डॉ. वेद प्रकाश भारद्वाज
पिछले दिनों कोरोना संकट के कारण शहरों
में मजदूरों और अन्य कामगारों के पलायन के जिस तरह के दृश्य सामने आये उसने
सामाजिक और आर्थिक चिंतकों के सामने कई नये प्रश्न खड़े कर दिये हैं। सबसे बड़ा
प्रश्न तो यही है कि पिछले सालों में हम इस बात पर गर्व करते रहे हैं कि भारतीय
अर्थव्यवस्था विश्व की पांचवी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन गयी है और उसने फ्रांस
सहित कई देशों को पीछे छोड़ दिया है। पर आज यह बात कही जा रही है कि यदि हमारा देश
और देशवासी दो महीने का संकट भी नहीं झेल सके हैं तो इसका अर्थ है कि हमारी
अर्थव्यवस्था खोखली है। जो दावे अभी तक किये गये वह सिर्फ कागजी थे। इस बात को
अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष, विश्व बैंक और
अंतरराष्ट्र श्रम संगठन की रिपोर्टाें ने और गंभीर बना दिया है। इन रिपोर्टों में
बढ़ती बेरोजगारी और गरीबी की तरफ जो संकेत किये गये हैं वह काफी गंभीर है।
देश में गरीबी के मानकों और उनकी स्थिति
को लेकर हमेशा बहस चलती रही है। पर इसमें कोई संदेह नहीं कि पिछले दस साल में भारत
सरकार विकास के जिन आंकड़ों पर गर्व करती रही है वह सब कागजी शेर निकले हैं। यह कम
आश्चर्य की बात नहीं है कि दिल्ली-मुंबई जैसे शहरों में वर्षों से काम कर रहे लोग
अपने जीवन में इतना भी पैसा नहीं बचा सके कि कोरोना के कारण लाॅकडाउन की स्थिति
में कमाई बंद होते ही भुखमरी की स्थिति में पहुंच गये। हालांकि सरकार का बचाव करने
वाले तर्क दे रहे हैं कि हजारों रूपये घर वापसी के लिए खर्च करने वाले मजदूरों का
यह दावा सही नहीं है कि उनके पास खाने को कुछ नहीं था। परंतु यह तर्क देने वाले
लोग भूल जाते हैं कि उनके पास जो पैसा था वह एक तो ऐसी स्थिति के लिए नहीं था
जिसमें वह कमाने में सक्षम होकर भी कुछ कमा न सकें। वह पैसा पारिवारिक दायित्वों
को पूरा करने और हारी-बीमारी में काम आने के लिए बचाया गया होता है। कोरोना संकट
में ऐसी कोई स्थिति नहीं थी। फिर ऐसा भी नहीं है कि लाॅकडाउन शुरू होते ही मजदूरों
में भगदड़ मच गयी थी। कुछ दिन उन्होंने इंतजार किया परंतु जब लगा कि स्थिति जल्दी
सुधरने की उम्मीद नहीं है और उनके पास जो कुछ बचा था वह तेजी से समाप्त होने लगा
तो उनमें बेचैनी फैलना स्वाभाविक था। एक बात यह भी है कि कुछ हजार मजदूर हो सकता
है हजारों रूपये खर्च करके घर के लिए निकल पड़े हों परंतु जो मजदूर अपने बच्चों के
साथ पैदल ही सैकड़ों किलोमीटर का सफर पूरा करने निकल पड़े थे, उनके
बारे में क्या कहा जाएगा?
अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के नये आंकलन के
अनुसार विश्व में गरीबों की संख्या में अप्रत्याशित वृद्धि हुई है। गरीबी के
वैश्विक पैमाने के अनुसार प्रतिदिन 1.90 डाॅलर यानी करीब 135 रूपये प्रतिदिन खर्च करने वाले व्यक्ति को गरीब की श्रेणी में रखा जाता
है। हालांकि खर्च की यह सीमा भारत की दृष्टि से बहुत अधिक है। भारत में तो 135 रूपये प्रतिदिन चार सदस्यों के परिवार का खर्च माना जाता है। बहरहाल,
वैश्विक मानक को अपनाकर चलें तो आईएमएफ के ताजा आंकलन के अनुसार दुनिया
में कोविड 19 के प्रभाव के कारण दुनिया में गरीबों की
संख्या करीब 5 करोड़ बढ़ गयी है। पिछले साल अनुमान लगाया
था कि 2020 में दुनिया में गरीबों की संख्या करीब 60 करोड़ होगी। परंतु कोविड 19 के कारण आईएमएफ ने
इस अनुमान को संशोधित करते हुए संख्या को 64
करोड़ माना था परंतु अब जो नया आंकलन सामने आया है उसके अनुसार गरीबों की संख्या 69 करोड़ होगी। वैसे यह भी अंतिम आंकड़ा नहीं है क्योंकि अलग-अलग देशों में
गरीबी रेखा का मानक अलग-अलग है। भारत में ग्रामीण क्षेत्र में 32 रूपये और शहरी क्षेत्र में 47 रूपये प्रतिदिन
खर्च करने वाले व्यक्ति को गरीब नहीं माना जाता। यानी इससे कम खर्च करने की क्षमता
वाले व्यक्ति को ही गरीब माना जाता है। यानी आईएमएफ या अमरिका का गरीबी का मानक
भारत से बहुत ऊंचा है। इसके बाद भी यदि हम आईएमफ की बात पर यकीन करें तो भारत में
वैश्विक मानक के आधार पर भी कोविड 19 से उत्पन्न
स्थियों से गरीबों की संख्या करीब एक करोड़ बढ़ने की आशंका है।
इसके विपरीत विश्व बैंक और अंतरराष्ट्रीय
श्रम संगठन की हालिया रिपोर्टों को देखें तो उनमें कहा गया है कि भारत में कोरोना
के कारण करीब 40 करोड़ कामगारों की नौकरी पर खतरा मंडरा
रहा है। इनके कारण करीब 4 करोड़ कामगार और
उनके परिवार गरीबी की चपेट में आ सकते हैं। जाहिर है कि भारत के लिए आने वाली
स्थिति कोई बहुत अच्छी नहीं कही जा सकती। भारत में वैसे भी श्रमिकों व अन्य
कामगारों के लिए स्थितियां बहुत अच्छी नहीं थीं। भारत में करीब 50 करोड़ कामगार हैं जिनमें से 40 करोड़ से अधिक
असंगठित क्षेत्र में काम करते हैं। यानी उन्हें न तो श्रम कानूनों का कोई विशेष
लाभ ही मिल पाता है और न ही उन्हें किसी तरह की आर्थिक व सामाजिक सुरक्षा प्राप्त
होती है। उनकी नौकरी हमेशा अस्थायित्व के संकट का सामना करती रहती है। यहां तक कि
जिन नौकरियों को स्थायी माना जाता है, वह भी अस्थायी ही
होती है।
एक तरफ तो नौकरियों का यह अस्थायित्व है
और दूसरी तरफ बहु संख्यक लोगों का ऐसे कामों में लगा होना है जिन्हें हम रोज कुंआ
खोदकर पानी पीने की श्रेणी में रख सकते हैं। भारत में ऐसे करोड़ों कामगार हैं जो
घरों में काम करते थे ऑटो-टैक्सी
चलाते थे, रिक्शा चलाते थे, खान-पान
की दुकान लगाते थे, कपड़े प्रेस करते थे, बाजार में मजदूरी करते थे, कारखानों में
दिहाड़ी श्रमिक थे, निर्माण कार्यों में दिहाड़ी मजदूर थे। इन
सब लोगों का काम छूट चुका है। इनमें से बड़ी संख्या में लोग अपने घरों को लौट गये
हैं जहां उनके लिए जीवन पहले ही कष्टकर था। यही लोग और उनके परिवार के लोग गरीबी
की चपेट में आने वाले हैं। यदि वैश्विक मानक को मानें तो भारत में गरीबों की
संख्या और अधिक हो जाएगी। यानी कोराना महामारी का संकट अभी थमने वाला नहीं है।
उसके प्रत्यक्ष प्रभाव जो होने हैं वो तो हैं ही, उसके
अप्रत्यक्ष प्रभाव अधिक घातक होने वाले हैं जिनमें से एक गरीबों की बढ़ती संख्या
होगी।