आध्यात्म और समकालीनता का संगम
श्याम सुंदर कालरा की कला यात्रा
वेद प्रकाश भारद्वाज
आध्यात्म एक ऐसा विषय है जो बहुत से कलाकारों की कला का केंद्र रहा है पर
उनमें से कम ही कलाकार हैं जो इसे लेकर लम्बी यात्रा कर सके हैं, श्याम सुंदर कालरा ऐसे
कलाकारों में अग्रणी कहे जा सकते हैं। पिछले करीब पांच दशक से वह विभिन्न माध्यमों
में शिव और उनसे जुड़ी विभिन्न अवधारणाओं को कागज और कैनवास पर उतारते रहे हैं।
परंतु उनके चित्र केवल आध्यात्म पर ही केंद्रित नहीं हैं। उनके पिछले कुछ समय के
चित्रों में समकालीन जीवन का यथार्थ भी सांकेतिक रूप में रचा गया है। इस प्रकार उनकी कला यात्रा परम्परा से
समकालीनता तक की यात्रा कही जा सकती है। कॉलेज ऑफ आर्ट नई दिल्ली में अध्ययन के
दौरान उन्होंने विश्वनाथ मुखर्जी के मार्गदर्शन वाश तकनीक में दक्षता प्राप्त की
और उसे आगे बढ़ाया। भारतीय कला परम्परा में वाश तकनीक का महत्वपूर्ण स्थान है।
बंगाल के बाहर दिल्ली और लखनऊ वाश कला के प्रमुख केंद्र रहे हैं। दिल्ली में श्याम
सुंदरजी ने वाश चित्रों को नयी ऊंचाई प्रदान की। आज जब इस तकनीक में काम करने वाले
गिने-चुने कलाकार हैं तब यह देखना एक सुखद उपलब्धि है कि उन्होंने इस तकनीक को
जिंदा रखा है।
आधुनिक भारतीय कला परिदृश्य में जब समकालीन कला के नाम पर नाना प्रकार के
प्रयोग हो रहे हैं तब श्याम सुंदरजी ने अपने स्तर पर कुछ अलग प्रयोग किये हैं।
उन्होंने कैनवास पर एक्रेलिक रंगों से काम करते हुए उसमें भी वाश तकनीक का प्रभाव
लाने में सफलता प्राप्त की है। उनकी कैनवास पेंटिंग को देखकर यही लगता है कि वह वाश
पेंटिंग हैं।
विषय के स्तर पर आपका काम अध्यात्म पर ही केंद्रित रहा है। उनकी एक
विहंगावलोकन प्रदर्शनी ऑल इंडिया फाइन आर्ट एंड क्राफ्ट सोसायटी नई दिल्ली ने
आयोजित की है जो 10 नवम्बर से शुरू हो रही है। इस प्रदर्शनी में उनके जीवन के सभी काल की चयनित
पेंटिंग प्रदर्शित की जा रही है।
इन पेंटिंगों को देखते हुए एक बात तो स्पष्ट रूप से सामने आती है कि उन्होंने
अध्यात्म और उसमें भी शिव के बहुआयामी चरित्र को अमूर्तन की भाषा में जिस खूबसूरती
और प्रभावी तरीके से रचा है वैसा कम ही कलाकार कर पाते हैं। शिव सृजनकर्ता हैं,
नृत्य उनकी ही देन कही जा
सकती है। श्याम सुंदरजी ने अपने अनेक चित्रों में प्रकाश और रूपाकारों को इस तरह
संयोजित किया है कि वे नृत्यरत प्रतीत होती हैं। रंगों के बीच जैसे प्रकाश नृत्य
करता दिखाई देता है। शिव को केंद्र में रखकर चित्रों की रचना करते हुए उन्होंने कई
चित्रों में शक्ति को भी रचा है। शक्ति के बिना शिव की कल्पना अधूरी ही रहती है।
अपने चित्रों में उन्होंने शक्तिरूपा देवी को सांकेतिक अभिव्यक्ति दी है।
श्याम सुंदरजी की कला का एक सोपान समकालीन जीवन यथार्थ का चित्रण भी है। उनके
अनेक चित्रों में, जो पिछले कुछ सालों में रचे गये हैं, समकालीन जीवन सांकेतिक अभिव्यक्ति पाता है। ऐसे ही एक चित्र
में हाथ गाड़ी में एक मनुष्य को अन्य मनुष्यों को खींचता दिखाया गया है जबकि उसके
नीचे एक व्यक्ति को कुछ लिखते दर्शाया गया है। चित्र के सबसे निचले भाग में एक
व्यक्ति पलंग पर लेटा हुआ है। यह चित्र एक तरह से वर्तमान समाज पर आलोचनात्मक
टिप्पणी कहा जा सकता है। इस तरह के कई और चित्र हैं जो परम्परा से समकालीनता तक की
अभिव्यक्ति कहे जा सकते हैं। इसके साथ ही उन्होंने अपनी कला में जीवन के अन्य
पक्षों को भी रचा है। उनकी पांच दशक की कला यात्रा का साक्षी होना निश्चित ही कला
प्रेमियों के लिए आनंददायी अनुभव होगा।