डॉ. वेद प्रकाश भारव्दाज
आजादी की सालगिरह आज मना ली गयी। सरकारी भवनों पर जगमग करती
लाइट इसका प्रमाण दे रही थीं। टीवी से लेकर अखबारों तक पर आजादी का आख्यान चलते रहे।
सोशल मीडिया पर भी कुछ लोगों ने खुद को सबसे सजग भारतीय और आजाद प्रमाणित करने का
अभियान चलाया। कांवड़ सेवा के साथ ही देशभक्ति का कारोबार शुरू हो गया था। जगह-जगह
तिरंगा बिकने लगा था। जैसे-जैसे 15 अगस्त नजदीक आता
गया देशभक्ति का कारोबार और तेज हो गया। हां, इसे कारोबार ही कहेंगे और यह कारोबारियों
का ही उत्सव भी है। यकीन न हो तो अखबारों में स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर भारी छूट
के विज्ञापनों से लेकर बाजार में जगमग सजी दुकानों तक को देखते। वैसे यह सब अभी
कुछ दिन और चलता रहेगा।
दो
दिन पहले बस से दिल्ली के लाजपत नगर की लाल बत्ती से गुजरते हुए जो देखा उसके बाद
आजादी क्या है यह पूछने को मन करता है। वैसे पिछले तीन-चार दिनों से दिल्ली और
आसपास के क्षेत्र में यह देख रहा था कि कैसे हर जगह तिरंगा बेचने वाले घूम रहे
हैं। इतना ही नहीं लोगों ने अपनी गाड़ियों पर तिरंगा लगा भी लिया था। पर जो लाजपत
नगर में देखा उसने मुझे हिला कर रख दिया।
फुटपाथ पर एक बच्चा और शायद उसका थका हुआ पिता भर दोपहरी
में सोये हुए हैं। आसपास तिरंगों का ढेर खड़ा है। दो महिलाएं और कुछ बच्चे व
बच्चियां हाथों में तिरंगा लिये खड़े हैं, ज्यादातर नंगे पांव हैं। लाल बत्ती होते ही सब कारों की तरफ
दौड़ पड़ते हैं। कारों के दरवाजों के पास जाकर झंड़ा खरीदने की मिन्नतें शुरू हो जाती
हैं। यह दिल्ली का या कहें किसी भी शहर का आम दृश्य है। यह बच्चे और महिलाएं आपको
इस या उस चौराहे पर कभी तिरंगा तो कभी गणेशजी या कभी फूल तो कभी कुछ और बेचते नजर
आ जाएंगे। इनमें से कई वो भी हैं जो आम दिनों में बच्चे के दूध के लिए पैसे मांगती
नजर आती हैं। बच्चे बसों में भजन गाने के सहारे तो कभी तपती दुपहरी में सड़क पर
गुलाटियां मारकर लोगों के सामने हाथ फैलाते नजर आ जाते हैं। आज जब तिरंगों के साये
में नंगे सोये बच्चे को देखकर और किसी तरह झंड़ा बेचने की कोशिश करते बच्चों व
महिलाओं को देखा तो मन किया कि उनका एक फोटो खींचकर फेसबुक पर डाल दूं। पर फिर मन
नहीं माना। क्या उन लोगों की बेबसी या गरीबी को मुझे इस तरह इस्तेमाल करना चाहिए? और यदि मैं ऐसा करता हूं तो फिर मुझमें और
गरीबी को भुनाने वाले एनजीओ में क्या फर्क रह जाएगा। मैंने उनका फोटो खींचने का
इरादा निरस्त कर दियां पर यह बात दिल में फांस की तरह चुभती रही।
आज यदि रघुवीर सहाय होते तो अपनी ही कविता अधिनायक को दुबारा से लिखना होता तो क्या फिर यह लिखते कि- राष्ट्रगीत
में भला कौन वह/ भारत-भाग्य-विधाता है/ फटा सुथन्ना पहने जिसका/ गुन हरचरना गाता
है। आजादी के करीब बीस साल बाद लिखी
गयी इस कविता को क्या हम आज लिखी कविता नहीं कह सकते। फिर यह भी खयाल आया कि धूमिल आज होते तो क्या फिर से
यही दोहराने को मजबूर नहीं होते कि- क्या आजादी सिर्फ तीन थके हुए रंगों का
नाम है/ जिन्हें एक पहिया ढोता है/ या इसका कोई खास मतलब होता है। यह दो कवि मुझे अक्सर लगता है कि साठ के दशक में थे
जरूर पर कुछ ऐसी बातें कह गये हैं जो आज पचास साल बाद भी उतनी ही सार्थक हैं।
दिल्ली की सड़कों पर कुछ दिन के लिए तिरंगा लेकर गाड़ियों की तरफ दौड़ते उन लोगों को
क्या पता है कि आजादी का क्या अर्थ होता है। शायद किसी को पता नहीं होगा। उनके लिए तो स्वतंत्रता
दिवस दूसरे त्यौहारों की तरह ही है जब वे इसी प्रकार कुछ बेच कर दो वक्त की रोटी
का जुगाड़ कर पाते हैं। उनकी आजादी दो वक्त की रोटी से आगे की सोचने का मौका ही
नहीं देती। देश के सबसे ज्यादा करोड़पतियों व अरबपतियों के शहर दिल्ली में उनके लिए
आजादी का अर्थ है कुछ बेच पाने का मौका या फिर भीख मांगने का मौका।