Wednesday, August 15, 2018

क्या अर्थ है आजादी का


डॉ. वेद प्रकाश भारव्दाज
आजादी की सालगिरह आज मना ली गयी। सरकारी भवनों पर जगमग करती लाइट इसका प्रमाण दे रही थीं। टीवी से लेकर अखबारों तक पर आजादी का आख्यान चलते रहे। सोशल मीडिया पर भी कुछ लोगों ने खुद को सबसे सजग भारतीय और आजाद प्रमाणित करने का अभियान चलाया। कांवड़ सेवा के साथ ही देशभक्ति का कारोबार शुरू हो गया था। जगह-जगह तिरंगा बिकने लगा था। जैसे-जैसे 15 अगस्त नजदीक आता गया देशभक्ति का कारोबार और तेज हो गया। हां, इसे कारोबार ही कहेंगे और यह कारोबारियों का ही उत्सव भी है। यकीन न हो तो अखबारों में स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर भारी छूट के विज्ञापनों से लेकर बाजार में जगमग सजी दुकानों तक को देखते। वैसे यह सब अभी कुछ दिन और चलता रहेगा। दो दिन पहले बस से दिल्ली के लाजपत नगर की लाल बत्ती से गुजरते हुए जो देखा उसके बाद आजादी क्या है यह पूछने को मन करता है। वैसे पिछले तीन-चार दिनों से दिल्ली और आसपास के क्षेत्र में यह देख रहा था कि कैसे हर जगह तिरंगा बेचने वाले घूम रहे हैं। इतना ही नहीं लोगों ने अपनी गाड़ियों पर तिरंगा लगा भी लिया था। पर जो लाजपत नगर में देखा उसने मुझे हिला कर रख दिया।
फुटपाथ पर एक बच्चा और शायद उसका थका हुआ पिता भर दोपहरी में सोये हुए हैं। आसपास तिरंगों का ढेर खड़ा है। दो महिलाएं और कुछ बच्चे व बच्चियां हाथों में तिरंगा लिये खड़े हैं, ज्यादातर नंगे पांव हैं। लाल बत्ती होते ही सब कारों की तरफ दौड़ पड़ते हैं। कारों के दरवाजों के पास जाकर झंड़ा खरीदने की मिन्नतें शुरू हो जाती हैं। यह दिल्ली का या कहें किसी भी शहर का आम दृश्य है। यह बच्चे और महिलाएं आपको इस या उस चौराहे पर कभी तिरंगा तो कभी गणेशजी या कभी फूल तो कभी कुछ और बेचते नजर आ जाएंगे। इनमें से कई वो भी हैं जो आम दिनों में बच्चे के दूध के लिए पैसे मांगती नजर आती हैं। बच्चे बसों में भजन गाने के सहारे तो कभी तपती दुपहरी में सड़क पर गुलाटियां मारकर लोगों के सामने हाथ फैलाते नजर आ जाते हैं। आज जब तिरंगों के साये में नंगे सोये बच्चे को देखकर और किसी तरह झंड़ा बेचने की कोशिश करते बच्चों व महिलाओं को देखा तो मन किया कि उनका एक फोटो खींचकर फेसबुक पर डाल दूं। पर फिर मन नहीं माना। क्या उन लोगों की बेबसी या गरीबी को मुझे इस तरह इस्तेमाल करना चाहिए? और यदि मैं ऐसा करता हूं तो फिर मुझमें और गरीबी को भुनाने वाले एनजीओ में क्या फर्क रह जाएगा। मैंने उनका फोटो खींचने का इरादा निरस्त कर दियां पर यह बात दिल में फांस की तरह चुभती रही।
आज यदि रघुवीर सहाय होते तो अपनी ही कविता अधिनायक को दुबारा से लिखना होता तो क्या फिर यह लिखते कि- राष्ट्रगीत में भला कौन वह/ भारत-भाग्य-विधाता है/ फटा सुथन्ना पहने जिसका/ गुन हरचरना गाता है। आजादी के करीब बीस साल बाद लिखी गयी इस कविता को क्या हम आज लिखी कविता नहीं कह सकते। फिर यह भी खयाल आया कि धूमिल आज होते तो क्या फिर से यही दोहराने को मजबूर नहीं होते कि- क्या आजादी सिर्फ तीन थके हुए रंगों का नाम है/ जिन्हें एक पहिया ढोता है/ या इसका कोई खास मतलब होता है। यह दो कवि मुझे अक्सर लगता है कि साठ के दशक में थे जरूर पर कुछ ऐसी बातें कह गये हैं जो आज पचास साल बाद भी उतनी ही सार्थक हैं। दिल्ली की सड़कों पर कुछ दिन के लिए तिरंगा लेकर गाड़ियों की तरफ दौड़ते उन लोगों को क्या पता है कि आजादी का क्या अर्थ होता है। शायद किसी को पता नहीं होगा। उनके लिए तो स्वतंत्रता दिवस दूसरे त्यौहारों की तरह ही है जब वे इसी प्रकार कुछ बेच कर दो वक्त की रोटी का जुगाड़ कर पाते हैं। उनकी आजादी दो वक्त की रोटी से आगे की सोचने का मौका ही नहीं देती। देश के सबसे ज्यादा करोड़पतियों व अरबपतियों के शहर दिल्ली में उनके लिए आजादी का अर्थ है कुछ बेच पाने का मौका या फिर भीख मांगने का मौका।  


Tuesday, August 7, 2018

देवरिया की घटना मीडिया की विफलता failure of media



वेद प्रकाश भारद्वाज

आज 7 अगस्त है। ठीक एक सप्ताह बाद हम देश की आजादी की वर्षगांठ का जश्न मनाएंगे। पर इस वर्षगांठ पर क्या हम देश व समाज की रगों में पड़ गई गांठों पर कुछ गौर करेंगे? शायद नहीं। यह राष्ट्रीय जश्न का दिन है। प्रधानमंत्री लालकिले से देश को संबोधित करते हुए घोषणाओं की बरसात कर सकते हैं। मीडिया उसे कवर करेगा। उस दिन कुछ अखबार परिशिष्ठ भी निकाल सकते हैं जैसा कि इंदौर में एक समय नई दुनिया अखबार किया करता था। इस अवसर पर देश की विभिन्न प्रकार की आजादी के खतरे में होने की बात कही जा सकती है और उसकी रक्षा के संकल्पों को दोहराया जा सकता है। पर क्या कोई इस बात का जवाब दे सकेगा कि हमारे देश में मुजफ्फरपुर और देवरिया जैसी घटनाएं क्योंकर हो पाती हैं। और यह भी कि इस तरह की और घटनाओं को रोकने के लिए हम कितने ईमानदार हैं। यह सवाल सिर्फ सरकार से ही नहीं है, मीडिया से भी है क्योंकि सरकार के अपने निहित स्वार्थ हो सकते हैं पर पत्रकारिता से यह उम्मीद की जाती है कि वह केवल जनपक्षधर होगी। वह लोकतंत्र का चौथा खंभा है जिसके कारण लोकतंत्र बचा रह पाया है। इसके बाद भी मीडिया को लेकर कुछ संशय मेरे मन में है तो वह अकारण नहीं है। 

मुजफ्फरपुर की घटना जहां इस बात के लिए आश्वस्त करती है कि पत्रकारिता आज भी जिंदा है वहीं उत्तर प्रदेश के देवरिया में कल सामने यानी शेल्टर होम में बच्चियों के शोषण की घटना पत्रकारिता के चूक जाने को प्रमाणित करती है। इधर हाल के वर्षों में कई ऐसे मामले सामने आये हैं जो स्थानीय स्तर पर किसी न किसी रूप में चर्चा में रहे या जिनमें कार्रवाई के आदेश हुए पर कार्रवाई की नहीं गई। इस मामले का ज्ञान होने के बाद भी मीडिया ने उसकी तरफ ध्यान नहीं दिया। यहीं आकर पत्रकारिता की सार्थकता संदिग्ध हो जाती है। क्या कोई अपराध होने के बाद सामने आना ही खबर है या कोई दुर्घटना होने के बाद ही खबर है? क्या वैसा होने की आशंका खबर नहीं है जबकि उसके बारे में आपके पास पर्याप्त आधार भी हैं? और क्या दूसरे साधनों से कोई अपराध सामने आने के बाद उस पर अखबारों को रंग देना या टीवी के पर्दे पर चींखना ही उसके होने की सार्थकता है? देवरिया के मामले में अब सामने आ रहा है कि एक साल पहले ही उसका पंजियन रद्द होने के बाद भी उसे बंद नहीं किया गया। यह भी सामने आ रहा है कि पुलिस उसे बंद कराने जाती थी तो उसे भगा दिया जाता था। इसका अर्थ यह कि उसके संचालक इतने ताकतवर अपराधी हैं कि उनके लिए पुलिस का कोई वजूद ही नहीं था। यह बात सरकार की तरफ से सामने आयी है कि कार्रवाई के आदेश दिये गये थे पर अधिकारियों ने उसपर अमल नहीं किया। यानी कि कहीं न कहीं यह सरकार की विफलता तो है ही, उससे बड़ी विफलता मीडिया की भी है। 

इसी के साथ एक बात और उभरती है, और वह यह कि कोई एक घटना होने के बाद उसी तरह की घटनाओं की खबरें अचानक कैसे आने लगती हैं जबकि वह अपराध पहले से हो रहे होते हैं। लोगों को याद होगा कि एक बार एक बच्चे के गड्ढे में गिरने के बाद उसी तरह की अन्य जगहों की घटनाओं की खबरें आने लगी थीं। दिल्ली में निर्भया कांड के बाद देशभर में बलात्कार की खबरों की बाढ़ आ गयी। आज अखबारों के पन्ने इस तरह की खबरों से भरे रहते हैं। ऐसा तो नहीं है कि अचानक बलात्कार की वारदातें बढ़ गयी हैं। वह पहले भी होती थीं पर अब उनकी पुलिस में रिपोर्ट होने लगी है। मीडिया अब उन्हें छाप रहा है पर क्या उसने कभी इस बात की जांच की कि उनमें से कितनी खबरें झूठी होती हैं और यह कि कितने मामलों में पुलिस ने ठोस कार्रवाई की। यह कहने में मुझे कोई संकोच नहीं कि आज के पत्रकार इन सब बातों का ध्यान नहीं रखते। उन्हें इस बात से भी कोई मतलब नहीं होता कि अपने परिवेश में उन स्थितियों पर नजर रखी जाए जो किसी तरह के खतरे का संकेत हैं और शासन से लेकर लोगों तक को इस बारे में सजग किया जाए।  

यह एक ऐसी स्थिति है जो मीडिया के लोकतंत्र के चौथा खंभा होने को शक के दायरे में लाती है। एक समय था जब पत्रकार ऐसी तमाम खबरों को सामने लाते थे जिनकी पुलिस में रिपोर्ट नहीं होती थी और न ही सरकार की तरफ से कोई कार्रवाई होती थी। मीडिया उस अपराध और उसके प्रति पुलिस-प्रशासन व सरकार की चुप्पी को निशाना बनाता था। देवरिया की घटना यह प्रमाणित करती है कि आज के पत्रकार अब केवल नौकरी कर रहे हैं, पत्रकारिता नहीं। वरना कोई कारण नहीं था कि वे इस बात को जोर-शोर से उठाते कि एक महिला संरक्षण गृह अवैध रूप से चल रहा है जहां और भी बहुत कुछ गलत हो सकता है। इसी से जुड़ी एक बात और है जिसकी तरफ मीडिया अपनी किसी तरह की जिम्मेदारी महसूस नहीं करता। 

मुजफ्फरपुर के अपराध के सरगना ब्रजेश ठाकुर आजकल कहां हैं? जवाब आएगा कि जेल में हैं। पर क्या वास्तव में वो जेल में हैं? यह प्रश्न इसलिए है कि जो व्यक्ति इतने जघन्य अपराध का आरोपित है वह पकड़े जाने से पहले तक खुलेआम घूम रहा था और उसे कोई तकलीफ नहीं थी। पर एक संगीन मामले में गिरफ्तार होते ही वह इतना बीमार हो जाता है कि सीधे अस्पताल में भर्ती करा दिया जाता है जहां वह जेल की बंदिशों से मुक्त आराम का जीवन बिता सकता है। ब्रजेश ठाकुर के साथ ऐसा ही हुआ है। अपनी गिरफ्तारी के बाद से ही वह अस्पताल में है। वह इन दिनों श्रीकृष्ण मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल में स्वास्थ्य लाभ ले रहा है। वह स्लिप डिस्क, डायबिटिज और ब्लडप्रेशर का मरीज है और हार्टअटैक होने का खतरा है। इसीलिए उसे डॉक्टरों की निगरानी में रखा जाना जरूरी है। यह खबर अखबार में छपी है पर किसी ने इस बात पर सवाल नहीं उठाया है कि अपराध सामने आने के बाद ही वह बीमार कैसे हुआ। फिर यह अकेले ब्रजेश ठाकुर का मामला नहीं है। अक्सर हमारे नेता जो वैसे गिरफ्तारी से पहले सड़क पर भाषण दे रहे होते हैं, पत्रकारों से बात कर रहे होते हैं, गिरफ्तार होते ही कई गंभीर बीमारियों के शिकार होकर अस्पताल में पहुंच जाते हैं। और आश्चर्य नहीं कि जैसे ही वह रिहा होते हैं फिर से सामान्य जीवन जीने लगते हैं। हमारे पत्रकार इस सब पर कभी सवाल नहीं उठाते।

7 अगस्त 2018