व्यंग्य
खेला होगा कि नहीं होगा
डॉ. वेद प्रकाश भारद्वाज
इधर ममता जोर मार रही है। ममता की शक्ति को कौन नहीं जानता। हिंदी में इस नाम से फ़िल्म भी बन चुकी है। कई फिल्मों की मिसाल है जिनमें मां की ममता या बच्चों के ममता के सम्मान का महिमा मंडन मिलता है। पर हम यहां ममता बनर्जी की बात कर थे हैं यानी ममता दीदी। इधर बंगाल फतह करने के बाद एकबार फिर वह खेला होबे की संभावना तलाशने दिल्ली आ गई। अब छींका टूटेगा या नहीं पता नहीं पर यह जो दिल्ली है बड़ी संगदिल है। यह सपना सबको दिखती है। वैसे भी लोकतंत्र में क्या जनता क्या नेता, सपना देखने का सबको अधिकार है, जैसे खेलने का सबको अधिकार है। भारतीय राजनीति के खेल के सामने तो ओलम्पिक भी कुछ भी नहीं है। वहां सोने, चांदी के एक टुकड़े की लड़ाई है यहां तो सात पुश्तों के लिए सोने की खान का इंतज़ाम हो सकता है। जीवन भर पेंशन और बाकी सुविधाएं तो हैं ही। कहीं एक बार मंत्री पद की दौड़ में जीत गए तो पूरे खानदान का सिर सोने की खान में हो जाता है। ऐसे में हर एक नेता इसी चिंता में रहता है कि खेला होगा कि नहीं होगा।
इस खेला में खिलाड़ी कम हैं रैफरी ज्यादा, कप्तानी के दावेदारों की भी लाइन लगी है। खेल हो तो कैसे हो। ममता दीदी ने कहा तो दिया है कि कप्तान कोई भी हो उन्हें आपत्ति नहीं है। वह ममता हैं और ममता हमेशा दयालु होती है और दया भाव में व्यक्ति कुछ का कुछ बोल जाता है पर दिल की बातें दिल ही जाने। बंगाल में उन्होंने अच्छा खेला। जो खिलाड़ी उनकी टीम छोड़ गए थे फिर से लौट आए हैं। जोड़-तोड़ के खेल में उन्होंने साबित कर दिया है कि हम किसी से कम नहीं हैं। वैसे जोड़-तोड़ का खेल करने की कोशिश तो 2019 में भी खूब हुई थी। कोलकाता, हैदराबाद, लखनऊ होते हुए दिल्ली तक में लोगों ने अखाड़ा जमाने की कोशिश की भी पर मजमा जमने से पहले ही हर कोई रुस्तमे हिंद का दावेदार बन गया। खेल से पहले ही ख़िताब की दावेदारी ने एकता की किताब के पन्ने-पन्ने कर दिए। ख्वाहिशों के परिन्दे उड़े जरूर पर बिना पंख के कितना उड़ पाते। मामा, चाचा, ताऊ, भाई, बहन, बुआ, भतीजा; रिश्तों की कितनी ही डोर बांधी गई पर गठबंधन की पतंग ज्यादा दूर उड़ नहीं सकी। संशय की हवा के एक झोंके में फरफराते हुए धरती पर आ गिरी।
अभी 24 दूर है पर उससे पहले खुद को 21 साबित करने के खेल की तैयारी शुरू हो गई है। फिर अगले साल उत्तर प्रदेश के मैदान में खेल होना है। रिहर्सल के लिए अच्छा मौका है। पर वहां बहनजी भारी हैं, भैयाजी भी मैदान में हैं। बिहार के लाल भी वहां दांव खेलने की संभावना तलाश रहे हैं। अजब अखाड़ा बन गया है। किसी के आपस जाति का दांव है तो किसी के पास गठबंधन का। कोई धर्म का दांव लगाने की तैयारी में है तो कुछ बिना दांव के भी ताल ठोक रहे हैं। खेल करने की पूरी तैयारी है, पर मन ही मन डर भी रहे हैं- खेल होगा कि नहीं। पुराने खिलाड़ियों की सारी आशा इस बात पर टिकी है कि कुछ ऐसा खेल हो जाए कि उनका खेल बन जाए।
इधर पंजाब में खेला हुआ, उत्तराखंड में हुआ, कर्नाटक में हुआ, और राजस्थान में भी कुछ हुआ। बड़े कप्तान साहब ने तो टीम में ही खेला कर दिया। कुछ को धोबी पाट मारा तो कुछ को मंत्री पद की खूंटी पर लटका दिया। क्या पक्ष, क्या विपक्ष हर कोई अपना खेला जमाने की कोशिश में है। पिछली बार हारे खिलाड़ी चाहते हैं कि इस बार दर्शक यानी जनता उनके हक में खेल जाए। पर कोई जनता से पूछ नहीं रह है कि उसे खेलना भी है या नहीं? जनता तो हर बार बस इतना ही कह पाती है कि खेला हो गया। असली खेल तो नेताओं का है। इसलिए हर नेता एक-दूसरे से पूछता है खेला होगा कि नहीं होगा?