वेद प्रकाश भारद्वाज
अब इसका क्या किया जाए कि ऊपर वाले के मन में जाने क्या समाई कि उसने एक की
जगह कई रंग बना दिये। वैसे साइंस कहती है कि रंग तो एक ही है सफेद, बाकी तो उससे निकले भ्रम हैं
जो हमें दिखाई देते हैं। सूर्य की रौशनी से प्रतिबिम्बित होकर रंग दिखाई देते हैं।
इसीलिए रंग तो भ्रम हैं यथार्थ तो रंगहीन है। शेक्सपीयर ने कहा था कि नाम में क्या
रखा है, मैं कहना चाहता हूँ
कि रंगों में क्या रखा है। वैसे रंगों की महीमा का बखान हमारे यहाँ साहित्य से
लेकर सिनेमा तक होता रहा है। किसी को रंग-रंग के फूल खिलने के बाद भी कोई रंग नहीं
भाता तो कोई गाता फिरता है कि ये लाल रंग कब मुझे छोड़ेगा। कुछ अधिक प्रतिभावान लोग
फूलों के रंग से दिल की कलम से पाती लिखते भी पकड़े गये हैं। ऐसे लोगों के बीच रंग
भरे मौसम से रंग चुराने वाली प्रतिभाओं को देख-सुनकर हमारा सिर गर्व से तन जाता
है। दुनिया में अपना नाम ऐसे ही नहीं है। आज पूरी दुनिया भारतीय प्रतिभा की कायल
है। पर इधर रंगों का खेल कुछ लोगों की आंखों में चुभ रहा है।
धूमिल ने तीन रंगों को ढोने वाले पहिये का जिक्र अपनी कविता में किया था। पर
अब समय बदल गया है। इधर पुराने कई रंग फीके पड़ गये हैं। वैसे एक प्रश्न तो हमारे
पूर्वज कर ही गये हैं कि ‘रंगी को नारंगी कहे’ पर इधर जिस रंग की धूम है वह है भगवा। जिसे देखो वही भगवा रंग के रंग में रंगा
है, चाहे वह उसका समर्थक
हो या विरोधी। होशियार लोग बताते हैं कि सत्रहवीं लोकसभा के चुनाव में भाजपा इसलिए
पहले से ज्यादा सीटें जीत पायी क्योंकि उसके विरोधी दल हर वक्त उसका नाम लेते रहते
थे। भाजपा और मोदी ने अपना प्रचार उतना नहीं किया जितना विरोधियों ने किया।
कहते हैं कि बदनाम होंगे तो क्या नाम न होगा और जिसका नाम होगा क्या वो कामयाब
न होगा? यार लोगों ने पता
नहीं कहाँ-कहाँ से कैसे-कैसे फार्मूले निकाल लिये हैं। रंगों को खेल भी इनमें से
एक है। ले-देकर भारतीय राजनीति में साठ के दशक तक तीन ही रंग थे। एक लाल था तो
दूसरा केसरिया और तीसरा दोनों के साथ हरा लेकर तिरंगा यानी अपनी प्यारी कांग्रेस
जो कभी एक राजनीतिक दल हुआ करती थी। फिर धीरे-धीरे रंगों का विस्तार हुआ। समाजवादी
इस बात में यकीन रखते थे कि समान विचार वालों को जोड़ो और जोड़ न सको तो तोड़ दो।
जोड़ने का काम उनसे हुआ नहीं इसलिए ज्यादातर तोड़ने में ही लगे रहे। 1952 में एक हुए तो 57 में अनेक। एक से अनेक की इस
यात्रा में भारतीय राजनीति को कई रंग दिये। हरा रंग पहले भी अलग पहचान के लिए लाठी
पर टिका खड़ा था पर उन दिनों उसपर कांग्रेस का कॉपीराइट था। झगड़ा उस वक्त शुरू हुआ
जब कांग्रेस में जूतियों में दाल बंटने लगी और वह अखिल भारतीय के साथ ही क्षेत्रीय
भी होने लगी। कांग्रेस अर्स, कांग्रेस बरूआ, कांग्रेस तिवारी और पता नहीं कौन-कौन सी कांग्रेस सामने आयी। इनके अलावा भी कई
और दल कांग्रेस की कोख से निकले पर सब ने तीन रंगों के मेल को नहीं छोड़ा। जनसंघ से
भाजपा बनी तो उसने अकेले भगवा को छोड़ कर उसके साथ हरा मिला लिया। मिलावट का यह खेल
शुरू में उसके काम नहीं आया पर वर्तमान बता रहा है कि रंगों को यह मिश्रण उसे बहुत
फलदायी रहा।
लाल-हरा और हरा-लाल करके सब अपनी दुकान चमकाते रहे। बसपा नीला रंग लेकर आ गयी
तो शिवसेना भगवा पर अड़ी रही। बाकी दलों ने भी अपने-अपने रंग चुन लिये। सबको अधिकार
है अपनी पसंद का रंग चुनने का। जनता को भी है। इसीलिए वह कभी तिरंगा (कांग्रेस) तो
कभी दो रंगा (भाजपा) को मौका देती रही। बीच में कभी हरा (जनता दल) को भी मौका मिल
गया। यानी भारतीय राजनीति का चरित्र पूरी तरह रंग-बिरंगा बना रहा। राज्यों में भी
सपा, बसपा, तेदेपा, माकपा, एआईडीएमके, डीएमके
आदि कभी-कभी अपना
रंग चमकाने में सफल रहे। यह अलग बात है कि इतनी रंग-बिरंगी राजनीति के बाद भी जनता
का जीवन हमेशा बदरंग ही रहा है। वह तो भला हो चुनाव का कि कुछ दिन के लिए जीवन
रंगीन हो जाता था पर अब तो वह भी चुनाव आयोग की भेंट चढ़ गया है। फिर भी जनता हर
मौके पर अपने चेहरे के लिए कोई न कोई रंग चुन ही लेती है। कभी खुशी कभी गम की आदी
जनता के लिए कुर्सी पर कोई रंग हो उसकी जिंदगी तो बदरंग ही रहना है। ‘दस प्रतिशत रंगीन हैं बाकी
सब गमगीन हैं’ के फार्मूले पर देश सात दशक से चल रहा
है।
इधर कुछ समय से भारतीय राजनीति ने रंग बदला है। अब यह रंग राजनीति ने बदला है
या किसी और ने उसे ऐसा करने को मजबूर किया है, इस विचारवान बहस में हम नहीं पड़ने वाले। आंखों को
जो दिखाई दे वही रंग है तो फिर जो दिख रहा है उससे आंखें फेरने का क्या मतलब है?
इधर मोदी जी गुजरात से निकल
कर दिल्ली आ गये। और ऐसे आ गये कि दूसरी बार भाजपा के रंग में देश को रंग दिया। जो
जीता वही सिकंदर की जगह जो जीता वही नरेंद्र का नारा चल पड़ा है। हमारे बहुत से
बुद्धिजीवी अपनी महानता के खोल से जब-तब निकल कर ‘भगवा आया- भगवा आया’ का विलाप करने लगते हैं। आज जो भाजपा है वह जब
जनसंघ हुआ करती थी तो उसके झंडे का रंग भगवा ही था। पर जब से वह भाजपा बनी उसने हरे
को भी अपने साथ मिला लिया। फिर भी भाई लोग हैं कि आज भी उसे भगवा दल कहते हैं।
कांग्रेस को कभी बहुरंगी नहीं कहा, बसपा को नीली नहीं कहा, जनता दल को हरा दल नहीं कहा। कभी-कभी सोचता हूँ, सिर्फ कभी-कभी, कि रंगों को लेकर हमार यह भेदभाव उचित नहीं है?
हमें उदार बनना चाहिए। जब
हमने अपनी अर्थव्यवस्था को उदार बना लिया है, इतनी उदार की वह उदार से अधिक उधार नज़र आती है,
तो फिर रंगों के मामले में
यह संकीर्णता ठीक नहीं। मैं जानता हूँ कि आप मेरी बात नहीं मानेंगे। सच्चा
बुद्धिजीवी वही है जो दूसरे बुद्धिजीवी की बात न माने। मान लेने पर उसे सामने वाले को बुद्धिजीवी स्वीकार कर लेना पड़ता
है जो बहुत मुश्किल है। कोई स्त्री दूसरी किसी स्त्री को सबसे अधिक सुंदर नहीं मान
सकती। इसलिए मुझे पता है कि आप मेरी बात नहीं मानेंगे। मैं भी आपकी बात नहीं मानता।
इस तरह हिसाब बराबर हो जाता है। देश में आजकल यही तो हो रहा है। सब हिसाब बराबर कर
रहे हैं। बुद्धिजीवी जनता की बात नहीं सुनता, जनता उसकी बात नहीं मानती। उसने कहा जनता से कि
भाजपा से बचो, यह केसरिया है, जनता ने मन ही मन मुस्कराकर कहा, यही तो मेरा सांवरिया है। आप कहते रहिये कि किसका कौन-सा
कैसा रंग है, कौन खतरनाक है और कौन सेफ है। जनता अपने में मस्त है। उसने तो जिसे चुनना थ
चुन लिया। अब आप कुछ भी कहते रहिये।