल हैं हीं, टीवी चैनल, इंटरनेट और सोशल मीडिया भी शामिल है। कुछ लोगों के लिए इंटरनेट और सोशल मीडिया को हिन्दी पत्रकारिता में शामिल किया जाना संभव है कि अनुचित लगे परन्तु यहां स्पष्ट कर दूं कि आज इंटरनेट और सोशल मीडिया पर हिन्दी में काफी काम हो रहा है। फेसबुक, व्हाटसएप, ट्वीटर, ब्लॉग आदि का हिन्दीकरण तेजी से हो रहा है। इंटरनेट पर सर्च इंजन पर भी हिन्दी और अन्य भारतीय भाषाओं में काम करने की सुविधा तेजी से आगे बढ़ रही है। यह सब वैश्वीकरण के साथ शुरू हुए माध्यम हैं जिनका असर पारम्परिक समाचार पत्रों व पत्रिकाओं पर भी हुआ है। इसे समझने के लिए एक ही उदाहरण काफी होगा और वो है सूचनाओं की वैधता का सवाल। सोशल मीडिया पर बहुत सारी ऐसी सूचनाएं परोस दी जाती हैं जिनकी सत्यता संदिग्ध होती है और कई बार तो वे पूर्ण असत्य होती हैं फिर भी लोग उन्हें साझा करते हैं, बगैर इस बात पर विचार किये कि उस खबर या सूचना में कोई सच्चाई है या नहीं। इसी तरह का चरित्र अब टीवी चैनलों का है जो खबर की सत्यता को एक निरर्थक प्रश्न मानते हैं। अखबारों ने भी अब खबरों की सच्चाई से यह कहकर दामन छुड़ाना शुरू कर दिया है कि उनका काम केवल सूचना देना है उसकी सच्चाई को परखना नहीं जबकि एक समय था कि अखबार में या पत्रिका में प्रकाशित हर सूचना के सच्ची होने का यकीन होता था। लोग यह मानकर चलते थे कि कोई खबर या जानकारी यदि अखबार में छपी है तो उसमें सच्चाई तो होगी ही। बाद में यही स्थिति खबरिया टीवी चैनलों की रही। यानी कि किसी समय पत्रकारिता की जो सामाजिक प्रतिबद्धता और जिम्मेदारी होती थी वह अब अवांछित तत्व है। ठीक उसी तरह जिस तरह वैश्वीकरण के चलते अमेरिका और उसके नेतृत्व वाली संस्थाओं के निर्देश पर सरकारों ने अपनी सामाजिक जिम्मेदारियों से किनारा करना शुरू कर दिया है या उनकी प्राथमिकता को कम महत्वपूर्ण मान लिया है। जो लोग यह मानकर चल रहे थे कि आर्थिक उदारीकरण के कारण बनने वाली वैश्विक स्थिति का लाभ सभी को मिलेगा उनके लिए यह एक निराशाजनक स्थिति हो सकती है। इस वैश्विक बाजार में हर किसी को अपने स्तर पर अपनी कोशिशों से अपना अस्तित्व बनाना-बचना होगा, फिर चाहे वह सरकार हो, सरकार द्वारा पोषित सामाजिक-सांस्कृतिक संस्थाएं हों या पत्रकारिता जगत।
2.
हिन्दी पत्रकारिता में पाठकों का मनोरंजन करना शुरू से एक महत्पवूर्ण पक्ष रहा है। जब देश में टीवी का प्रचलन सब जगह नहीं था तब अखबारों के रवीवारीय परिशिष्ठ और पत्रिकाएं मनोरंजन का साधन थीं। साहित्य तब भी बहुसंख्यक लोगों के मानसिक सामर्थ्य से बाहर हुआ करता था। फिल्में मनोरंजन का साधन थी परन्तु उन्हें बहुत गंभरता से नहीं लिया जाता था। हां समानान्तर सिनेमा ने जरूर अपनी गंभीर पहचान बनायी थी। 1990 से पहले तक दैनिक अखबारों के अलावा साप्ताहिक अखबार व पत्रिकाएं जीवन का अनिवार्य हिस्सा हुआ करती थीं। भूमंडलीकरण की आंधी ने सबसे पहले इन साप्ताहिकों व पत्रिकाओं को उखाड़ फेंका। उसके बाद टीवी की तेज गतिशील छवियों ने अखबारों को अपनी बौद्धिक व शिथिल गंभीर छवि के आवरण से बाहर आने को मजबूर किया। पत्रकारिता चतुर, चपल और सुंदरता की ऐसी दुनिया में प्रवेश कर गयी जहां अर्थ का आग्रह तो बढ़ा परन्तु केवल मौद्रिक अर्थ का, मानकों और मूल्यों का नहीं। 1990 के दशक में विज्ञापन पाने के लिए अखबारों ने अपनी मुद्रण तकनीक को ही नहीं बदला बल्कि अपनी प्रकाश्य सामग्री और आग्रहों को भी बदल दिया। अखबारों में सम्पादकों से अधिक प्रभावी विज्ञापन मैनेजर होने लगे। कुछ अखबारों ने तो सम्पादक की अनिवार्यता को ही नकारते हुए किसी को भी सम्पादक के पद पर बैठा देने का चलन शुरू कर दिया।
हिन्दी समाचार पत्र जगत में पंजाब में आतंकवाद के खिलाफ जान की बाजी लगाने के लिए पंजाब केसरी का हमेशा सम्मान किया जाएगा परन्तु यह भी तथ्य है कि अपनी लोकप्रियता के बावजूद उसे कभी बहुत गंभीर अखबार नहीं माना गया। दिल्ली में पंजाब केसरी आमतौर पर निचले तबके का अखबार रहा जिसके पहले पृष्ठ पर सिने तारिकाओं की तस्वीरें छपा करती थीं या दूसरे किस्से कहानी आदि। पर भूमंडलीकरण के शुरूआती दौर में ही कई अखबारों ने पंजाब केसरी के प्रथम पृष्ठ को अपना अंतिम पृष्ठ बना लिया और कुछ ने तो उसके चरित्र को ही आत्मसात कर लिया। नवभारत टाइम्स ने अपने परिशिष्ठों को बंद कर दिया। साहित्य और संस्कृति लोकप्रिय प्रचलनों की भेंट चढ़ा दिये गये। सहारा ने भी हस्तक्षेप व उमंग जैसे परिशिष्ठों से जो अपनी गंभीर पहचान बनायी थी उन्हें या तो बंद कर दिया या धारहीन बना दिया। यही स्थिति कमोबेश क्षेत्रीय अखबारों में हुई। नई दुनिया, भास्कर, राजस्थान पत्रिका, अमर उजाला आदि में प्रतिबद्ध पत्रकारिता जैसे दीवार पर लटकी पुरानी फोटो हो गये। कल तक पाठकों में अखबारों की जो गरिमामय उपस्थिति थी वह धीरे-धीरे धूमिल होने लगी। पाठकों के लिए अखबार ठीक उसकी तरह बनती-बिगड़ती खबरों का माध्यम हो गया जैसे टीवी चैनल हैं कि खबर आयी और गयी, उसके बाद कुछ नहीं। जबकि पहले अखबार खबर के जाने के बाद यानी उसके छपने के कई दिन बाद तक उसके प्रभावों पर नजर रखते थे और जरूरी होने पर खबरों को एक वैचारिक प्रवाह में बदल देते थे। वह एक ऐसा बौद्धिक आहार था जो मानव मेधा को हमेशा तरोताजा और सजग रखता था। वह पौष्टिक खाने की तरह था जंक फूड या फास्ट फूड की तरह नहीं कि उसका शारीरिक विकास में कोई योगदान न हो पाए। पर वैश्वीकरण के प्रभाव में हिन्दी पत्रकारिता भी फास्ट फूड बनती जा रही है।
3.
आज ऐसे लोगों की कमी नहीं है जो नये संचार माध्यमों, टीवी व इंटरनेट आदि पर जिस तरह की हिंदी का प्रयोग हो रहा है उसके पक्षधर हैं। इन लोगों को हिंदी के साथ अंग्रेजी शब्दों के प्रयोग या अशुद्ध हिंदी से कोई परहेज नहीं है। ऐसे लोगों का तर्क है कि युवा पीढ़ी इस हिंदी को अपना रही है और उसे समझ में आ रही है इसलिए सही है। आश्चर्य होता है जब ऐसे ही लोग फास्टफूड का विरोध करते हैं या देहदर्शना फैशन का विरोध करते हुए भारतीय संस्कृति की रक्षा की बात करते हैं जबकि यह सब तो युवा पीढ़ी की पहली पसंद है। दूसरे विश्वयुद्ध से पहले तक किसी भी देश पर शासन के लिए उसकी राजनीतिक व्यवस्था पर कब्जा करना होता था पर आज ऐसा नहीं है। जिस समय अमेरिका ने सीएनएन चैनल का विस्तार कर और उसका खाड़ी युद्ध में अपने पक्ष में प्रयोग कर यह कहा था कि वह किसी भी देश पर अब सूचना तंत्र के जरिये और सांस्कृतिक माध्यम से शासन करेगा। और यही किया जा रहा है। पिछले तीन दशक के समय में किसी भी देश खासतौर पर भारत जैसे देश को देखें तो वहां बडे़ स्तर पर एक दूसरा भारत स्थापित हो गया है। भूमंडलीकरण के रथ पर सवार वैश्विक प्रचलन जिनमें खानपान, फैशन, भाषा, शिक्षा सब शामिल है ने भारत के शहरी जीवन में ही नहीं, दूरस्थ ग्रामीण क्षेत्रों में भी अपनी पैठ बना ली है। हरियाणा के जिन गांवों में कभी चाय तक की दुकान नहीं होती थी वहां अब बर्गर, चाउमिन, कोक-पेप्सी, चिप्स लोकप्रिय हो रहे हैं। छोटे-छोटे गांवों में अंग्रेजी माध्यम के निजी स्कूल खुल गये हैं और अंग्रेजी बोलना सिखाने की दुकानें भी। यह एक नये तरह का साम्राज्यवाद है जो तेजी से फैल रहा है और हमारी अपनी सहमति से या हमारे विरोध न करने के कारण।
एक समय सरकार और समाज पर नियंत्रण करने की कोशिश करने वाले पूंजीवाद जिसे अरविंद ने आवारा पूंजी कहा है, पर नकेल का काम पत्रकारिता करती है, यह माना जाता था जो काफी हद तक सही भी था। सरकार और पूंजी दोनों पर पत्रकारिता का दबाव रहा और इसी कारण पत्रकारिता को लोकतंत्र का चौथा खम्बा माना गया। एआर अंतुले, जगन्नाथ मिश्र, वीरभद्र सिंह, मध्यप्रदेश के कांग्रेस शासन में विधानसभा अध्यक्ष रहे यज्ञदत्त शर्मा से लेकर कितने ही उदाहरण हैं जो पत्रकारिता की सामाजिक पक्षधरता और सच्चाई को सामने लाने की निष्ठा के कारण ही राजनीति में हाशिये पर चले गये। इसी प्रकार पत्रकारिता की पक्षधरता के कारण ही सरकारों को अपने बहुत से ऐसे निर्णय वापस लेने पड़े जो पूंजीपतियों के हित में लिये गये। परन्तु अब ऐसा होगा या हो सकता है यह कहना मुश्किल है। हालांकि हाल के वर्षों में टू जी घोटाला, नीरव मोदी का फर्जीवाड़ा जैसे मामलों में और कुछ सामाजिक मुद्दों पर पत्रकारिता की सजगता के कारण ही सरकार को कदम उठाने पर मजबूर होना पड़ा। एक समय था 1985 से लेकर 1990 तक का जब हिन्दी में रविवार और माया जैसी पत्रिकाएं थीं और चौथी दुनिया जैसे साप्ताहिक अखबार थे जिन्होंने ऐसे मामलों को सामने रखा जो प्रभावशाली राजनीतिक और सामाजिक नेताओं के साथ ही पूंजीपतियों से सम्बन्ध रखते थे। उस समय तक यह मानकर चला जाता था कि कम्युनिस्ट पार्टियां जनता का और खासतौर पर श्रमिकों का हित संरक्षित करने में सबसे आगे रहती हैं परन्तु इस बात की सच्चाई को रविवार पत्रिका ने खोल कर रख दिया था। रविवार ने एक रपट प्रकाशित की थी जिसमें बताया गया था कि अलग-अलग कम्युनिस्ट पार्टियों द्वारा बार-बार हड़ताल के कारण पश्चिम बंगाल में कोई 3000 उद्योग बंद हो गये या दूसरे राज्यों में चले गये। टाटा की नैनो कार के संदर्भ में भी यही देखने को मिला था। बहरहाल उस तरह की पत्रकारिता की कल्पना आज नहीं की जा सकती। 
4.
हिन्दी पत्रकारिता जो आज केवल अखबारों और खबरिया चैनलों तक सिमटकर रह गयी है एक समय उसका दायरा बहुत बड़ा था। उसमें सिर्फ समाचार ही नहीं विचार भी होता था और कई पत्रिकाएं तो अपने वैचारिक प्रवाह के लिए ही जानी जाती थीं। ऐसी ही एक पत्रिका थी दिनमान जिसके सम्पादकों में अज्ञेय जैसे साहित्यकार से लेकर रघुवीर सहाय और बाद में राजेंद्र माथुर जैसे दिग्गज पत्रकार रहे। दिनमान ने एक नयी तरह की वैचारिक पत्रकारिता शुरू की जिसमें साहित्य-संस्कृति और राजनीति का सम्मिश्रण था। देश नहीं विदेश की भी उसमें खोज-खबर होती थी। आधुनिक कला को लेकर दिनमान ने समीक्षात्मक लेखन का दौर शुरू किया था। दिनमान के साथ ही उस दौर में शुद्ध साहित्यिक पत्रिका सारिकाथी जिसके सम्पादक लम्बे समय तक कमलेश्वर रहे। उन्होंने सारिका को विशेषांकों के माध्यम से नये क्षितिज तक पहुंचाया। सारिका का सात्र, हेमिंग्वे, दुष्यंत कुमार और इसी तरह के कभी लेखकों पर केंद्रित तो कभी किसी विषय पर विशेषांक बाकी पत्रिकाओं के लिए एक चुनौती रहे। सारिका में कमलेश्वर का सम्पादकीय वैचारिक आंदोलन से कम नहीं था।
उसी दौर की दो और पत्रिकाओं की चर्चा करना जरूरी है। एक धर्मयुग और दूसरी साप्ताहिक हिन्दुस्तान। धर्मयुग का प्रकाशन टाइम्स समूह द्वारा किया जाता था तो साप्ताहिक हिन्दुस्तान का हिन्दुस्तान टाइम्स समूह द्वारा। दोनों प्रतिष्ठानों में प्रतिस्पर्धा तो थी जिसने दोनों पत्रिकाओं को नया कलेवर दिया। धर्मयुग के सम्पादक धर्मवीर भारती रहे जो स्थापित साहित्यकार थे। धर्मयुग ऐसी पत्रिका थी जिसमें सम-सामयिक विषयों पर चिंतन होता था और साहित्य पर भी। भारती जी ने धर्मयुग को कभी भी पूरी तरह साहित्य के रंग में रंगने की कोशिश नहीं की बल्कि उसे आमजन की पत्रिका का रूप दिया जिसे साहित्य के साथ ही ऐसी कहानियां व कविताएं चाहिए होती हैं जो उसकी समझ में आएं और उसको बढ़ाएं। इसके साथ ही पाठकों को सामयिक विषयों पर वैचारिक सामग्री भी चाहिए। धर्मयुग कभी भी पूरी तरह न तो राजनीतिक पत्रिका रही न साहित्यिक पर उसने अपनी सामग्री में जीवन के सभी पक्षों के बीच संतुलन बनाए रखा। यही कारण रहा कि अपने समय में वह अन्य पत्रिकाओं से अधिक लोकप्रिय रही। उसी दौर की एक और पत्रिका, जो आज भी प्रकाशित हो रही है, कादम्बिनी थी। एक समय उसके सम्पादक कथाकार राजेंद्र अवस्थी हुआ करते थे। उनके समय में एक अच्छी कथा पत्रिका के रूप में तो उसकी पहचान थी ही, उसमें सम्पादकीय के रूप में प्रकाशित होने वाला काल चिंतनकाफी लोकप्रिय रहा। उस दौर की पत्रिकाओं में, जिन्होंने हिन्दी पत्रकारिता को अलग गरिमा प्रदान की, आज यही एकमात्र पत्रिका बची है। हां, इस बीच कुछ नयी पत्रिकाओं का आगमन हुआ परंतु वे बहुत गहरा प्रभाव छोड़ने में सफल नहीं हो पायी हैं।
5.
1990-91 का खाड़ी युद्ध आज कितने लोगों को याद है कहा नहीं जा सकता परन्तु वही समय था जब वैश्विक मीडिया ने अपना प्रसार करना शुरू किया था। कुवैत पर इराक के हमले के बाद अमेरिका की इराक विरोधी कार्रवाई को सीएनएन के माध्यम से पूरी दुनिया में प्रसारित किया गया, कहीं प्रत्यक्ष रूप में तो कहीं अन्य चैनलों को प्रसारण में सहभागी बनाकर। उन दिनों भारत के तकरीबन सभी बड़े शहरों में सीएनएन ने अमेरिकी हथियारों की ताकत और अमेरिकी प्रभुत्व को न मानने की सजा क्या हो सकती है, इसे बखूबी स्थापित किया। खाड़ी युद्ध अमेरिका की प्रतिष्ठा का ही सवाल नहीं था बल्कि वह एक तरह से नई विश्व व्यवस्था की शुरूआत थी जिसमें सोवियत संध के कमजोर और निरूपाय होते जाने के साथ ही अमेरिकी प्रभुत्व की प्रधानता का संकेत था। खाड़ी युद्ध इस बात का भी प्रमाण था कि अमेरिका जो भी निर्णय लेगा उसे मानना सबके लिए बाध्यकारी होगा। इस युद्ध के दौरान अमेरिकी बमबारी से रात के अंधेरे में जैसे आतिशबाजी का दृश्य उभर आया था। सीएनएन ने इन दृश्यों को और तेल के जलते कुंओं को अमेरिकी विजय के नये प्रतीक चिन्हों के रूप में प्रस्तुत किया। यह एक नयी विश्व व्यवस्था का आगाज था जिसमें सोवियत संघ की खामोशी बहुत अर्थपूर्ण थी। यह खामोशी बता रही थी कि दुनिया में अबतक जो शक्ति संतुलन था वह अब बस गिरा ही चाहता है। और यही हुआ भी। अलबत्ता प्रथम खाड़ी युद्ध के समय तक अमेरिकी रणनीति को पहचानने और उसका विरोध करने वाले लोग मौजूद थे। उस समय पर्यावरण पर खाड़ी युद्ध के असर तक का मुद्दा उठाया गया था। उस समय दुनिया भर में, यहां तक कि अमेरिका में भी इराक के खिलाफ अमेरिकी सैन्य कार्रवाई का लोगों ने सड़क पर आकर विरोध किया। परन्तु दूसरे खाड़ी युद्ध में क्या हुआ। पूरी दुनिया ने देखा कि अमेरिका ने इराक पर जो रासायनिक हथियार जमा करने का आरोप लगाकर हमला किया था वह शताब्दी का सबसे बड़ा झूठ निकला। इराक तबाह कर दिया गया। सद्दाम हुसैन को फांसी पर लटकाया गया और उसे टीवी चैनलों के माध्यम से दुनियाभर में पहुंचाया गया मानो अमेरिका कहना चाहता हो कि मेरा कहना नहीं मानोगे तो यही अंजाम होगा। पूरी दुनिया ने मान लिया कि अमेरिका सही है।
इराक का संहार पहले और दूसरे दोनों खाड़ी युद्धों में अमेरिकी गर्वोक्ति की नयी गाथा थी जिसे सीएनएन-स्टार टीवी के जरिये एक नयी आभा के साथ पेश किया गया। पूरी दुनिया ने इस अमेरिकी महोत्सव को कौतुहल से और कुछ-कुछ श्रद्धाभाव से देखा और मान लिया कि दुनिया पर लोकतंत्र की विजय हुई है। प्रथम खाड़ी युद्ध तो प्रतीक था अमेरिका के वैश्विक प्रभुत्व की स्थापना की शुरूआत का जिसे अफगानिस्तान और फिर इराक में अमेरिका ने और पुख्ता किया। यहीं से वैश्विक मीडिया यानी निजी और विदेशी टीवी चैनलों का प्रसार शुरू हुआ जिसने एक अघोषित युद्ध का आगाज किया जिसमें यह पहले से तय था कि कौन जीतेगा और कौन हारेगा। इसे प्रस्तुत इस तरह किया गया जैसे दर्शक इससे लाभान्वित होंगे। पर ऐसा था नहीं। लाभ तो उन मालिकों को होना था जो दर्शकों को एक नयी दिशा में धकेल रहे थे, उस दिशा में जहां उनके लिए इतनी चकाचौंध थी कि आंखों के आगे अंधेरा छा जाए। यह एक नयी तरह की पराधीनता की शुरूआत थी। यह शुरू हुई पहले मोहक छवियों के मायाजाल से। भारत जैसे देश में जहां पारम्परिक समाज में बहुत कुछ ढंका-छिपा रहता था और जिसमें शालीनता-शर्म समाज का आभूषण था। इन नयी छवियों ने सबसे पहले संस्कारों को देह के रास्ते से खोलना शुरू किया। फैशन टीवी चोरी-छुपे ही सही लोकप्रिय हो गया। हॉलीवुड की फिल्में पहले अंग्रेजी में और फिर हिन्दी में डब होकर आने लगी। रियल्टी शो के कई संस्करण आ गये। बच्चों-बड़ों सबसे कहा गया नाचिये और गाइये। अंतहीन पारिवारिक धारावाहिकों का दौर शुरू हुआ। सब कुछ टीवी पर बेचा जाने लगा, भावनाएं, ग्लैमर, मार-काट, पागलपन, यौन कुंठाएं, सैक्स, अपराधी भी सेलेब्रिटी बन गये और बिग बॉस से देशभर में पहचाने जाने वाले चेहरे भी। यह नया समाज है, नया वैश्विक समाज जिसके लिए सब कुछ खरीदा-बेचा जाना चाहिए। पर इस समाज में बेचने का अधिकार कम ही लोगों के पास है, ज्यादातर तो बस खरीददार हैं और वह भी इसलिए कि इसके अलावा वो कुछ कर भी नहीं सकते। जिसे बुद्धूबक्सा कहा गया था उसने लोगों को बुद्धू बना दिया और धरों में कैद कर दिया। बची-खुची कसर मोबाइल और सोशल मीडिया ने पूरी कर दी है जिसमें हर व्यक्ति अपने ही दायरे में कैद होता जा रहा है, जिसमें सबकुछ केवल संदेश बनाता जा रहा है वह भी संक्षिप्त, और इस तरह जीवन भी संक्षिप्त होता जा रहा है। यह एक नयी विश्व व्यवस्था है जिसमें हरएक विश्व नागरिक है, अलबत्ता किसी की भी अपनी कोई पहचान नहीं है। सांस्कृतिक और भाषिक पहचानों को नष्ट करना इस विश्वग्राम की पहली और आखरी शर्त है।

Dr. Ved Prakash Bhardwaj is a senior journalist, writer and artist, worked in different newspapers and writes on different subjects including creative writing since 1982. currently he works as an assistant professor in BJMC department in IIMT Group of collages, Greater Noida. 


Wednesday, April 18, 2018

language of hindi newspapers समाचार पत्रों की भाषा



समाचार पत्रों की भाषा
डॉ. वेद प्रकाश भारद्वाज
समाचार पत्र अभिव्यक्ति का वह क्षेत्र है जिसने मानवीय मेधा को चतुर्दिक फैलाया है, उसे बहुआयामी विस्तार दिया है। सूचना देना और पाठकों को चेतन करने के साथ ही उसकी एक बड़ी भूमिका भाषा के विकास में रही है। जिसे आज हम हिन्दी के रूप में जानते हैं, उसका विकास एक लम्बी यात्रा के बाद हुआ है और इस यात्रा में समाचार पत्रों की भूमिका अप्रतिम रही है। यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी कि हिन्दी के जन्म से लेकर उसके वर्तमान स्वरूप तक में समाचार पत्रों की मुख्य भूमिका रही है, भाषा को बनाने में, और बिगाड़ने में भी। मेरे जैसे हजारों पत्रकार-लेखकों ने समाचार पत्रों और पत्रिकाओं के माध्यम से ही भाषा का संस्कार ग्रहण  किया और अपनी तरह से उसमें योगदान देने का काम किया।
एक भाषा के रूप में हिन्दी की यह विशेषता रही है कि उसने हमेशा दूसरी भाषाओं, देशी और विदेशी दोनों ही, के शब्दों को आवश्यकता के आधार पर अपना बनाने में कभी संकोच नहीं किया। वैसे भी हिन्दी का जन्म खड़ी बोली और उर्दू के मिश्रण हुआ कहा जाए तो कुछ गलत नहीं होगा। हिन्दी और उससे पहले की अन्य भाषाओं में एक समानता रही कि वे सब लोक व्यवहार की भाषाएं रही हैं। संस्कृत जब शास्त्रों तक सीमित रह गयी तब लोक भाषाओं ने ही जन सामान्य को संवाद का आधार दिया। क्षेत्रीय भाषाओं और बोलियों की विविधता के बीच एक सर्वमान्य भाषा की आवश्यकता के तहत हिन्दी का जन्म और विकास हुआ यह स्वीकार करने में किसी को आपत्ति नहीं होनी चाहिए। हिन्दी साहित्य के इतिहास को देखें तो आधुनिक काल से पूर्व का समस्त साहित्य अवधि, ब्रज और अन्य क्षेत्रीय भाषाओं में रचा गया। भारतेंदू हरिश्चंद्र के समय से वर्तमान हिन्दी का रूप आकार लेने लगा था जिसे बाद में अन्य साहित्यकारों और पत्रकारों ने विकसित कर जन साधारण की भाषा के रूप में स्थापित करने का काम किया।
आज हम वैश्वीकरण के दौर में जी रहे हैं। क्षेत्रीय अस्मिताएं वैश्वीक स्तर पर अपनी अलग पहचान बनाते हुए विश्व समुदाय का महत्वपूर्ण हिस्सा बन रही हैं जिनमें से भाषा भी एक आधार है। ऐसे समय में यह देखना आवश्यक हो जाता है कि हम हिन्दी को लेकर कहां खड़े हैं। सूचना तकनीक के महा-विस्फोट से संचार माध्यमों में जो क्रांति आयी है उसने जैसे दुनिया की सारी सरहदों को बेमानी कर दिया। भारत में निजी संचार माध्यमों टीवी व इंटरनेट के विस्तार के साथ एक बार चारों तरफ अंग्रेजी भाषी संचार सेवाओं का वर्चस्व होने लगा था। परन्तु जल्दी ही अंग्रेजीदा संचार सेवा प्रदाताओं को समझ में आ गया कि भारत में यदि अपनी पैठ बनानी है तो हिन्दी और अन्य क्षेत्रीय भाषाओं को ही अपना आधार बनाना होगा। इस बीच महानगरों से प्रकाशित हिन्दी के अखबारों ने भी स्वयं को विस्तार देते हुए अपने क्षेत्रीय संस्करणों के माध्यम से विकास किया। विदेशी कम्पनियों ने शुरू में अंग्रेजी मीडिया को ही महत्व दिया और विज्ञापन की भाषा भी अंग्रेजी ही रखी पर उन्हें भी जल्दी ही समझ में आ गया कि हिन्दी और क्षेत्रीय भारतीय भाषाओं को अपना कर ही वे अपने बाजार का विस्तार कर सकते हैं। यहां तक कि हालिवुड के फिल्म निर्माताओं ने भी भारत में अपने विस्तार के लिए हिन्दी और अन्य भारतीय भाषाओं को आधार बनाया है। कई विदेशी टीवी चैनल पूरी तरह हिन्दी व क्षेत्रीय भाषाओं में बदल गये हैं। ऐसे में यह देखना रोचक होगा कि हम खुद हिन्दी वाले आज कहां और किस स्थिति में हैं।
भाषाओं के बीच कभी टकराव नहीं होता, जो टकराव होता है वह राजनीतिक होता है। हिन्दी तो वैसे भी शुरू से ही दूसरी भाषाओं के ऐसे शब्दों को अपनाने में उदार रही है जो जन सामान्य की बोलचाल का हिस्सा बन गये हैं या जिनकी आवश्यकता है और उनके हिन्दी विकल्प नहीं हैं। कार के लिए चाहें तो चैपहिया वाहन का प्रयोग कर सकते हैं परन्तु कार शब्द का प्रयोग सभी के लिए आसान होता है और अशिक्षित व्यक्ति भी उसे समझता है। इसी प्रकार इंटरनेट के लिए अंतरजाल शब्द का प्रयोग करने पर वास्तविक अर्थ समझने में मुश्किल होगी। दरअसल ऐसे विदेशी शब्द जो आम लोगों की समझ का हिस्सा बन चुके हैं उनका प्रयोग करना गलत नहीं है। इसी तर्क पर हिन्दी समाचार पत्रों और अन्य संचार सेवाओं में अंग्रेजी शब्दों के प्रयोग की छूट ली गयी। परन्तु इस छूट का एक बड़ा नुकसान हिन्दी को विकृत करने और उसे माध्यम से लोक व्यवहार को विकृत करने के रूप में सामने आया है। यही नहीं हिन्दी के प्रयोग में भाषागत शुद्धता को दरकिनार कर मनमानी की जा रही है।
इस दृष्टि से कुछ समाचार पत्रों का अध्ययन करने पर मैंने पाया कि उनमें भाषा के लेकर अजीब-सी अराजकता है। यह सही है कि समय के साथ भाषा और उसका व्यवहार बदलता है। जैसे एक लम्बे समय से हिन्दी के समाचार पत्रों में उर्दू के शब्दों के साथ नुक्ता लगाने का चलन खत्म हो गया है। इसी प्रकार आधे म तथा न की जगह अनुस्वार का प्रयोग किया जा रहा है। इसकी शुरूआत उस समय हुई थी जब कम्प्यूटर नहीं था। सीसे के टाइप से अखबार तैयार होता था। आधे म तथा न का प्रयोग न करने पर एक तो स्थान बचता था दूसरे टाइप की लागत भी कम हो जाती थी। बाद में अनुस्वार की स्वीकृति इतनी हो गयी कि उसने साहित्य से भी आधे म तथा न को बेदखल कर दिया। इसी प्रकार अर्द्धचंद्र बिन्दू की जगह केवल अनुस्वार से काम चलाया जाने लगा है। परन्तु ऐसा करने से भाषा अशुद्ध नहीं हुई।
एक समय था जब अखबारों में भाषा की शुद्धता पर बहुत अधिक बल दिया जाता था। एक-एक मात्रा का ध्यान रखा जाता था, लिंग व वचन भेद पर पूरा जोर रहता था। पर जब हाल ही में मैंने कुछ अखबारों का भाषा की दृष्टि से विश्लेषण किया तो स्थिति को चिंताजनक पाया। ऐसे अखबारों तक में भाषा को लेकर लापरवाही और कहीं-कहीं तो अराजकता देखने को मिली जो किसी समय हिन्दी भाषा के लिए मानक रहे हैं।
हिंदी समाचार पत्रों में दिल्ली से प्रकाशित हिन्दुस्तान अपनी भाषागत शुद्धता व प्रयोग के मामले में अग्रणी कहा जा सकता है। हालांकि उसमें बहुत बार शब्दों में या वाक्य रचना में गलती मिलती है, जैसे 22 अक्टूबर के अंक में पृष्ठ 6 पर कोरियाई कम्पनी में 50 लाख की डकैतीसमाचार के इंट्रो में लिखा है बदमाश अपने साथ लाए कार में......1, कार स्त्रीलिंग है जिसका ध्यान नहीं रखा गया है। इसके बाद भी कि भाषागत अशुद्धियां बढ़ती जा रही हैं, हिन्दुस्तान की भाषा को शैली के स्तर पर आदर्श कहा जा सकता है। इस सन्दर्भ में पृष्ठ 5 पर प्रकाशित एक समाचार उल्लेखनीय कहा जा सकता है। शीर्षक है छठ को लेकर आप-भाजपा में सियासी घमासान। खबर की शुरुआत देखिए- दीपावली के तुरन्त बाद ही छठ घाटों पर सियासी घमासान शुरू हो गया है। इन घाटों की तैयारियों को लेकर आप व भाजपा नेताओं में टकराव सामने आया है। दोनों पार्टियों के नेताओं ने एक-दूसरे पर दोषारोपण किया है। इस तरह के छोटे-छोटे वाक्य हिन्दुस्तान की खूबी कहे जा सकते हैं। हालांकि इसी अंक में पृष्ठ 6 पर क्रिकेटर युवराज सम्बन्धी खबर का पूरा इंट्रो एक ही वाक्य में लिखा गया है।2 हालांकि ऐसा ज्यादातर समाचारों में देखने को नहीं मिलता। दरअसल जब किसी भी समाचार में छोटे-छोटे वाक्यों का प्रयोग किया जाता है तो बात अधिक स्पष्ट होकर सामने आती है और पाठक किसी उलझन में नहीं रहते।
मीडिया में हिंदी के प्रयोग को लेकर होने वाली लापरवाही का एक उदाहरण देखिए- 22 अक्टूबर 2017 के हिन्दुस्तान के दिल्ली संस्करण में पृष्ठ 16 पर टीम इंडिया कीवियों पर दबदबा बनाने उतरेगी3 शीर्षक से जो खबर प्रकाशित हुई है उसका एक वाक्य देखिए- विराट कोहली की कमान में टीम इंडिया आस्ट्रेलिया की तरह न्यूजीलैंड के खिलाफ भी दबदबा बनाने की कोशिश करेगी।इस वाक्य में टीम इंडिया जैसे शब्दों का प्रयोग कितना जरूरी था इस बात को नजरअंदाज कर सकते हैं। पर एक शब्द मेरी समझ में नहीं आया कमान। जहाँ तक मेरी समझ है कमान का अर्थ नेतृत्व तो नहीं ही होता। कमान का अर्थ धनुष है या तीर रखने का पात्र है, अंग्रेजी में इसके लिए शब्द है कमांड यानी नियंत्रण पर हिंदी में इसका बहु-प्रचलित अर्थ तीर-कमान के सन्दर्भ में ही है। अब भारतीय टीम कोहली के नेतृत्व में खेलती है या कोहली का हथियार है समझना मुश्किल है। दरअसल यहाँ गलती कम और संपादन की भूल या अज्ञानता अधिक दिखाई देती है। लोग बस इसे पढ़ कर अर्थ निकाल लेते हैं जैसे किसी बच्चे की तुतलाती जबान से निकले आधे-अधूरे अस्पष्ट शब्दों का हम अर्थ ग्रहण कर लेते हैं। परन्तु यह कहने से भाषा के प्रति अपराध कम नहीं हो जाता। इस तरह के प्रयोगों से शब्दों के अर्थ बदल जाते हैं, साथ ही अन्य लोगों को शब्दों के मनमाने प्रयोग की छूट मिल जाती है। अब देखें इसके सही शब्द कौन से हो सकते हैं। सबसे उपयुक्त वाक्य है विराट कोहली के नेतृत्व में भारतीय टीम.....। या कप्तान कोहली की अगुवाई में भारत आज न्यूजीलैंड को.....। यह जो कप्तान शब्द है वास्तव में अंग्रेजी के कैप्टन का हिंदी रूप है। ऊपर हमने कमांड शब्द का जिक्र किया था। यह शब्द भी नेतृत्व के लिए ही प्रयोग किया जाता है परन्तु केवल सेना के लिए। इस तरह से यह अर्थभेद वाला शब्द है।
इसी दिन के राष्ट्रीय सहारा में प्रथम पृष्ठ पर मुख्य खबर में फ्लैग है सीबीआई ने बोफोर्स की दोबारा जांच की केंद्र से मांगी अनुमति’, और शीर्षक है -शुरू हुई जांच तो बढ़ेगी सियासी आंच।4 शीर्षक काव्यात्मक है परन्तु खबर कुछ और ही है। दरअसल सीबीआई ने इस मामले में सरकार से न्यायालय में याचिका दाखिल करने की अनुमति मांगी है जांच की नहीं। इसी अखबार में उसी दिन मुख्य पृष्ठ पर एंकर है युवा त्रिमूर्तिने जगाई गुजरात में  कांग्रेस की उम्मीदें। इसमें त्रिमूर्ति शब्द का प्रयोग विशेष है। हालांकि त्रिमूर्ति का भारतीय संस्कृति में एक विशेष अर्थ है - ब्रह्मा, विष्णु व महेश जिन्हें त्रिदेव भी कहा जाता है। इसी पृष्ठ पर एक अन्य खबर में अंग्रेजी शब्दों का प्रयोग किया गया है- करोलबाग में दो ज्वेलरी शॉप से करोड़ों की चोरी।5
वैसे सामान्यतः राष्ट्रीय सहारा की भाषा सहज होती है और छोटे-छोटे वाक्यों का प्रयोग किया जाता है परन्तु कई बार बहुत ही उलझाने वाले लम्बे वाक्यों का प्रयोग समाचार की पठनीयता को बाधित करता है। उदाहरण के लिए मुख्य पृष्ठ पर प्रकाशित बोफोर्स सम्बन्धी खबर के दूसरे पैराग्राफ को देखें तो वह एक वाक्य में है- सूत्रों के अनुसार, जांच एजेंसी ने कार्मिक एवं प्रशासनिक विभाग को भेजे पत्र में कहा है कि उसे इस मामले की जांच फिर से शुरू करने के लिए दिल्ली उच्च न्यायालय के आदेश को चुनोती देने के लिए उच्चतम न्यायालय में विशेष अनुमति याचिका दाखिल करने की इजाजत दी जाए।करीब 50 शब्दों के इस वाक्य को आदर्श नहीं कहा जा सकता। इसके साथ ही पूरी खबर पढ़ने के बाद पता चलता है कि शीर्षक सही नहीं है। सीबीआई ने केंद्र से इस मामले में कोर्ट में याचिका दायर करने की अनुमति मांगी है जाँच की नहीं।6
इसके बाद भी भाषा की शुद्धता व सरलता की दृष्टि से राष्ट्रीय सहारा की प्रशंसा करनी होगी। इस अखबार में अंग्रेजी के शब्दों या पीएम, एलजी जैसे शब्दों का कम ही प्रयोग किया जाता है। और यदि किया भी जाता है तो उसके लिए सम्पादकीय विभाग को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। जैसे इसी दिन के अखबार में पृष्ठ 10 पर सुधीश पचैरी का लेख आओ, विभाजन-विभाजन खेलेंकी खिचड़ी भाषा को देख सकते हैं। इसमें लेखक ने अंग्रेजी शब्दों का प्रयोग करने में बड़ी उदारता का परिचय दिया है जबकि उनके लिए हिंदी शब्दों की उपलब्धता को लेकर किसी तरह का संकट नहीं है।7 इसी प्रकार सहारा के उमंगपरिशिष्ट में विभिन्न लेखों में अनावश्यक रूप से अंग्रेजी शब्दों का प्रयोग खटकता है। इससे लेखों में जो भाषिक सौंदर्य होना चाहिए, वह लुप्त हो जाता है। फीचर लेखन जिसे हिंदी में ललित लेखन या रम्य रचना कहा जा सकता है उसमें भाषा की खिचड़ी उचित नहीं कही जा सकती। हालांकि इसके लिए सम्पादकीय विभाग को दोषी नहीं ठहराया जा सकता पर इससे भी इनकार नहीं किया जा सकता कि सम्पादकों को ऐसे लेखन व लेखकों को स्थान देने से बचना चाहिए, भले ही वे अपने क्षेत्र में प्रसिद्ध या विशेषज्ञ क्यों न हों।8
अब आइये देखते हैं देश के एक और प्रमुख अखबार नवभारत टाइम्स को। एक समय था जब नवभारत अपनी भाषा, वैचारिक निष्पक्षता, अपने परिशिष्ट आदि के कारण आदर्श माना जाता था। राजेन्द्र माथुर, सुरेन्द्र प्रताप सिंह जैसे पत्रकारिता के मानक इसके सम्पादक रहे। इतना ही नहीं, हिंदी साहित्य में निबन्ध लेखन को नई ऊंचाई तक ले जाने वाले विद्या निवास मिश्र भी इसके सम्पादक रहे। ऐसे अखबार के 22 अक्टूबर 2017 के अंक में पृष्ठ 3 की कुछ बानगियाँ देखिए- शीर्षक है- हटाया जा सकता है लाइफ सपोर्ट सिस्टम। खबर कुछ इस तरह शुरू होती है- इच्छा मृत्यु मामले को लीगलाइज्ड किए जाने के बाद सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक बेंच ने फैसला सुरक्षित रख लिया है। सुप्रीम कोर्ट ने 25 फरवरी 2015 को पैसिव यूथनेशिया ( परोक्ष इच्छा मृत्यु) से सम्बन्धित मामले को संवैधानिक बेंच को रेफर कर दिया था। पैसिव यूथनेशिया यानी मरीज की मौत के लिए इलाज बन्द करना या मेडिकल सपोर्ट हटा देना, ताकि दवा न मिलने पर उसकी मौत हो जाए।9 अंग्रेजी के शब्दों के प्रति ऐसा अनुराग दूसरे अखबारों में कम ही देखने को मिलता है। 
नवभारत टाइम्स के इसी अंक में एक अन्य खबर है जिसकी शुरुआत इस तरह से होती है- पत्नी से दोस्त के सम्बंधों के शक के चलते हॉरर मर्डर को अंजाम दिया गया था।10 यह है टीवी का अखबारों की भाषा पर असर। इस तरह से अचानक खबर का शुरू होना चकित करता है परन्तु बहुत प्रभावित नहीं। इस तरह की शुरुआत अपराध कथाओं की पत्रिकाओं में पढ़ने को मिलती थी पर अखबारों की यह शैली नहीं है।
इसी अखबार के कुछ शीर्षक हैं - बर्थ और डेथ सर्टिफिकेट फ्री देगा साउथ एमसीडी, हलवाइयों पर एमसीडी ने लिया यू-टर्न, 35 PCS अफसरों के तबादले। हद तो यह है कि इस अखबार में भाजपा की जगह रोमन लिपि में BJP शब्द के प्रयोग में कोई संकोच नहीं किया जाता (पृष्ठ 4), इंतहा यह है कि एक पृष्ठ का नाम है NBT FUTURE STARS रोमन लिपि में छापा गया है। (पृष्ठ 8)। इसी प्रकार पृष्ठ 10 का नाम स्पेशल स्टोरी है तो 11 का जस्ट लाइफ। इस अखबार में जिस तरह धड़ल्ले से अंग्रेजी के शब्दों के साथ ही रोमन लिपि का प्रयोग किया जाता है NBT] MNS] DNA (पृष्ठ 14)11 इन सब को देखकर लगता नहीं है कि यह वही अखबार है जो कभी हिंदी पत्रकारिता का मानक रहा है। दरअसल दिल्ली से प्रकाशित होने वाले हिंदी अखबारों में नवभारत टाइम्स ने ही अंग्रेजी शब्दों व रोमन लिपि के प्रयोग की शुरुआत की थी।
अब देखें उत्तर भारत के एक अन्य प्रमुख अखबार अमर उजालाको जिसके 19 संस्करण निकलते हैं। हिंदी क्षेत्र में, और विशेषरूप से उत्तर भारत में लोगों में अच्छी हिंदी का संस्कार स्थापित करने वाले अखबारों में अमर उजाला अग्रणी रहा है। पर आज इसकी स्थिति देखें तो भले ही इसकी प्रसार संख्या बढ़ी हो परन्तु भाषा की दृष्टि से इसका पतन हुआ है। इस अखबार के 22 अक्टूबर के अंक का अध्ययन इस दृष्टि से उपयुक्त होगा। यह भी आजकल नवभारत टाइम्स के पदचिह्नों पर चल रहा है। इसका पृष्ठ 3 देखें तो उसका नाम है अपना शहर हॉट सिटी, अब अपना शहर के साथ हॉट सिटी की क्या जरूरत थी समझ पाना मुश्किल है। इसी पृष्ठ पर तीन खबरों के शीर्षक देखने लायक हैं - कर्ज से परेशान इंजीनियर ने फंदा लगाकर किया सुसाइट, रेलवे ने फेस्टिव सीजन के लिए चलाई स्पेशल ट्रेनें, सुसाइट करने रेलवे ट्रैक पर लेटी महिला।12
वैसे शीर्षकों के कुछ उदाहरण छोड़ दिए जाएं तो अमर उजाला की भाषा शैली, खासकर वाक्य रचना सहज है। इसमें अपेक्षाकृत छोटे वाक्यों का प्रयोग और तारतम्यता पाठक को बांधती है। महाराष्ट्र में दूसरे प्रदेशों से आकर बसे लोगों के लिए परप्रांतीयशब्द का प्रयोग या हिमालय के अन्वेषक नैन सिंह जैसे पद पुराने अमर उजाला की उपस्थिति को दर्शाते हैं। (पृष्ठ 14) परन्तु जब उसी पृष्ठ पर मोटर एक्सीडेंट क्लेम के मामलों में यदि ड्राइवर का लाइसेंस फर्जी पाया जाता है..हलवे में कंकर आने की तरह है।13
इसी दिन का अमर उजाला का रविवारीय परिशिष्ठ मनोरंजनके मुख्य लेख लाइक में लाइफनए माध्यमों पर है इसलिए उसमें कुछ शब्द तो उचित हैं जैसे सोशल मीडिया, फेसबुक, व्हाट्सऐप आदि परन्तु चाइल्ड साइकोलॉजिस्ट को बाल मनोचिकित्सक भी लिखा जा सकता है जो सबकी समझ में आता है। इसी प्रकार चार कैटेगिरी, स्पेसिफिक इमोशन्स, कलेक्ट, मैसेज, लेवल जैसे शब्दों से बचा जा सकता है। इसी खण्ड के पृष्ठ 3 पर एक लेख में अनेकोंशब्द लिखा गया है, बहुवचन का बहुवचन कमाल का प्रयोग है। इसी पृष्ठ पर खानपान पर लेख में रेस्तरां, मेन्यू शब्दों से भी बचा जा सकता था। इसी खण्ड के 2 से 4 नम्बर के पृष्ठों पर मनोरंजन के साथ Sunday लिखना क्यों जरूरी है समझना मुश्किल है।14
हिंदी अखबारों की बात हो और इंदौर का नाम न आए ऐसा हो नहीं सकता। एक समय अपनी भाषा और अन्य पक्षों के लिए इंदौर से प्रकाशित समाचार पत्र मानक थे परन्तु आज स्थिति एकदम विपरीत है। 1983 में जब इंदौर से भास्कर का प्रकाशन शुरू हुआ तो मैं उसमें प्रशिक्षु के रूप में काम करने लगा था। उन दिनों किसी भी खबर में गलती छूट जाने पर सम्पादक के सामने पेशी हो जाती थी। अब पता नहीं वैसा होता है या नहीं, पर जिस अखबार में काम करते हुए मैंने हिंदी सीखी उसमें आज अंग्रेजी का बोलबाला है। 22 अक्टूबर के दैनिक भास्कर का पृष्ठ 2 देखें तो उसका नाम ही है लाइफ - मैनेजमेंट। उसपर जो सामग्री प्रकाशित है उसमें ड्रग एडिक्ट, एक्टर, थॉट, गॉसिप सहित अनेक अंग्रेजी शब्दों का इस्तेमाल किया गया है। हालांकि खबरों में अंदर सरस हिंदी है और अंग्रेजी शब्दों का प्रयोग कम है परन्तु शीर्षक में उनका प्रयोग उचित कैसे कहा जा सकता है।15 इसी प्रकार पृष्ठ 4 पर एक खबर में अप्रूव प्रोजेक्ट, डिस्ट्रीब्यूशन लाइन, लीकेज, ज्वाइंट वैंचर जैसे शब्दों का प्रयोग किया गया है।16 इसके साथ ही पृष्ठ 12 का नाम बिजनेस रखा गया है। इस पृष्ठ पर प्रकाशित समाचारों में अंग्रेजी शब्दों की भरमार खटकती है।
इंदौर से प्रकाशित नई दुनिया ऐसा अखबार है जिसने अपनी भाषा व प्रस्तुतिकरण के लिए कई बार पुरस्कार जीता है पर अब इसमें भी भाषा को लेकर पहले जैसी प्रतिबद्धता दिखाई नहीं देती। नई दुनिया के उज्जैन संस्करण के 22 अक्टूबर के अंक में पहले पृष्ठ पर ही एक शीर्षक है - हिंगोट युद्ध में 50 साल में पहली वार एक की मौतइसमें बार की जगह वार छपा है जो गलत है। इसी पृष्ठ पर पुलिस पर हमले वाली खबर में भाषा की गलतियां हैं। जैसे-‘.... छिप कर बैठे हत्या का आरोपी व उसके भाई.....इसमें हत्या के आरोपी लिखा जाना चाहिए था। इसी समाचार में आगे एक जगह लिखा गया है उसे मेघनगर के जीवन ज्योति अस्पताल ले जाया गया और यहां से...इसमें यहां की जगह वहां या जहां शब्द लिखा जाना चाहिए था।17
नई दुनिया के इंदौर संस्करण के 22 अक्टूबर के अंक में हिंगोट वाली खबर में तो गलती को ठीक कर लिया गया परन्तु पुलिस पर हमले वाली खबर में नहीं। इसी अंक में पृष्ठ 28 पर प्रकाशित समाचारों में अंग्रेजी शब्दों का प्रयोग देखकर आश्चर्य होता है कि क्या यह वही अखबार है जो कभी मानक हुआ करता था और जिसने राजेन्द्र माथुर जैसा सम्पादक दिया।18
इस प्रकार आज हम पाते हैं कि हिन्दी अखबारों में ही हिन्दी का समुचित आदर होना कम होता जा रहा है। अंग्रेजी भाषा में कोई बुराई नहीं है और न ही उसके प्रयोग में। बात बस इतनी सी है कि हम किस मंशा से उसका प्रयोग कर रहे हैं। ऐसा लगता है कुछ अखबारों ने जानबूझ कर अंग्रेजी शब्दों का प्रयोग करना शुरू किया है ताकि हिन्दी भाषी लोगों को हिंग्लिश भाषी बनाया जा सके। यह एक तरह से भाषिक गुलामी की ओर प्रस्थान है। भाषा की शुद्धता के प्रति किसी भी तरह की प्रतिबद्धता न रहना और आवश्यक न होने पर भी मखमल में टाट के पैबंद की तरह अंग्रेजी के शब्दों का प्रयोग एक तरह का सांस्कृतिक विचलन है। समाचार पत्रों का काम भाषा का संस्कार बनाना है बिगाड़ना नहीं, परन्तु लगता है कि आजकल के पत्रकार यह बात भूलते जा रहे हैं। 

1.            हिन्दुस्तान, 22 अक्टूबर के अंक में पृष्ठ 6
2.            वही पृष्ठ 6
3.            वही, 22 अक्टूबर 2017 पृष्ठ 16
4.            राष्ट्रीय सहारा, 22 अक्टूबर 2017 पृष्ठ 1
5.            राष्ट्रीय सहारा, 22 अक्टूबर 2017 पृष्ठ 1
6.            राष्ट्रीय सहारा, 22 अक्टूबर 2017 पृष्ठ 1
7.            वही, पृष्ठ 10
8.            वही, उमंग परिशिष्ट
9.            नवभारत टाइम्स, 22 अक्टूबर 2017, पृष्ठ 3
10.          वही
11.          वही
12.          अमर उजाला, 22 अक्टूबर 2017 पृष्ठ 3
13.          वही, पृष्ठ 14
14.          वही, मनोरंजन परिशिष्ट
15.          दैनिक भास्कर, इन्दौर, 22 अक्टूबर 2017, पृष्ठ 2
16.          वही, पृष्ठ 4
17.          नई दुनिया, उज्जैन संस्करण, पृष्ठ 1
18.          नई दुनिया, इन्दौर, पृष्ठ 28

Dr. Ved Prakash Bhardwaj
Assistant Professor, BJMC department,  IIMT group of collages Greater Noida