स्वप्न और यथार्थ
पिछले दिनों मेरे कुछ रेखांकनों को देख कर कलाकार मित्र सिरज सक्सेना को औंकारेश्वर, मांडू और उज्जैन की याद हो आयी। मुझे लगा मेरे रेखांकन सफल हो गये। वे तमाम रेखांकन मैंने 2012 में अपनी भोपाल यात्रा के समय बनाये थे जिनके पीछे एक तरफ मेरा अपना अनुभवजन्य यथार्थ था तो दूसरी तरफ मध्यप्रदेश की आदिवासी कला के प्रति मेरा लगाव। आदिवासी कलाएं और लोक कलाएं सदैव से ही मुझे नयी शक्ति देती रही हैं, फिर वे चाहे कहीं की भी हों। बहरहाल सिरज भाई ने मेरी टिप्पणी के जवाब में यथार्थ से बिम्ब उठाकर रचने की बात कही तो मुझे लगा कि इस पर विचार किया जाना चाहिए और कलाकार मित्रों से साझा करना चाहिए। पर यह मेरा एकालाप न होकर यदि कलाकारों के बीच एक सामूहिक विचार मंथन हो तो बेहतर होगा, भले ही उसका कोई निष्कर्ष न निकले। नवल शुक्ल के अनुसार कभी कोई काम न करना भी रचनात्मकता का ही हिस्सा होता है। इसी प्रकार निष्कर्षहीन संवाद भी महत्वपूर्ण होता है।
बहरहाल, बात थी यथार्थ की जिसके साथ मैं स्वप्न को भी जोडना चाहूंगा। यथार्थ और स्वप्न, दोनो ही भ्रमित करते हैं क्योंकि दोनो ही बहुआयामी होते हैं। यह बहुत निजी मामला होता है कि हम उन्हें कैसे देखते हैं और जीते हैं। दोनो का ही वजूद जिन्दा रहने के लिये जरूरी होता है। यदि ऐसा नहीं होता तो मेरा मानना है कि गुफावासी मनुष्य ने ना तो कंदराओं की दीवारों पर चित्रों को उकेरा होता और ना ही भाषाओं का जन्म हुआ होता। दुनिया के सारे कमाल, जिनमें कलाएं भी शामिल हैं, यथार्थ और स्वप्न के चलते ही संभव हुए हैं। फिर यह हम पर निर्भर करता है कि हम यथार्थ को किस तरह बरतते हैं क्योंकि यथार्थ के साथ हमारे व्यवहार पर ही स्पप्नों का संसार संभव हो पाता है।
कुछ लोग यथार्थ को भुलाकर केवल सपनों में जीते हैं परन्तु जो लोग यथार्थ को अपने सपनों का आधार बनाते हैं वे अपने सपनों को यथार्थ बना लेते हैं। पाश ने कहा था fd ‘बहुत खतरनाक होता है सपनों का मर जाना, और बात सही भी है क्योंकि सपने न हों तो मनुष्य के लिये जीवन दुष्कर हो जाएगा। पर सवाल उठता है कि उन सपनों का आधार क्या हो। मेरा निजी मत है कि हमें सपनो का महल यथार्थ की नींव पर ही बनाना चाहिए। कला हमारे लिये एक स्वप्न की तरह है और उसमें कहीं न कहीं हमारा वह अनुभव शामिल रहता ही है जो यथार्थ से संभव हुआ है। हम कहीं भी रहें, किसी भी माहौल में रहें फिर भी हम अपने अनुभवजन्य यथार्थ से मुक्त नहीं हो सकते। यदि ऐसा नहीं होता तो स्वामीनाथन को आदिवासी कला को अपने रचनात्मक अनुभव का हिस्सा नहीं बनाना पडता। पिछले दिनों एक कला शिविर में मैंने एक छात्रा का रेखांकन देखा जो ठेठ राजस्थानी लोककला से था। वह उसका यथार्थ था, उसका अनुभव था। मैंने उसे सलाह दी कि वह चाहे तो अपने इसी अनुभव को समकालीन कला भाषा में भी रूपांतरित कर सकती है। कई कलाकार ऐसा कर रहे हैं। चिंतन उपाध्याय के यहां इसे साफ देखा जा सकता है, धर्मेन्द्र राठौर के यहां भी यह है। दक्षिण भारत के कई कलाकार ऐसा कर रहे हैं। मध्यप्रदेश के कई कलाकारों में यही अनुभवजन्य यथार्थ एक नये स्वप्न के रूप में संभव होता दिखाई देता है, हालांकि उसकी भाषा थोडी मुश्किल है, क्योंकि वहां अमूर्तन है और किसी स्वप्न की तरह अधिक प्रतीत होता है जबकि वास्तव में तो वह जीवनानुभव की यानी कि यथार्थ की कल्पनात्मक अभिव्यक्ति है। हुसेन बार-बार घोडों और मालवीय संदर्भों की तरफ लौटते थे तो रजा आज तक बचपन के उस अनुभव के आनन्द में सराबोर हैं।
यह विषय एक ऐसी यात्रा है जिसका कोई अंत नहीं है। मेरे कलाकार मित्र यदि इस वैचारिक यात्रा में सहभागी बनें तो मुझे बहुत खुशी होगी।
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