Wednesday, June 19, 2013

मुखौटे: कल और आज



मुखौटे: कल और आज
मुखैाटे बनाना मनुष्य ने कब शुरू किया होगा यह तो कह पाना मुश्किल है परन्तु गुफावासी मनुष्य ने उसकी कल्पना जरूर की थी इसमें कोई संदेह नहीं है। भारत में मध्यप्रदेश के भीमबेटका सहित दुनियाभर में जो गुफा चित्र मिले हैं उनमें से कई में मुखौटों की या उनके जैसे प्रतीत होते आकारों की संरचना मिलती है। शायद मनुष्य ने पहली बार मुखौटे के बारे में तब सोचा होगा जब उसने खुद से बलशाली प्रतीत होने वाले पशुओं को मारने में कामयाबी पायी होगी। बहुत संभव है कि तब उसने उस पशु की खाल को शरीर पर लपेट कर और उसके चेहरे को अपने चेहरे पर लगाकर स्वयं में उसकी शक्ति होने का अहसास पाया होगा। और यह भी संभव है कि उसने ऐसा पहले दूसरे मनुष्यों और जानवरों को डराने के लिये किया हो और धीरे-धीरे वह उसके मनोरंजन का साधन बन गया हो। आज भी आदिवासी नृत्यों में पशुओं के मुखौटों के प्रयोग का शायद यही कारण है।
बहरहाल, जब हम आधुनिक और समकालीनक कला की बात करते हैं तो पाते हैं कि वहां भी मुखौटे अपनी सुदीर्घ सांस्कृतिक परम्परा के प्रवाह की तरह मौजूद है। आधुनिक शिल्प कलाकारों ने कभी स्वतंत्र रूप में तो कभी अपने ही शिल्प के एक हिस्से के रूप में मुखौटों की रचना की है। अनेक चित्रकारों ने भी अपने चित्रों में मुख्य आकृति के चेहरे पर या पृष्ठभूमि में अलग-अलग संदर्भों में मुखौटों को रचा है।
आधुनिक कला में मुखौटों की रचना के पीछे कलाकारों का लक्ष्य कभी मनुष्य के आंतरिक व्यक्तित्व को सामने लाना रहा तो कभी उसके व्यक्तित्व की कृत्रिमता को। दरअसल मुखौटा एक ऐसा प्रतीक है जो अपने प्रयोग और संदर्भ के अनुरूप व्यक्ति के सकारात्मक और नकारात्मक, दोनों तरह के व्यक्तित्व की अभिव्यक्ति करने में समर्थ है। कला के अलावा भी आधुनिक समय में हम देख सकते हैं कि ग्रामीण भारत में ही नहीं बल्कि कई जगह शहरी जीवन में भी लोग घरों के बाहर एक डरावने आकार का मुखौटा लगाते हैं ताकि उनका घर बुरी नजरों से बचा रहे। भारतीय खेतों में दिखाई देने वाला बिजूका भी एक तरह का मुखौटा ही है। भारतीय लोक कलाओं और कथकली जैसे कई नृत्यों में भी मुखौटों का प्रयोग किया जाता है। फैशन की दुनिया में माडलों द्वारा मुखौटे पहनना आम है तो शहरी जीवन में उच्च वर्गों की पार्टियों में मुखौटे पहनने का चलन है। इन सब बातों का अर्थ यह है कि मुखौटे आदिमानव से लेकर आधुनिक मनुष्य तक के जीवन में एक महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं।
नव सिद्धार्थ आर्ट ग्रुप, नयी दिल्ली ने एक बड़ा कदम उठाया है। उसने भारत के विभिन्न प्रांतों के वरिष्ठ और युवा कलाकारों के साथ-साथ अन्य देशों के कलाकारों को मिलाकर करीब 300 कलाकारों से मुखौटे की रचना करायी है। इससे पहले भी ऐसे कुछ प्रयास हुए परन्तु उनमें एक तो कलाकारों की संख्या कम भी, दूसरे कलाकारों ने अपनी पसंद के माध्यम और आकार में मुखौटों की रचना की थी। इस प्रदर्शनी के लिए कलाकारों को फायबर में बने एक ही आकार-प्रकार का मुखौटा दिया गया जिसे उन्हें अपनी तरह से एक कलाकृति में परिवर्तित करना था। यह देखकर सुखद आश्चर्य होता है कि करीब 300 कलाकारों ने एक ही आकार-प्रकार के मुखौटे पर काम किया है परन्तु उनमें से किसी का भी काम आपस में मिलता नहीं है। एक तरफ हमारे सामने ऐसे मुखौटे हैं जो रेखाचित्र कहे जा सकते हैं तो दूसरी तरफ ऐसे भी हैं जो पूर्ण शिल्प प्रतीत होते हैं। अनेक कलाकारों ने कोलाज तकनीक का भी प्रयोग किया है। कई कलाकारों ने पेपरमैशी और अन्य सामग्री का प्रयोग कर मुखौटे को एक अलग आयाम दिया है तो अनेक कलाकारों ने उसे एक ऐसे चित्र में बदल दिया है जिसमें सतह में मुखौटा होने आभास तक नहीं होता।  प्रत्येक कलाकार ने अपनी शैली और माध्यम में इतने भिन्न आयामों और संदर्भ में रचा है कि इस प्रदर्शनी को समकालीन भारतीय कला के एक बड़े कलाकार वर्ग की सृजनात्मकता की प्रतिनिधि कहना गलत होगा।
वेद प्रकाश भारद्वाज
कलाकार एवं समीक्षक 

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